Sunhare Pal

Friday, January 22, 2010

‘तुम चुप रहो!’


यदि महिला आरक्षण की बात नहीं होती तो उसका नाम कौन लेता?
‘‘जठे परधान वणवां वास्ते होड़-होड़ी में आदमियां’रा माथा फूटी जावता, वठे अणी पद ने आरक्षित करी’न सरकार बब्बूड़ी’री तकदीर खोल दीदी’’।
झण्डा पार्टी की ओर से बब्बूड़ी को चुनाव टिकट मिला था। वैसे तो बब्बूड़ी अर्थात चन्द्रकला में कई योग्यताएं होते हुए भी ऐसी कोई योग्यता नहीं थी कि उसको चुनावी टिकट मिलता। न तो उसका कोई राजनैतिक कद था और न ही पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता। उसने कभी पार्टी के लिए कोई काम नहीं किया था। करती भी कैसे? उसे पार्टी, राजनिति से क्या लेना देना? सुबह से लेकर शाम तक चौप्पों’चौपायों’, खेत खलिहानों और रसोड़े से जो थोड़ी बहुत फुर्सत मिलती वो उसके छोरों के हक की थी। राजनिति क्या होती है वो तो क ख ग भी नहीं जानती थी। निपट ढ़ोर, अनाड़ी बब्बूड़ी। फिर बब्बूड़ी में ऐसी क्या योग्यता थी कि किसी ओर को न मिलकर सत्तारूढ़ पार्टी ने अपना टिकट देकर उसे चुनावी दंगल में उतारने का फैसला लिया?
सीधीसी बात है बब्बूड़ी के पिता इस टिकट के असली हकदार थे। अब जब प्रधान की कुर्सी महिला के लिए आरक्षित थी तो पिता टिकट लेकर क्या करते? पुत्री का नाम दे दिया। देने को तो वो बहूओं का नाम भी दे सकते थे पर एक तो बहुएं उनसे पर्दा करती थी। फिर बहुओं का मर्दो के सामने आना, बतियाना उन्हें पसन्द नहीं था। बेटो की भी यहीं राय थी। दूसरा बब्बूड़ी का उसके पति से झगड़ा चल रहा था। कोई पांचेक बरस से उसका डेरा मैके में डला हुआ था।
कल बब्बूड़ी फार्म भरने जायेगी।
‘‘इधर आ बब्बूड़ी’’
‘‘भिंया दुई’न आऊं दाता होकम’’ वह भैंस को बांटा रख दुहने की तैयारी कर रही थी।
अरे! पैली अठी आ। भौजाई ने कैव जो भिंया दुई लेगा। थूं अठीं आ।’’
बब्बूड़ी घाघरे से गीले हाथ पौंछती दरीखाने पहुंची। देखा वहां पिता के साथ पार्टी के और भी कार्यकर्ता मौजूद है। उसे देख कई हाथ ‘नमस्कार’ कर उठे। उसको ‘अचरज’ हुआ। अपने ही गांव के आदमी जिन्हें वह काकोसा, दादासा, भाईसा कहती रही, जिनकी गोद में वह खेली, अंगुली पकड़कर चली और बड़ी हुई वे उसे नमस्कार करें? उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि शर्मा गयी।
‘‘चन्द्रकला देवी अब आप हमारी नेता है....चन्द्रकला देवी जिन्दाबाद’’ रामबोला दर्जी ने उत्साह में भर नारा लगाया।
चुनाव पूर्व सरगर्मी वहां देखी जा सकती थी। दो, चार, तीन के समूह में खुसर-पुसर, कईं मुंह कान पर लगे थे। मतदाता सूची सामने फैली पड़ी थी। मर्मज्ञ राजनीतिज्ञों ने मिल बैठकर तमाम सूची को जातिगत आधार पर कई खण्डों में विभक्त कर दिया था। मसलन 15 घर सुनारों के जिनमें 34 मतदाता थे। महाजनों के कुल 20 वोट ही थे। ‘चतुरानन्द की महाजनों के वोट पर अच्छी पकड़ है’ दीनू फुसफुसाया। गूजरा, भोईयों, मालियों और पटेलों के 60 और 80 के आसपास वोट थे। बलाई, खटीकों और मुसलमानों, सिंधियों के भी काफी वोट है। दर्जी धोबी, रेगर, भिस्ती....कई जातिगत बंटाव, मतदाता बैंक की गणित चल रही थी। किसके कितने वोट है? कितने वोट पार्टी पक्ष में है और कितने विपक्ष के और कितने तटस्थ। पक्ष वाले तो झोली में थे ही। देखना यह था कि विपक्ष की जाजम में कितने छेद किये जा सकते है? कितनी सेंध, कहां-कहां मारी जा सकती है और सर्वाधिक ताकत तो तटस्थ वोटों पर लगानी थी। कितने जुटाये या तोड़े जा सकते है? हार जीत का फैसला तो यहीं मतदाता करते है।
‘‘काले ही फार्म भरनों है। साढ़े दस बजा रो मौ’रत आयो है’’
‘‘काले थ्हारी घरवाली ने भी बब्बूड़ी रे ल्हारे तै’सील में जाणों है।’’ शाम के सात बजने वाले थे। बब्बूड़ी ने जम्हाई ली, यह सब देख सुन उकताहट होने लगी। ‘‘दाता, होकम...’’
‘‘तू चुप रह...! हां, यो ठीक रैगा। आठ-दस लुंगायां रो जत्थो साथ वैणो चावै।’’
‘‘हां बाऊजी, चन्द्रकला देवी के साथ आठ दस नहीं कम से कम पचास औरते होनी चाहिए। हरेक जाति में से पांच-पांच औरते होनी चाहिए। ये हमारी ताकत का प्रदर्शन होगा। आधी गुवाड़ी मैं नूता भिजवा दों। पहले फार्म भरना फिर जीमण’’
‘चुनाव के लिए कल फार्म भरेगी बब्बूड़ी’ पूरे गांव में, बस्ती में लोगो को खबर लग गई थी। नूते लग गये थे।
‘‘चन्द्रकला देवी के पक्ष में अच्छा वातावरण है’’
‘‘हमारी जीत निश्चित है’’
‘‘परधान हमारा होगा’’ कार्यकर्ताओं में पूरा उत्साह था।
भोर का सूरज सूर्यप्रतापसिंह के आंगन में पसरा पड़ा था। अन्दर की डयोढ़ी में आज बब्बूड़ी हमेशा की भांति पौट्टे ’गोबर की थेपड़ी’ नहीं थाप रही थी। उसका सात वर्षीय बेटा भारतेन्दु उसे हस्ताक्षर करवाने की अन्तिम ‘प्रेक्टिस’ करवा रहा था। पास में ही बैठा उसका छोटा बेटा अमलेन्दु मां के हाथ से पैन खींचने की कोशिश में लगा था। मानो कह रहा हो ‘पेन पर मेरा अधिकार है।’
‘‘हां! यों·· यों··· ले बैठ’’ बब्बूड़ी उसे उठाकर जरा दूर बैठा आयी। वह पहुंचती इससे पूर्व ही वह पहुंचकर पेन उठा चुका था।
‘‘बाईसा पेन तो मर्दा रे हाथ में’ईज सौवे’’ भाभी के कहने पर बब्बूड़ी ‘फिस्स’ से हंस पड़ी।
झमरू मासी, पार्वती भुआ, गोदावरी तैलण, मंगनी जाटनी, नाथूड़ी रंगरेजण, बसन्ती मालण, गोवनी मीणी और न जाने कितनी जानी अनजानी औरतों का हजूम तहसील की ओर जा रहा था। रंगबिरंगे घाघरा-लूगड़ी में सजी हुई औरते, घूंघटा निकाले औरते, जिनके सबके हाथ में पार्टी के छोटे-छोटे झण्डे थे। औरतों के पीछे मर्दो का टोला था। यह भीड़ तहसील की मुख्य सड़क पर पहुंच चुकी थी। उत्साही कार्यकर्ता नारे लगाने लगे।
‘‘चन्द्रकला देवी....जिन्दाबाद·’’
‘‘झण्डा पार्टी...जिन्दाबाद··’’
एक उत्साही कार्यकर्ता जोर से चिल्लाया- ‘‘जब तक सूरज चांद रहेगा...’’
चन्दाबाई, चन्दू बाईसा, चन्द्रकला देवी, बब्बूड़ी...कई नामों की आवाजे आपस में गडमड हो गई तो नारों का स्वर धीमे से धीमा होता गया। युवा कार्यकर्ता खिलखिला उठे फिर हंसी का फव्वारा छूट गया।
‘‘चोप्प·’’ बुजुर्ग ने उन्हें दपटा...‘ढ़ग से नारे लगाओ’
युवको में खुसर पुसर हुई फिर नारे लगने लगे, एक स्वर में एक लय में।
हरे गोटे वाली मलमल की साड़ी और लाल बूंटेदार रेशमी लहंगा पहने, मुंह पर आधा घूंघट डाले, कई फूलमाला गले में पहने बब्बूड़ी अर्थात चन्द्रकला देवी बड़ी ‘ठहमराई’ ’गम्भीरता’ के साथ चल रही थी। उसकी जिन्दगी में यह पहला अवसर था। मन ही मन घर के सगला देवी देवता, डयाढ़ी माता, कुलदेवी बाणमाता और भैरूजी को बारम्बार यह कहते हुए धोग लगा रही थी कि ‘हे बावजी! म्हारो सत राखजै। म्हूं सत्राणी री फतै करजै।’
जय जयकार के साथ उसने फार्म पर अपने हस्ताक्षर किये। जैसे ही वह तहसील भवन के बाहर निकली सामने उसका पति भूपेन्द्रसिंह एक जीप के पास खड़ा था। आठ-दस लोग हाथ में लठ्ठ सम्भाले उसके साथ तने हुए थे। भूपेन्द्रसिंह आगे बढ़ा और उसका रास्ता रोकते हुए बोला-
‘‘तू चुनाव नहीं लड़ेगी। रजपूत की लुगाई है अपनी मरजादा में रह। बेसरम अब तू वोट मांगने घर-घर जायेगी? येई’ज काम पांती आया है तेरे...करमखोड़ली पूर्वजांे का नाम डूबायेगी...?...’’
वह चुप्प धणी को यहां इस तरह देख भौंचकी रह गई। वह कुछ कहती इससे पूर्व उसे धकियाते उसके पिता सूर्यप्रतापसिंह सामने आ गये। ‘‘घरै पधारो कंवरसा। पामणा भाई ने तै’सील में हील हुज्जत सोभा नीं देवे। आप घरै पधारो। पामणा री सोभा हवेली रे दरीखाने वैं है।’’
श्वसुर को समने पा भूपेन्द्रसिंह ठिठका। कड़ाई से कहे गये शब्द सम्मानजनक होते हुए भी उसे विष के घूंट की तरह लगे। उसने वहीं जमीन पर थूंक दिया। बुजुर्ग कार्यकर्ताओं ने समय की नजाकत को समझा। कहीं विपक्ष वाले इसका राजनैतिक लाभ न ले ले। इससे पूर्व ही वे यहां से खिसक लें। उन्होंने नारा लगाया- ‘‘चन्द्रा देवी...जिन्दाबाद’’
जिन्दाबाद के नारों के बीच से गुजरती हुई बब्बूड़ी एक मुकाम पार कर मैदान में उतर चुकी थी। इस दौड़ की पहली बाधा उसका पति अपने आदमियों के साथ दरीखाने पहुंच चुका था।
सूर्यप्रतापसिंह ने राजनीति में पूरी उमर खपा दी थी। वह समय की नजाकत को समझ रहा था। चन्द्रकला फार्म भर चुकी थी। चुनाव में केवल दस दिन बाकी थे। उसे अपनी पूरी ताकत से इस चुनाव को लड़ना ही नहीं, जीतना भी था। विपक्ष का जोर भी कुछ कम नहीं था। वैसे भी आजकल चुनाव लड़ना आसान चीज नहीं रहा। पैसा पानी की तरह बहता है। मोटी रकम का हिस्सा अगर दामाद को राजी रखने में चुक गया तो क्या हुआ। वैसे तो उसे टेढ़ी अंगुली से घी निकालना भी आता था, पर वह भलीभांति जानता था कि यह अवसर दामाद को नाराज करने और उत्तेजित होने का नहीं है। वह मौका देखकर तिलक निकालना खूब जानता था। सो जंवाई के साथ पधारे हुए अतिथिगणों का खूब आदर सत्कार हुआ। मीठे शर्बत और मीठे फलों से उन्हें तृप्त किया गया। अब दामाद की बारी थी। ‘एक बार बब्बूड़ी परधान बन जाय। ऐसे कई वारे न्यारे तो वो आगामी पांच सालो में कर लेगा’ उसने दांव लगा ही दिया। अखबार में लिपटा नोटो का बण्डल उसने दामाद के सामने करते हुए अत्यन्त मधुरता से कहां, ‘‘यो आपरी सीख रो बीड़ों, हाजर..और कई ताबेदारी वे तो कौं’’ । भूपेन्द्रसिंह एक नम्बर का पियक्कड़। इतने रूपये देखते ही उसकी बांछे खिल गई।
सामने आयी बला सूर्यप्रताप की कुशलता से टल चुकी थी। अब बब्बूड़ी को ले वह निर्विघ्न चुनावी मैदान में उतर गये। यह बब्बूड़ी के जीवन में पहला मौका था जब वह ‘जीपड़े’ में बैठ चुनाव प्रचार पर निकली थी। गवाड़ी गवाड़ी जाकर ‘वोट किन्ने देणो है?’ समझाती। किसी कटाक्ष के प्रत्युत्तर भी वह अपने तरीके से दे आती थी। रोज की घर गृहस्थी, खेतीबाड़ी की जिन्दगी से यह अनुभव अलग था। घर आकर अपने अनुभव भाभीयों को सुनाती- ‘पाणी कठारो तो रोटियां कठै, लुगाई जात वास्ते घणों करड़ों काम है।
‘‘बाईसा आप राज कींकर समभालोगी?’’
‘‘ऐ यालो! कींकर कई, रोज ढ़ोर चौप्पा नीं समभालै कई..विस्तर ही तो सम्भालनो पड़तो वैई।’’ साड़ी मुंह में दबाकर दानी बुर्जग महिलाएं सभी हंस पड़ी।
विपक्ष भी पूरी कमर कस कर मैदान में उतरा था। बब्बूड़ी के सामने प्रत्याशी थी गमेरी कलाल। दोनों बचपन की साथिन चुनावी दंगल में आमने-सामने। पहले पहल आमना सामना हुओ तो खुश खुश मिली। धीरे धीरे माहौल गर्माने लगा। सवर्ण और पिछड़ी जातियों के अलग-अलग खेमे बन गये। दो धड़े हो गये। लोग खुलकर सामने आने लगे। इसका असर प्रत्याशियों पर भी पड़ा। गमेरी और बब्बूड़ी आमने सामने हो जाते तो ‘जिन्दाबाद’ के नारे लगने लग जाते। चुनाव प्रचार में व्यक्तिगत आक्षेप होने लगा। राजनीति के रंग से अब तक अछूती महिलाओं में चैतन्य आ गया था। किसी के सिर पर घास का ‘भारा’ लदा हुआ है तो किसी के सिर पर पानी से भरा ‘बेवड़ा’। यूं तो वह बोझे मर रही होती है पर चुनाव की चर्चा छिड़ते ही वह खड़ी रह जाती, सिर का बोझ भूल जाती। गोबर के हाथ सने हो या राख से बर्तन रगड़नें वाले, हार जीत की अटकले लगने लगती।
चुनाव में आयी इस चेतना से वोटों की गणित गड़बड़ाने लगी। बुजुर्गो के आदेश मानने वाले युवा बागी नजर आते थे। महिलाओं को भी समझाना मुश्किल पड़ रहा था।
इस चुनाव में गांवों के विकास या सिद्धान्तों की बाते तो नगण्य प्राय: थी। प्रतिष्ठा के प्रश्न अड़े हुए थे। टक्कर कांटे की थी। सूर्यप्रतापसिंह कोई ‘रिस्क’ नहीं लेना चाहते थे। रातों रात कारगर उपाय कर डाले। कुछ जातियों से मुफ्त में यात्रा का वायदा हुआ तो कुछ मांस मदिरा से माने।
मतदान की तारीख आ पहुंची। कड़े बंदोवस्तों के बीच मतदान सम्पन्न हुआ। प्रधान की कुर्सी जीतकर बब्बूड़ी ने विजयमाला पहनी। जगह-जगह स्वागत समारोह हुए। वह भीड़ को संबोधित करने लगी-
‘‘सरकार लुगायां ने कुर्सी दीदी। लुगायां घर सम्भालै, छोरा छौरी सम्भालै अबै राज सम्भाली’ई ...गाय बकरिया री गुवार वे के पामण पीर री खातरी, माथे आई पड़िया सगलो करै। अबै आप री सैवा रो मौको मल्यो है तो आपरी परख मांय खरी उतरू’’ कहते हुए वह उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। भीड़ ने ताली बजाई। कभी विद्यालय का मुंह न देखने वाली बब्बूड़ी आज प्रधान बन चुकी थी।
हस्ताक्षर करने वाली इस जनप्रतिनिधी के पंचायत के काम तो उसके पिता की निगरानी में ही पूरे होते थे। उसे कोड आदेश थे कि फंला चपरासी के हाथों भेजे गये कागजों, फाईलों पर ही मंजूरी के हस्ताक्षर करने है। सब कुछ पहले से ही तय, समझाया हुआ चलता। वह तो केवल चिन्हित स्थानों पर हस्ताक्षर करती थी। बाकि मामलों मे वह चुप्पी साध लेती। पिता के ऐसे ही आदेश थे। छ: माह तो सब निर्बाध गति से चलता रहा। विपक्ष अपना पैंतरा चलता तो सूर्यप्रताप उसे ध्वस्त कर देता। उसने अपना खेमा मजबूती से बांध रखा था।
विपक्ष ने अपनी नई चाल चली। उन्होंने भूपेन्द्रसिंह अर्थात चन्द्रकला देवी के पति को अपना मोहरा बनाया। उसे उकसाया और भड़काया कि वह अपनी रूठी पत्नी को मैके से ले आये। उसकी पत्नी प्रधान है। पत्नी के प्रधान होने से जो इज्जत और धन उसे मिलना चाहिये, वह सब उसका ससुर ऐंठ रहा है। फलस्वरूप वह अपनी पत्नी ‘प्रधान’ को मना घर ले आया। अब जो सरकारी मजमा सुसर के यहां लगा रहता था वह उसके द्वार पर रहने लगा। उसकी छाती फूलकर चौड़ी हो गई। उसकी दखल बढ़ने लगी। एक सुबह की बात है-
‘‘दो-तीन कप ‘चा’ बना ला’री’’
बब्बूड़ी चाय लेकर आयी। भूपेन्द्रसिंह ऑफीस के चपरासी के साथ बैठे एक आदमी से बतिया रहा था। यह चाय उसने उन्हीं के लिए बनवायी थी। ‘‘सबको पानी भी पिला और मेरे बूट के पालिस कर दे।’’
‘‘वो जो आज टेण्डर खुलने वाले है उसमें बखतावर का काम हो जाना चाहिये।’’
‘‘पर वो तो एक नम्बर वाले का...’’
‘‘तू चुप रै! समझदार की पूछड़ी। म्हे कैऊं जो कर’’
वह मनमाने तरीके से धन ऐंठने लगा। श्वसुर और उसके बीच टकराहट होने लगी। सूर्यप्रताप ने पैतरा खेला। भूपेन्द्रसिंह इतना दक्ष खिलाड़ी तो था नहीं। कहीं न कहीं मात खानी ही थी। वह उलझन में पड़ गया। घर आकर उसने सारी झल्लाहट अपनी पत्नी पर निकाली -
‘‘थ्हे ट्रांसफर री लिस्टा में धांधली क्यूं कीदी?’’
‘‘म्हने तो दाता होकम कियो। मैं वणाने पूछया बगैर नी करूं।’’
‘‘जूता खाणा वै तो जबान लड़ावजै..’’
‘‘नै करूं...नै करूं...कई कर लेइ..?’’
तभी भूपेन्दzसिंह ने उसकी चोटी खींच एक लात जमा दी।
ड्राईवर हो या बाबू, चपरासी हो या अफसर, उसकी बात न मनाने पर वह सबके सामने ही गाली गलौच करता या झापड़ रसीद कर देता। रोज-रोज की ठुकाई और अपमान से घबराकर वह फिर पिता के पास लौट आयी।
वह अस्वस्थ रहने लगी। उसे अंदेशा होने लगा तो डाक्टरी परीक्षण करवाया। उसका संदेह ठीक निकला। वह गर्भवती है। जब पिता को मालूम चला तो मानो उन पर गाज गिर गई। प्रधान का पद हाथ से जाता दिखा। चुनाव में रूपया पानी की तरह बहा था। अभी तो खेत भी गिरवी पड़े है। बैठे बिठाये ये मुसीबत कहां से आ पड़ी। तीसरी संतान होते ही बब्बूड़ी को इस्तीफा देना पड़ेगा। नया कानून ही ऐसा आया है।
बब्बूड़ी की शहर के प्राईवेट अस्पताल में जांच हुई। बच्चा तो ठीक था पर उसका ब्लड प्रेशर कम था। डाक्टरनी ने गर्भपात नहीं कराने की सलाह दी।
सूर्यप्रतापसिंह माथा पकड़कर बैठ गये। अब क्या हो? उन्होंने बेटी से पूछवाया तो पता चला वह भी गर्भपात के विरोध में थी। उसके दो बेटे थे और अब बेटी की आस उसके मन में पलने लगी थी। सूर्यप्रताप धर्मसंकट में फंस गये। एक तरफ प्रधान की दावेदारी जाती है दूसरी तरफ बेटी की जान। उसकी मर्जी के बिना गर्भपात कराना भी मुश्किल है। ये बाते छुपाये नहीं छुपती, कहीं विपक्ष या इसके पति को पता चल गया तो? समस्या एक नहीं कई खड़ी हो जायेगी। आखिर निर्णय तो लेना ही था। उन्होंने पत्नी की मदद ली और समझाबुझाकर बड़ी गोपनीयता से काम को अंजाम दिया गया। कागजों में पीलिये का केस बताया गया।
अस्पताल में बब्बूड़ी पीली पंजर पड़ी हुई थी। मानो शरीर का सारा रक्त ही निचुड़ गया हो। उसके पिता के पास मिलने वाले कई परिचित आते, हालचाल पूछते। फूलों का गुलदस्ता लिए विधायक महोदय आये -
‘‘अब कैसी है प्रधानजी?’
‘प्रधानजी’ उसे लगा जैसे किसी ने घौंसा मार दिया हो। ‘भाड़ में जाय प्रधान की कुर्सी वह बिलबिला उठी। जैसे ही बब्बूड़ी ने बोलने को मुंह खोला, पिता ने कहा -
‘‘तू चुप रह! आराम कर’’ और उसने अपने होठ मजबूती से ‘सी’ लिए।

Sunday, December 27, 2009

अंधेरे और उजालो के बीच

दरखतों के बीच से
गुजरता जब कोई परिंदा
धूप और बैसाख की
परवाह किए बिना
हर शाख बुनती तब एक घरौंदा
दूधिया, धवल या
फिर हो सुआपंखी
हर रंग में लुभाती जिन्दगी
दाना - दाना खाने
लिए अधखुली चौंचे
हर दम करती मानो बंदगी
पीन पंख फड़फड़ाएं
उड़ने को जी चाहे
हर मंजिल अनजानी, है नई डगर
न जाने राह लम्बी
आंख अभी धुंधली
हर आहट...डराये, है जोश मगर
नव कौंपल जब
नीड़ कोई सजाए
नभ भर लाये झोली भर सितारे
तब सूरज चंदा
मिलजुल कर सारे
नववर्ष की संध्या पर नव गान पुकारे
प्रेम सुधारस बरसाये
राग मधुर सुनाये

Monday, November 30, 2009

स्थगन

लो आज फिर रसोई से सफेद छुरी गुम हो गई, कहां जा सकती है? शक की सुई फिर भुआ की ओर उठ गई। घर में यह पहली बार घटने वाली घटना नहीं है। जबसे भुआ इस घर में काम करने आई है तबसे कई चीजे गुम हो चुकी है। साबुन, टूथपेस्ट, टूथब्रश से लेकर अगरबत्ती, केसर-चंदन डिब्बी के अलावा रसोईघर की कटोरी, चम्मच, गिलास और यहां तक कि दीपावली पर बच्चों के पटाखों का डिब्बा भी गुम हो चुका है। बहुत गुस्सा आया जब पटाखों का डिब्बा गुम हुआ था तब। निश्चय कर लिया था मैंने इस बार जरूर से भुआ की छुट्टी कर दूंगी। बहुत हो चुका, अब बर्दाश्त के बाहर है उसकी छोटी मोटी चीजे चुराने की यह आदत।
भुआ को जब काम पर रखा था तब ही बहुत लोगों ने अगाह कर दिया था - इसे काम पर तो रखा है पर इसकी आदत ठीक नहीं....हाथगली है.....साबुन की तो विशेष चोर है......इसे घर में डाला तो है पर सावचेत रहना......इसके पास और कहीं काम नहीं हैं.....इसे कोई नहीं रखता.....
जब वह नई-नई आयी थी उसे लेकर हमसब बहुत खुश थे। बरसो के संचित पुण्य के समान वह हमें सेवाभाव लिए मिली थी। यह पहली ही कोई काम वाली थी जिसकी हर कोई प्रशंसा कर रहा था। सुबह से लेकर दिन ढ़ले तक लगी रहती भुआ। फिल्मों में रामू नामक नौकर की तरह घर में कामों को इतनी मुस्तैदी से करती मानो घर की सदस्या ही हो। उसके मुंह पर किसी काम के लिए मनाही तो मानो थी ही नहीं। हर काम के लिए हर समय तैयार भुआ शान्तिभाव से निरंतर काम में जुटी रहती। फलस्वरूप वह घर में सम्मान पाने लगी और उसका नामकरण हुआ ‘भुआ’। सम्मान के साथ घर में भोजन-पानी-नाश्ता सबकुछ उसे मिलने लगा। हमारी निर्भरता उस पर इतनी बढ़ गई कि वह एक घंटा भी देरी से आती तो हम सब उसके लिए व्यगz हो उठते। उस दिन जब वह पहली बार देर से आयी थी तो -
- क्या बात है आज भुआ नहीं आई? रोज तो साढ़े नौ-दस बजे तक आ जाती है। आज तो ग्यारह बज रही है।
बाऊजी ने आकर प्राथमिकी दर्ज करायी- ‘‘मेरे बाथरूम से साबुन की बट्टी चली गई। कल ही तो मैंने नई निकाली थी।’’ ताजुब्ब तो जरूर हुआ पहली बार हुए इस खुलासे पर। सबने अंदाजा लगा लिया था कि कहां गई होगी? पर कोई कुछ नहीं बोला। साबुन से अधिक सभी की बैचेनी इस बात से थी कि अगर भुआ नहीं आई तो क्या होगा? किसी को स्कूल तो किसी को मिटिंग में तो किसी को पार्लर जाना था। मोहरी पर झूठे बर्तनों का ढ़ेर, बाथरूम में गंदे कपड़ों का अम्बार लिए पूरा घर सफाई के लिए ताकता मुंह बांये अस्त-व्यस्त पड़ा था।
तभी फाटक की कुंडी बजी। देखा भुआ प्रविष्ट हो रही है। सबकी जान में जान आयी।
- साढ़े ग्यारह बज रही है, भुआ इतनी देर से क्यों आयी?
- आज मेरे अग्यारस है। मंदिर में भजन हो रहे थे जरा बैठ गई।
सचमुच श्वेत वस्त्रों में लिपटी उस अधेड़ काया के माथे पर चंदन का टीका सुशोभित होता हुआ सौम्यता के साथ उसके साध्वीभाव की गवाही दे रहा था। आकर उसने बड़ी तन्मयता से काम संभाल लिया। किसी ने उसे कुछ नहीं पूछा।
अब सभी उसकी इस बात से परिचित हो गये थे कि हर महीने की अमावस्या, पूर्णिमा और ग्यारस जैसे विशेष दिनों पर वह मंदिर में भजन करने बैठ जाती है तो आने में देर तो हो ही जायेगी। वैसे भी उसकी दौड़ कभी घड़ी से रही ही नहीं। बस आहिस्ता आहिस्ता काम को अंजाम देने में जुटी रहती। कभी कहते भुआ यह काम पहले कर लो वो बाद में करना वह तुरंत आदेश की पालना करने लग जाती।
उफ! इससे पहले जितनी भी काम वाली आयी थी कैसी जुबान दराज और तूफान मेल थी। काम किया या नहीं वो जा, वो जा और जब तक काम पर नजर पड़ती वह रफूचक्कर। महीने में चार-पांच लांघा। जब समय मिले मुंह उठाकर चले आना। बिना कहे छुट्टी मार जाना। एक से बढ़कर एक मुसीबत थी। भुआ जैसी तो कोई आयी ही नहीं। मंदिर में जरा भजन में बैठ गई तो ठीक ही है। उपवास है उसके। एक तो बिचारी विधवा और ऊपर से जवान बेटे की मौत। इस दुख से तो उसे हरि स्मरण ही पार लगायेगा।
जब मन में ऐसे शुभ विचार चलते तो बाऊजी ने भी कहना छोड़ दिया कि भुआ कब उनके पूजाघर से अगरबत्ती, माचिस या केसर डिब्बी ले गई। भुआ को किसी ने कुछ नहीं कहा। चोरी और वह भी साबुन, अगरबत्ती जैसी छोटी-मोटी चीजों की। इतने बड़े घर के जखीरे में इन छोटी-मोटी चीजों की क्या बिसात? सब्र की जा सकती है। अगर भुआ काम छोड़ देगी तो घर में मुसीबत हो जायेगी। इतने बड़े घर का काम कौन करेगा? सभी ने सचेत व सर्तक रहने की एक दूसरे को हिदायत दी और अपने अपने काम पर लग गये।
इस बीच घर के लोगों ने उसे चीजे चुरा कर खाते पकड़ा था। कभी लड्डू तो कभी पापड़ी मौका मिलते ही भुआ बिना पूछे लेकर खाने लगी। एक दिन तो भुआ पकड़ी गई। एक पोलिथीन की थैली में विम पाऊडर भरते हुए मैंने खुद पकड़ लिया-
‘‘यह क्या भुआ?’’
‘‘कुछ नहीं भाभीसा.......एक क्षण के लिए वह अचकचा गई पर दूसरे ही क्षण उसे बहाना सूझ गया ‘‘बेसिन साफ कर रही हूं’’ और वह फटाफट साफ बेसिन की ओर बढ़ गई। उसके इस तरह बेवकूफ बनाने के नाटक रचने पर मन तो ऐसा उफना कि इसे अभी हाथ पकड़ कर बाहर करे।
उसकी चोरी पकड़ी जाने पर हिदायत भरे स्वर घर में फिर उभरे।
- ध्यान रखा करो।
- कहां-कहां ध्यान रखे इतने बड़े घर में?
- ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। ये चोर है तो कोई दूसरी देखो।
- तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे काम वाली सड़क पर पड़ी हो। ढ़ूंढ़ने निकले और मिल गई।
- क्या, सब घरों में काम करने नहीं आती क्या कोई?
- इतने बड़े घर में कोई काम करने को राजी हो तब ना.....
फिर चुप्पी लग गई। दीपावली की सफाई सिर पर थी। यह चली जायेगी तो कहां से ढूंढ़ेगे नई? यह तो कम से कम जमी जमायी है। कोई बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसका सबकुछ देखाभाला हैं। दीपावली निकलने दो फिर सोचा जायेगा। पर अब तो हद हो गई पटाखों की चोरी....आने दो उसको।
वह सप्ताहभर से विशेष अवकाश पर है। ग्यारस का उद्यापन दे रही है। ‘क्या फायदा ऐसी भक्तिभाव का? चोर कहीं की।’ भुआ को लांछना देते हुए सबने लताड़ा। इस बार तो उसका हिसाब चुक्ता कर ही देंगे। दो साल हो गये उसे काम करते-करते। पता नहीं कितनी चीजों को चुरा चुकी है अब तक, जो अभी तक हमारी निगाह में नहीं आयी है। घर के सभी सदस्य एक जुट हो गये थे कि वह आये उससे पहले सभी कामों को निपटा लिया गया। बबलू, चिंकी, सोनू से लेकर सभी बड़ों ने अपने-अपने कपड़े धोकर सुखा चुके थे। झूठी प्लेटे भी साफ हो चुकी थी। पूरा घर दुzत गति से साफ हो रहा था।
दमकते घर में फोन की घंटी बजी।
- छोटे की शादी की तारीख पक्की करने की बात कह रहे थे समधीजी। एक महीने बाद ही शुभ लग्न आ रहे है।
भुआ को निकालने का विचार फिर निरस्त हो गया। छोटे की शादी में भुआ ने दत्त-चित्त होकर काम किया। खूब खाया और खुले मन से दिये गये उपहार बटोरे। कुछ छोटी-बड़ी चीजे चुरायी होंगी तब भी किसी ने ख्याल नहीं किया।
पर एक दिन तो हद हो गई। नई दुल्हन का पर्स खोल लिया और पकड़ी गई। उसे खूब लताड़ा गया। पक्की उम्र का हवाला दिया गया। उसे सख्त हिदायत थी कि वह जाये तब बताकर जाया करे। जब तक दूसरी का बन्दोवस्त न हो जाय उसे रखने की विवशता अब भी घेरे हुई थी फलस्वरूप भुआ पर पूरी सर्तकता से ख्याल रखा जाने लगा।
नई की तलाश जारी थी। कई जगह इस बारे में बात चलाई गई। अभी तक कहीं से पलटकर संतोषजनक जवाब नहीं आया। उस दिन आजाद मोहल्ले से गुजर रही थी। तभी एक परिचित आवाज कानो से टकराई। मुड़कर देखा भुआ खड़ी थी।
- पधारो भाभीसा.
- तुम यहां रहती हो भुआ?
तभी ही मन में विचार कौंधा भुआ के घर के अंदर जाया जाय। मैं उसके घर के अंदर प्रविष्ट हो गई। साफ सुथरा पक्का दो मंजिला मकान। छोटे पुत्र की विडियो शूटिंग की दुकान, दो-तीन किरायेदार, उसकी समृद्ध स्थिति पर ताजुब्ब हुआ। दालान और बरामदे से गुजरती हुई मैनें उसकी रसोई में झांका। एक परिचित चीज से नजर टकरायी- ‘संडासी’ यह तो हमारे घर की है। गुमी हुई संडासी की याद हो आयी। आगे बढ़कर मैंने उसे उठा ली और उलटने पलटने लगी।
- यह तो बिल्कुल हमारे घर जैसी है।
- छोटा बेटा अहमदाबाद से लाया था।
‘झूठी और चोर’ बुदबुदाते हुए मैंने संडासी रख दी और तेजी से बाहर चल दी।
मैं बहुत श्रुब्ध थी - ‘क्यों सह रहे है हम भुआ को? ऐसी क्या विवशता है? क्या यह हमारी परवशता नहीं?
- छोड़ो सुधी, जाने दो। क्यों परेशान हो? कई लोग आदत से मजबूर होते है।
- आदत?
सभी गुस्से में थे। एक बार फिर भुआ का निकाला जाना तय हुआ। सब एकमत होकर कमर कस चुके थे- बस! किसी तरह यह महीना पूरा हो जाय। अभी 31 तारीख आने में 4 दिन शेष थे। परन्तु छोटी नन्द के परिवार सहित छुट्टियों में आने की सूचना ने भुआ के जाने पर फिर स्थगन आदेश जड़ दिया।

Friday, November 20, 2009

मैं और तुम


उसका और मेरा संघर्ष कब शुरू हुआ ये तो मुझे ठीक से मालूम नहीं, हां इतना मालूम है कि जब मेरे हाथ पैर और आंख नाक बन रहे थे और मुझमें थोड़ी- थोड़ी हरकत शुरू हुई थी तभी मैंने अपने पड़ौस मैं अपनी ही जैसी हल्की सी सरसराहट महसूस की थी। यद्यपि वो ओर मैं अपनी अलग-अलग थैलियों में थे, सिर्फ अहसास मात्र से ही एक दूसरे की उपस्थिति का हमे आभास मिल रहा था।
उसे ज्यादा जगह और ज्यादा आराम चाहिये था, उसने मुझे धकियाना शुरू कर दिया। वो ताकतवर था और मैं दुर्बल, फलस्वरूप मैं सिमटती गई और वो मेरी जगह पर भी अपना एकाधिकार करता चला गया।
मैं गहन अंधकार और पीड़ा से मुक्त होने के लिए छटपटाने लगी। पहले बाहर आने के लिए उसके और मेरे बीच संघर्ष होने लगा। पहले आगे सरककर उसने मेरा मार्ग अवरूद्ध कर दिया, मेरा दम घुटने लगा।
जब दो दस्ताना पहने हाथों ने मुझे खींचकर बाहर निकाल, उल्टा लटका दिया तब मैं बेहद घबराई हुई थी। इसलिए रोना भी भूल गई। मेरी पीठ पर थपकियां पड़ने लगी क्योंकि मैं रूक-रूककर सांस ले रही थी। चोट के दर्द से मैं बिलबिला उठी और डॉक्टर ने मुझे सीधा कर दिया। सीधा होते ही मैंने अचकचाकर पहली बार आंखें खोली।
उसके व मेरे बाहर आने का अन्तराल केवल दस मिनिट का रहा होगा किन्तु यहां भी वहीं बाजी मार ले गया। डॉक्टर द्वारा वो बड़ा और मैं छोटी घोषित हुई।
‘‘बहुत कमजोर बेबी है, उसे इन्टेसीव में रखना होगा’’ कहते हुए डॉक्टर ने मुझे पास खड़ी सफेद स्कार्फ बांधे हुई नर्स को थमा दिया। फिर मुझे कुछ होश नहीं रहा।
जब मैंने दुबारा आंखे खोली तो एक बड़े बल्ब की तेज रोशनी से मेरा परिचय हुआ। शायद वो मुझे गर्मी देना चाहते थे। सच! पीड़ा और ठण्ड के मारे मेरा बदन अकड़ा गया था। गर्मी पाकर थोड़ी राहत मिली और मैं हाथ पांव चलाने लगी। मुझे जगता देख फिर वहां से उठा लिया गया। लम्बी कारी डोर को पार करते हुये मैं नर्स की गोदी से वार्ड तक पहुंची। मुझे मेरी मां के बगल में लिटाते हुए नर्स बोली, ‘‘टेक केयर बहुत कमजोर बेबी है।‘‘
मुझे अपने सिर पर कोमल हाथों की छुअन महसूस हुई। दूसरे ही क्षण उनकी कोमल अंगुलियां मेरे काले, घने घुंघराले बालों से अठखेलियां करने लगी मैंने स्पर्श पहचान लिया, ‘‘ये तो मेरी मां है’’ खुश हो मैं मां से सटने के लिए हाथ पांव चलाने लगी। तब तक मुझे पता नहीं था कि बाहर आकर भी तुमने सर्वत्र अपना एकाधिकार जमा लिया है। मैंने देखा एक बूढ़ी औरत जो कि आंखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा चढ़ाए हुये थी एक पोटली मां की ओर बढ़ाते हुए कहने लगी इसे दूध पिलाओ बहू ...... ओह! तो ये तुम हो।
जिसे मैं पोटली समझी थी दरअसल इसमे तुम थे और ये बूढ़ी औरत तुम्हारी व मेरी दादी मां ...... दादी मां तो मां का भी विस्तार होती है ऐसा कुछ-कुछ मुझे याद आ रहा था।
कड़क कलफदार साड़ी, ऊंचा, जूड़ा बांधे, नीचे झुकी हुई दादी के गले में मुझे लटकती हुई चमकती चीज ने आकर्षित किया और मैंने मुट्ठी में भीचं लिया।
‘‘हाय, देखो तो सही, अभी से मेरी चेन उतरवाने लगी है’’। कहती हुई वह मेरी बन्द मुट्ठी खोलने का प्रयास करने लगी। मैंने भी कसकर पूरी ताकत लगा रखी थी इसके बावजूद उन्होंने मेरी मुट्ठी खुलवा ली।
मैंने तुम्हारी और देखा, तुम मां की गोदी में गर्व से मुस्करा रहे थे। ‘मुझे भी गोदी में उठाओ’ मैं अपने हाथ पांव फैंकने लगी। मैंने बहुत हाथ-पैर चलाए पर मुझे किसी ने नहीं उठाया। अपनी इस हार से क्षुब्ध होकर मैं रोने लगी तभी दादी ने फटकारा,‘‘लड़की होकर गला फाड़ रही है।’’
भूख के मारे मेरी आँतड़ियां कुलबुला रही थी। तुम्हें मां का दूध पीते देख मेरी भूख और तेज हो उठी। मैं और तेजी से चिल्लाने लगी।
तुम इस सबसे बेफिक्र हो चपर-चपर दूध पीने में व्यस्त थे। तभी मुझे अहसास हुआ कि मैं दो सशक्त बाहों में हूँ। मैं कुछ देख पाती इससे पूर्व ही वह चेहरा नीचे मेरे मुँह पर झुक आया। अपने मुलायम गालों पर मुझे चुम्बन के साथ एक तीखी चुभन भी महसूस हुई और मैं ऊं..ऊं.. कर उठी। मुझे चूमकर चेहरा ऊपर उठा, ‘ये तो मेरे पिता है’ मैंने झट पहचान लिया। मेरे ऊं...ऊं... करने पर उन्होंने पानी की बोतल मेरे मुंह से लगा दी।
चुप हो गटगट पानी पीने लगी। मुझे पानी बेस्वाद लगा और मैं उसे मुंह से बाहर ठेलने लगी। मेरी नजरे पिता की नजरों से टकराई।
‘उसके लिए तो मां का दूध और मेरे लिए ये उबला बेस्वाद पानी’। पिता के कठोर चेहरे की नरम नरम पनीली आंखें मे जाने क्या मुझे लहराता नजर आया मानो वे कह रही हो, ’मैं इसके सिवा तुम्हें दे ही क्या सकता हूं, मेरी बच्ची।’ उन आंखों के सम्मोहन मे बंधी मैं चुपचाप पानी पीने लगी। अपनों के इस पक्षपात पूर्ण रवैये से बेखबर नींद मुझे घेरने लगी और मैं सो गई।
शोरगुल सुन मेरी नींद टूटी। देखा बहुत से मिलने वाले लोग आये हुए थे। हर आने वाला बधाई कह रहा और तुम एक गोदी से दूसरी गोदी में घूम रहे थे। मुझे समझ नही आ रहा था कि आखिर तुममे ऐसी क्या खासियत है। सिस्टर नर्स तो कह रही थी कि मैं बहुत सुन्दर हूँ ... गोरी चिट्ठी, बड़ी बड़ी आंखों वाली हूँ, बिल्कुल अपनी मां पर गई हूँ और तुम .... मुझसे बिल्कुल विपरित काले कलूटे, तभी तुमने किसी को गोदी को शू-शू कर गीला कर दिया। पर ये क्या...। फिर भी तुम्हें सब चिपकाए है।
तुम्हारी मुट्ठी में बहुत से नोट बन्द थे। ये सब तुम्हें मिलने वालो ने उपहार स्वरूप दिये थे, जिन्हें मुट्ठी में दबाये तुम मुस्करा रहे थे। मुझे लगा जैसे तुम मुझे चिढ़ा रहे हो। यह सब मैं चुपचाप पलंग के पायताने लगे झूले में से देख रही थी। जब मुझसे अपनी और उपेक्षा सहन नही हुई तो मैं सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए जोर-जोर से हाथ-पांव चूसने लगी। जब किसी ने ध्यान नही दिया तो मुझे फिर रोना आ गया।
तभी दो नन्हीं बाहें मेरी ओर बढ़ आयी मुझे पुचकारती हुई उठाने का असफल प्रयास करने लगी, ‘‘अरे-अरे उसे मत उठाओ, अभी तुम छोटी हो’’ मां ने उसे टोका।
‘‘छोटी टहा अबटो मैं दीदी बन गई हूँ।
‘‘हां तुम दीदी बन गई हो ......’’
तू अकेली ही क्या कम थी जो बहन को और ले आयी। दादी से दीदी को मिला ये उलहाना सुन मेरी मुट्ठियां भींच गई जिनकी गिरफ्त में मेरे कुछ केश आ गये और वे खींचने लगे, मैं दर्द से बिलबिला उठी।
बहुत रोने के कारण नामकरण हुआ रोनी लड़की और तुम्हारा राजा बेटा, अक्सर मैं गीले में सोयी रहती जबकि तुम्हारी लंगोट दादी आधी-आधी रात तक जागकर बदलती रहती। मां भी पहले तुम्हें दूध पिलाती, तुम्हारा पेट भरने के बाद बचा दूध मुझे मिलता। तुम्हें गोदी से उठाए दादी कहती कितना दुबला पतला है मेरा लाल जबकि भरपूर दूध पीकर तुम गोल मटोल लगने लगे थे,‘दादी झूठ भी बोलती है।’
दादी हर रोज मेरे लिए पिता से कहती, ‘‘अरे! इसके लिए अभी से धन जमा करना शुरू कर दो, बेटी है बढ़ते हुए देर नहीं लगेगी। कुछ नहीं तो बैंक में एफ. डी. ही करवा दो बेटा, आखिर शादी का दहेज जुटाना कोई मामूली बात नहीं है।’’
‘मेरे प्रति सबके मन में यह चिन्ता का कैसा बोझ’। मैं सहमकर सिसकियां भरने लगी। मां ने मुझे उठा लिया तभी गले से स्टेथोस्कोप लटकाए डॉक्टर आ पहुंची जिनसे मैं खूब परिचित थी। हर माह गर्भ में यहीं तो हमारा परीक्षण करती थी। मैंने तुम्हारी ओर नजर उठाकर कहा तुम इससे बेखबर छत ताक रहे थे।
‘‘बहुत रोती है यह’’ मां मेरी शिकायत डॉक्टर से करने लगी।
‘‘बच्ची कमजोर है, उसे तुम्हारा दूध अधिक पिलाया करो’’ और वो मुआयना करने में जुट गई।
‘‘सुन लिया माँ मैं यूं ही नही रोती’’
एक मीठी आवाज सुन मैं चौंकी। आप चाहे तो इसे मैं ले जाऊं, मैं झट पहचान गई ये तो मेरी नानी है’ जो मुझे गोदी में लेने के लिए नीचे झुकी हुई थी। बिल्कुल दादी की तरह बूढ़ी, जिस तरह दादी तुम्हें सीने से सटाती थी ठीक उसी तरह नानी ने मुझे अपने वक्ष से चिपका लिया। गर्व से में पुलकित हो उठी। मैंने तुम्हारी ओर देखा, तुम बेफिक्र हो अंगूठा चूसने में मगन थे ‘‘बुद्धू कहीं के’’, नानी आयी है और तुम पहचान भी नहीं पाये।
नानी मुझे साथ ले जाना चाहती थी इस बात पर मेरे पिता मौन थे। मैंने मां की ओर देखा उनकी आँखों मे हल्की सी चिन्ता की लकीरे उभरी हुई थी।
माँ तुम कैसे रखोगी इसे ये बहुत रोती है।’’
नानी के सामने मां का यह आरोप सुन मुझे बहुत दुख हुआ क्या मैं ऐसे ही रोती हूँ। गीले में पड़ी रही तब भी नहीं रोऊं ? क्या भूखी होऊं तब भी नहीं। यहां तक कि दादी उल्टी सीधी कहे तब भी नहीं।
नानी कह रही थी इसके लिए बकरी पाल लूंगी। उह! मुझे नहीं पीना बकरी का दूध। तुम्हारे लिए मां का दूध और मेरे लिए बकरी का दूध! पहली बार घृणा का भाव मेरे मन मैं जागृत हुआ।
आखिर यही तय हुआ कि कुछ दिनों के लिए नानी मुझे ले जायेगी ताकि मां तुम्हारी अच्छी तरह देखभाल कर सके। जाते समय पिता ने मुझे चिपका लिया। इतना कसकर की मेरा दम घुटने लगा और मैं रो पड़ी, वो मुझे पुचकारने लगे उनके कई चुम्बन मेरे मेरे गालों पर पड़ने लगे। मैंने भी कसकर उनकी कमीज पकड़ ली।
‘‘बेटी है बेटा इससे इतना स्नेह मत बढ़ाओ, कितना भी प्यार करोगे तो भी एक दिन छोड़कर चली जायेगी’’।
दादी की बात चुभ गई और मेरी मुट्ठी की बन्द कमीज छूट गई।
कुछ दिन बाद मां तुम्हें लेकर मुझे देखने के लिए नानी के यहां आयी। तुम आते ही मेरे बिस्तर पर लेट गये उस समय मैं सोई हुई थी। तुमने शू-शू करके मुझे भी गीला कर दिया। ‘तुम यहां भी आ धमके अपना एकाधिकार जमाने, आखिर क्यों?’
मुझे नींद से जगती देख मां ने मुझे उठाकर सीने से ले लगा लिया। मैं विद्रोह कर चिल्ला उठी, ‘मुझे नही आना तुम्हारी गोदी में। मैं तुम्हारा स्पर्श भूल चुकी हूं, इसमे मेरी कोई गलती नहीं, तुमने क्यों अपने से जुदा किया मां? क्या जिस जगह भैया पला-बढ़ा उस जगह मैं न पली थी? तुम्हारे ही खून से मेरा निर्माण हुआ था तो क्यों तुमने मेरे और भाई के बीच ये पक्षपात किया?’
मैंने आंखे उठा कर देखा-मां की आंखों में बन्द मोती लुढ़कने को बैचेन थे। जिन्हें उन्होंनें कठीनता से भींचे रखा था। ‘ये तुम्हारे चेहरे पर कैसी पीड़ा है मां? ये तुम्हारे आगोश में कैसी नर्म गर्मी है जिसकी आंच में मैं पिघलती जा रही हूँ ..... पिघलती जा रही हूँ। सारे शिकवे शिकायत भूलकर जमती जा रही हूँ ..... स्पंदनहीन हुई समाती जा रही हूँ मीठी नींद के आगोश में ........’

Monday, October 19, 2009

रोशनी

रोशनी
यह एक बेहद ठण्डी सुबह थी। रात भर बरसात की धीमी तेज बौछार चलती रही। रह रहकर हवा के तेज थपेड़े खिड़की के शीशों से टकरा टकराकर उन्हे झंकृत करते रहे। सर्दी में हुए इस मावठ और शीतलहर की ठण्डी हवा ने पूरे वातावरण में ठिठुरन भर दी। आकाश अभी साफतौर से खुला नहीं था।
सिस्टर बेसीला जब अतुल के घर पहुंची तो घड़ी सुबह की सात बजा रही थी किंतु अभी भी धुंधलाका पसरा हुआ था। चारों ओर छितराये मकान और खाली पड़े प्लाटों के बीच कच्ची और उबड़-खाबड़ सड़क को पार करती हुई वह अतुल के मकान तक पहुंची। सन्नाटे को चीरते हुए आगे बढ़ते हुए थ्रीव्हिलर के रूकते ही उसकी भड़भड़ाहट खामोश हो चुकी थी। बेसीला ने नेमप्लेट पढ़ी - 7 च गोकुल विहार।
हां यही घर है। उसने गर्दन हिलाई और भाड़ा चुकाया। कॉलबेल दबाने से पूर्व उसने भरपूर नजर से घर को निहारा। तो यह है अतुल का नवनिर्मित घर। कितना बुला रहा था उसे। एक बार आ जाओ। हमारा नया मकान देख जाओ। और वो उसे हमेशा ठण्डे आश्वासन ही देती रही। हालांकि उसका मकान देखने की इच्छा मन में थी।
एक्च्युल में वह बेसीला नहीं थी। मांझल थी। बेसीला तो चर्च के पादरी का दिया हुआ नाम था। मांझल अतुल की पूर्व पड़ौसिन थी। तुतलाने के कारण वह बचपन में उसे मांझल की जगह माचिस कहा करता था। बाद में भी सही बोलने के बावजूद उसने अपनी आदत नहीं सुधारी। इस नाम से उसे पुकारने में उसे अनोखा आनंद आता था। उनके बीच न खून का रिश्ता था न मित्रता का। पड़ौसी होने की, एक साथ खेलकर बड़े होने का एक आत्मीयता भरा प्रगाढ़ स्नेह था। जो कि समय बदल जाने के बाद भी, सबकुछ बदल जाने के बाद भी आज भी उसी तरह कायम था।
आज भी अतुल की स्मृति में वह घर अंकित है जो कभी मांझल का हुआ करता था। जहां वे रेत के घरोंदे बनाया करते थे। फूल पत्ती रोपकर बगीचा बनाकर उसे छोटे-छोटे शंख सीपियों से अपने नाम को लिख मांझल सजा दिया करती थी। अपने से सुंदर उसका घरौंदा देख अतुल चिड़चिड़ा उठता। तब किसी हुनुरबंद शिल्पी की तरह मांझल बड़ी गंभीरता से कहती ‘‘मेरा घर तुम ले लो मैं दूसरा बना लूंगी।’’
‘‘सच्ची में’’ अपनी विस्फारित कंचे सी आंखे घूमता हुआ अतुल अंतरिम स्वीÑति चाहता और वह सचमुच वह घरौंदा अतुल के लिये छोड़ दूसरा बनाने में जुट जाती। होनी किसे मालूम थी, वो एक काल का दिन था - सड़क हादसा हुआ और सबकुछ निगल गया। केवल मांझल बची। दस-ग्यारह साल की घायल बच्ची। फिर कुछ लोग आये थे जिन्होंने उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया था। इसके बाद वह एक अच्छे स्कूल में पढ़ने चली गई। बाद में मांझल वहां की टीचर बन गई। कभी मां के साथ मिलने चला जाया करता था अतुल। मां कुछ न कुछ ले जाया करती थी उसके लिये। एक बार उसके जन्मदिन पर अतुल की मम्मी ने उसके लिये चाकलेट भिजवाई थी। पता चला चाकलेट वह खुद खा गया और उसे एक भालू वाला छल्ला दे आया। जिसे देख वह बहुत हंसी थी। पुरानी स्मृति के उभरते ही बेसीला के होठों पर मुस्कान उभर आयी। कॉलबेल दबाने से पूर्व ही घर का द्वार खुल चुका था।
‘‘मकान ढ़ूंढने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई? अभी नई-नई बस्ती बसी है।’’ उसके हाथ से सामान लेते हुए अतुल की पत्नी वृन्दा ने पूछा।
‘‘नहीं’’ चारों ओर नजरें घुमाकर वो मुस्कुरा उठी।
मां किससे बात कर रही है, कौन आया है? एक एककर वृन्दा के तीनों बच्चे यह देखने चले आये।
बड़ा बबलू- सांवले मुखड़े पर पसरी नाक और उछलते हुए कटोरी कट बाल वाला। सफेद स्कूल यूनीफार्म पहने हुए, छोटा छोटू - कच्छा बनियान पहने सर्दी से कांपता हुआ, अभी आधा तैयार और तीसरी बिट्टू - दुर्बल देह पर शमीज और उस पर हाफ कट स्वेटर धारे हुए, बिल्ली के कान जैसे सिर के दोनों ओर पोनीटेल - रबड़बेंड से बंधे हुए।
‘‘हैलो पूसी केट’’ आकर्षित हो बेसीला ने उसे छूना चाहा। उसके बोलते ही बिट्टू मां के गाऊन के घेरे को अपने चारों ओर लपेटते हुए घूम गई। जिससे मां के गाऊन का घेरा कस गया। उसमें छिपी बिट्टू ऐसी नजर आ रहा थी जैसे कंगारू की झोली में बच्चा। वृन्दा उसे खींचते हुए झुंझला उठी -
‘‘छोड़ न! मुझे गिरायेगी। फिर मेहमान की ओर उन्मुख होकर बोली -
‘‘बैठो बेसीला चाय लाती हूं। बहुत सर्दी है बाहर। रात भर के सफर की थकान भी होगी।’’ कहते हुए वृन्दा ने बैठक के दीवान पर रजाई लाकर डाल दी।
-मम्मी मेरी बेल्ट कहां है.....
-तुम्हारे टिफिन में क्या रखूं? परांठा आचार या सैण्डविच....
-मेरी विज्ञान की किताब नहीं मिल रही.....तीनों स्कूल जाने की जल्दी में थे।
‘‘जरा बच्चों को स्कूल भेज दूं फिर हम तसल्ली से बैठेंगे।’’
हां हां कोई जल्दी नहीं। तुम निपटा लो। वैसे भी उदघाटन सत्र ग्यारह बजे शुरू होगा और वह सुस्ताने लगी। बेसीला ने कसकर रजाई अपने चारों ओर लपेट ली। सिस्टर बेसीला यहां तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षु बनकर आयी थी। वैसे तो बाल कल्याण विभाग वालों ने ठहरने की सारी व्यवस्था की थी किंतु वह अतुल के यहां ठहरने की अनुमति फादर से लेकर आयी थी।
-ओह! मम्मी देखो न यहां कितने मकौड़े जमा हो गये है।
-देखूं कहां......उफ! यह कचरा अभी तक यहीं पड़ा हुआ है।
-बबलू! बबलू · ·, तुमने रात को कचरा बाहर नहीं डाला।
-रात मुझे नींद आ रही थी मैंने छोटू से कहा था डालने को।‘‘बताया हुआ काम नहीं करता।’’कहते हुए शायद उसने छोटू के कान उमेठ दिये थे।
छोटू चीखकर रो पड़ा। दोनों के बीच तड़ातड़ शुरू हो गई। रसोई से बाहर निकल मां ने दोनों को अलग किया।
-क्या बात है सुबह-सुबह किस बात से मारपीट कर रहे हो?
-मम्मी देखो यह बड़े भाई पर हाथ उठाता है। बबलू तत्परता से बोला।
-नहीं पहले दादा ने मेरा कान खींचा था......ये मेरा बताया काम नहीं करता.....मैंने इसको कचरा डालने के लिये कहा था......मम्मी मक्काड़े.......मकौड़े.......... ही मक्काड़े...... मकौड़े........ बाथरूम में मैं नहाने कैसे जाऊं.......रोज-रोज कचरा डालने का मेरा ही ठेका है क्या......मैं नहीं डालूंगा आप छोटू और बिट्टू को क्यूं नहीं कहती......
-चुप ··, वृन्दा चीखी। उसके सब्र का बांध टूट चुका था। इस चीख चिल्लाहट में अतुल भी जाग गया था।
- ये क्या हल्ला गुल्ला हो रहा है बबलू.....छोटू। पिता के जागते ही घर में शान्ति सी छा गई। बच्चे बेआवाज मशीन की तरह बिना खटपट किये निपटने लगे।
बाहर ओटो रूकने का स्वर उभरा। ‘‘बबलू तुम्हारा ओटो आ गया है।’’
दरवाजा खुलने की आवाज से रजाई छोड़ बेसीला उठ खड़ी हुई। स्कूल जाते बच्चों से बाय कर लूं। बाहर अभी पूरा उजाला नहीं हुआ था। बरसात की नमी ने मौसम को और सर्द बना दिया था। बादल अभी भी छाये हुए थे।
-बबलू कचरे की थैली लेते जाना।
-नहीं मैं नहीं ले जाउंगा। बैग पीठ पर लटकाए बबलू बाहर रपट लिया।
-प्लीज बेटा ......
-नहीं, मेरे दोस्त हंसते हैं। लगभग दौड़ते हुए उसने जवाब दिया।
-अरे इसमें हंसने की क्या बात हुई। बाहर सड़क पर ही तो फैंकनी है। रात भर कचरा पड़ा रहने से देखो कितनी गंदगी हो गई है। मां कहती ही रह गई। बबलू ऑटो में बैठ चुका था।
-अच्छा छोटू तुम लेते जाओ।
-नहीं मां मुझे शर्म लगती है।
-इसमें शर्म कैसी घर का काम है। मेरा राजा बेटा। मां ने उसे पुचकारा किंतु दादा की तरह वह भी बैग, बोतल व टिफिन उठाये टैम्पो में लद चुका था।
अस्त व्यस्त मौन घर तूफान गुजर जाने जैसा लग रहा था। अतुल भी निवृत हो अखबार लिये आ बैठा।
‘‘कैसी हो? घर ढ़ूंढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई। फोन कर देती, मैं लेने आ जाता........ वृन्दा चाय में कितनी देर है?’’
‘‘लाती ही होगी। बच्चे अभी ही स्कूल गये है। क्या तुम्हारे यहां हर रोज ‘सुबह’ ऐसी ही तूफानी होती है।’’ बेसीला ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘‘हां, ऐसी ही तीन सुबह और तुम्हें यहां गुजारनी है।’’ जवाब देते हुए अतुल भी मुस्कुरा उठा।
‘‘किसी को पागल करने के लिये बहुत है।’’ बेसीला ने कहां और खिलखिला पड़ी।
‘‘शाम को तुम मोबाइल कर देना मैं लेने आ जाऊंगा। कब तक फ्री हो जाओगी?’’
वृन्दा चाय ले आयी। वे पीने लगे।
‘‘यह तो वहां जाकर ही पता चलेगा कितना वर्क लोड है।’’
‘‘केवल खानापूर्ति होते है ऐसे प्रोग्राम होना जाना कुछ नहीं। सबकुछ जस का तस रहता है।’’
‘‘ऐसा तो नहीं है.......’’
‘‘नब्बे प्रतिशत ऐसा ही होता है’’ अतुल अपनी बात पर बल देते हुए आगे समीक्षा करने लगा - हां, पर करने पड़ते है ऐसे प्रोग्राम। ऊपर से प्रेशर रहता है। बजट पूरा करो...... काफी फंड रहता होगा.......?’’
‘‘हां, बाल कल्याण के नाम से काफी फंड आता है......विदेशों से भी।’’
‘‘कितने भी प्रोग्राम कर लो कोई फायदा नहीं। पर यहां प्रोग्राम होने से एक फायदा यह हो गया कि तुम्हारा यहां आना हो गया।’’ और वह हंस पड़ा। उसकी इस बात पर बेसीला भी मुस्कुरा उठी थी।
तभी डोर बेल बज उठी। डिंग · डांग · डिंग · डांग ·।
‘‘आ गई......’’ चिहकती हुई वृन्दा ने दरवाजा खोला।
-दीदी कचरा है क्या.....?
-तीन दिन से आई क्यूं नहीं कितना जमा हो गया है........
जमा तो उस पर भी हो गई थी मैल की कई गर्ते। गंदेले कपड़े, मुंह और हाथ पांव पर जमी मैल ने उसकी रंगत ही मटियाली कर दी थी। बिखरे उलझे शुष्क बाल तिस पर पीठ पर लटकता हुआ कचरे का झोला। घिन आने के लिये बहुत था। पर अब तक कुछ खिन्न उदिग्न सी बैठी वृन्दा के चेहरे पर उसे देख खुशी फूट आई।
तीन पोलीथीन बड़ी बड़ी कचरे से ठूंसी थैलिया उठा लाई वह और उसे पकड़ाते हुए अतुल से बोली - जरा दो रूपये देना और अतुल ने जेब से सिक्का निकाल वृन्दा की ओर उछाल दिया।
-कुछ और.....आशा से भरी हुई थी उसकी नजरें।
-हां देती हूं......थोड़ा ठहर अभी लाती हूं। वृन्दा भीतर से जब वापस बाहर आयी तो उसके हाथों में डिब्बा व कटोरा था।
-ले.......थैली निकाल......
उसने झोले में से मुड़ी तुड़ी थैली निकाल खोली व उसमें बासी भात, तरोई परमल और रायता मिली हुई सब्जी साथ में डेढ चपाती भी उसमें उलटती गई। कल बहुत बचा था तो नहीं आई सब कुत्तों को डालना पड़ा।
‘कुत्तों को’ कहते हुए रोष उभर आया था उसके स्वर में। ‘रोज आने की’ अधिकार भरी हिदायत उसे दे, दरवाजा बंद कर वह कुर्सी पर आ बैठी और ठण्डी हुई चाय का लम्बा घूंट भर खत्म कर दी- ठण्डी हो गई।
‘‘चाय तो पी लेती कम से कम। ऐसी भी क्या जल्दी थी। वो कहीं भागी तो नहीं जा रही थी?’’
‘‘तुम क्या जानो आज पूरे तीन दिन से आयी है मरी। पूरा घर सडांध मार रहा था। खाली कप ले वह वह उठ खड़ी हुई। वर्षा की बूंदाबांदी फिर शुरू हो गई। जो दिनभर चलती रही। खाली पड़े प्लोटों में यहां वहां पानी भर गया। खुला इलाका होने से हवा तीर सी सनसनाती लग रही थी। रात भर रिमझिम चलती रही। यह इतवार का दिन था। बच्चे सोये हुए थे। वृन्दा ने राहत की सांस ली। ‘‘अच्छा हुआ आज छुट्टी है वर्ना बच्चे बेचारे ठण्डे मर जाते।’’ बबलू की टांग बाहर निकली हुई थी और छोटू की पीठ। बिट्टू तो पूरी उघड़ी हुई। मां ने तीनों को रजाई से अच्छे से ओढ़ा दिया। ममता उसके चेहरे पर फूट पड़ी।
‘‘आज सर्दी बहुत बढ़ गई है’’ सुबह उठते पहला वाक्य वृन्दा के मुंह से यही निकला था।
तभी डोर बेल बज उठी। ‘वह आ गई दीखती है’ वृन्दा उठ खड़ी हुई और उसने दरवाजा खोला। दरवाजा क्या खुला ठण्डी बयार भीतर घुस आयी।
दीदी कचरा है क्या......? वहीं रोज का रटा रटाया वाक्य।
‘‘हां लाती हूं’’ कहकर वृन्दा पलटी। वापस लौटी तो उसके हाथ में कचरा भरी थैली थी। झटपट थैली और सिक्का दे दरवाजा बंद करने के लिये उसके ठिठुरे कदम पलटने वाले ही थे कि-
-दीदी कुछ पहनने को......
उसके कातर स्वर ने उसे रोक दिया। ‘‘देखती हूं।’’
कुछ देर बाद वह स्वेटर ले आयी थी नीले रंग का।
‘‘मम्मी यह मेरा स्वेटर है इसे नहीं दोगी।’’ रजाई से मुंह बाहर निकाल बबलू चीखकर उठ खड़ा हुआ। और एक ही झटके में मां के हाथ से स्वेटर खींच लिया। फिर कुछ देर बाद -
-तुम भी अजीब हो। देने को मेरा ही स्वेटर मिला। प्योर वूल का है। अन्दर पहन लूंगा।
वह ठिठुरती हुई दरवाजे के सहारे आस लगाये खड़ी थी। हमेशा की तरह झोला उसकी पीठ पर लदा हुआ था और चेहरे पर वही मैल की जाजम बिछी हुई थी। जिस पर आज करूणा नाच रही थी सिड़कती सांस की ताल पर। ठिठुरन और नाक से उठती हुई सड़-सूं की जुगलबंदी सुबह की नीरवता को चीर रहे थे। वृन्दा ने अपना पुराना शॉल देकर दरवाजा बंद कर दिया।
बेसीला को उठता देख वह चाय ले आयी। अतुल भी आ गया। तीनों चाय पीने लगे।
‘‘ये जो तुम दया दिखाती हो न ठीक नहीं। अकेला घर है न अड़ौस न पड़ौस, यही लोग ताक लगाये बैठे रहते हैं। फिर मौका देखकर घर साफ कर जाते हैं। और बातों ही बातों मैं पिछले दिनों में शहर में हुई कई चोरियों के किस्से बयान कर दिये अतुल ने, चाय के साथ। वृन्दा का मुंह कसैला हो चुका था अब तक। हर रोज की तरह वह बिना कुछ बोले कप समेट उठ खड़ी हुई।
‘‘वापस रात को ही आओगी?’’ बेसीला से पूछा था उसने।
‘‘हां’’ बदले में संक्षिप्त सा उत्तर मिला था उसे।
आज बेसीला चली जायेगी......यह आखिरी सुबह थी अतुल के घर की। बेसीला आज जल्दी उठ गई थी। उसे जल्दी जाना था। प्रशिक्षण का आखिरी दिन और समापन सत्र के साथ और भी बहुत से काम निपटाने थे उसे। फिर शाम 8 बजे की गाड़ी थी। निवृत हो उसने अपना सामान बांध लिया और अतुल ने अपनी गाड़ी निकाल ली थी, उसे छोड़ने के लिये।
‘‘वह आज नहीं आयी ?’’ जूड़े पर आखिरी पिन लगाते हुए बेसीला ने वृन्दा से पूछा।
- कौन ?
- वहीं कचरे वाली।
वृन्दा कुछ नहीं बोली, लापरवाही से उसने कंधे उचका दिये। मानो कह रही हो कचरे से भी कम महत्वपूर्ण छोटीमोटी बात का उसे क्या ख्याल? बेसीला चली गई अतुल के साथ और वृन्दा व्यस्त हो गई अपनी गृहस्थी में।
शाम आठ बजे वे लोग प्लेटफार्म पर थे। बेसीला को विदाई देने आये थे। समय अभी शेष था गाड़ी चलने में। बेसीला के बगल में बैठे सात-आठ बच्चों को देख वह चौंक उठे।
-ये लड़कियां और लड़के....... ये तो वही बच्चें है जो कचरा बीनते हैं। बिल्कुल साफ सुथरे और व्यवस्थित और उसकी ओर तो उसकी नजरें टिकी रह गई। वह पहचान गया - तुम.....यहां? वृन्दा ने उस मटमैली लड़की की ओर इंगित किया था परन्तु बदले में जवाब बेसीला ने दिया -
‘‘इन्हें मैं ले जा रही हूं। कुछ देर की दया दिखाने नहीं’’, फिर एक-एक शब्द चबाते हुए बोली बेसीला - ‘‘पूरा जीवन संवारने.......इंसान बनाने’’।
दोनो चौंक पड़े। ‘‘धर्म परिवर्तन कर मिशन का काम कराने......’’तीखेपन से अतुल ने कहा।
‘‘धर्म? धर्म किसे कहते है? ये अबोध जिन्हें दो जून की रोटी नसीब नहीं। जिन्हें कंपकंपाती ठण्ड में कपड़े भी मयस्सर नहीं। जिनके सिर पर है नंगा आकाश और पैरों तले उबड़-खाबड़ जमीन। स्वास्थ्य शिक्षा जैसी बुनयादी जरूरतों से भी वंचित हैं जो। वे क्या जानेगें धर्म को। इनका धर्म पेट की आग से जुड़ा है।
‘‘उसी का फायदा उठाकर तुम लोग इनका धर्म परिवर्तन.....’’
बात बीच में ही लपकते हुए बेसीला ने प्रत्युक्तर दिया। ‘‘इल्जाम लगाने से पूर्व अच्छी तरह सोच लो अतुल। जहां तक धर्म की बात है मेरी दृष्टि में मानव धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं। आज तुम्हें अपने बच्चों की कितनी फिक्र है परन्तु कभी इन बच्चों के बारे में सोचा कभी?’’
‘‘मैं.......?....... भला क्यों.......? बेसीला के सीधे सवाल से अचकचा उठा अतुल।
‘‘सोचने लगा’’ वाक्य पूरा किया बेसीला ने। कोई भी नहीं सोचता दूसरों के लिये। अपनों के लिये सभी सोचते है पर मुझ जैसे अनाथों, विपत्ती के मारो का क्या होगा? किसी को तो आगे आना ही होगा। जैसे उस समय फादर ने मेरी उचित देखभाल न की होती तो मेरा क्या होता? मैं किसी धर्म को नहीं मानती।
‘‘नहीं मानती तो.......ये क्या?’’
‘‘फादर का प्रेम से दिया नाम मैंने अपनाया जरूर है पर सन्यास मैंने अपनी मर्जी से लिया है।’’ बेहद संयत स्वर में बेसीला बोली।
उस दिन वह अपनी शादी का कार्ड देने गया था तब उसने सहज ही पूछा था -
‘‘तुम कब शादी कर रही हो माचिस?’’
‘‘नहीं मैं सन्यास ले रही हूं.’’
‘‘भला क्यों?.....यह भी कोई उम्र है सन्यास लेने की?’’ वास्तव में कुछ दिनों बाद उसने सन्यास ले लिया था। वह मांझल से सिस्टर बेसीला बन गई थी। एक सच्ची संत, मानवता की महान पुजारी उसके आंखों के सामने थी। गदगद हुए अतुल वृन्दा की आंखे भर आयी।
‘‘मुझे नहीं मालूम था नाम अपना असर छोड़ता है। जो जीवन में कहीं न कहीं अपनी छाप छोड़ता है। प्रत्येक सार्मथ्यवान व्यक्ति अगर एक अबोध बेसहारा का सहारा बन जाय तो इस देश का भविष्य ही कुछ ओर होगा।’’ अतुल बुदबुदा उठा।
‘‘मुझ जैसे बहुत है इस दुनिया में जिनका मैं सहारा बन सकती हूं। जिनके उपयोग में मेरा जीवन आ जाये तो मेरे एकमात्र परिवार में जिन्दा बचे रहने की सार्थकता होगी। मेरे भीतर जब तक अपने साथ गुजरी त्रासदी की आग दफन है मैं दूसरों के जीवनदीप जलाती रहूंगी।’’ इतना कहकर वह हंस दी।
‘‘बिल्कुल माचिस की तरह, खुद जलकर दूसरों को रोशन करती रहोगी।’’ उसकी ये निश्छल हंसी ही तो बहुत अच्छी लगती थी अतुल को।
गाड़ी धीरे धीरे पटरियों पे सिरकने लगी। वृन्दा अतुल ने अपनी नम आंखे पौंछी और कूपे से नीचे उतर आये। बच्चे, वृन्दा व अतुल आगे बढ़ती गाड़ी को हाथ हिलाहिला अलविदा कहते रहे जब तक खिड़की से झांकती उस संत की दिव्यता रफ्तार के साथ बिन्दु में बदल विलीन न हो गई।

Friday, October 9, 2009

रिंगटोन



बेटी का फोन था
‘मुझे बचा लो मां’ का रिंगटोन था
कल फिर उन्होंने
मुझे मारा और दुत्कारा
तुम औरत हो
तुम्हारी औकात है -
पैर की जूती
जूती ही बनी रहो
खबरदार!
जो सिर उठाने की कोशिश की
तो कुचल दूंगा
देखा नहीं क्या
तुमने कल का अखबार
कल का नहीं तो
परसों का ही देख लो
रोज छपती है
तुम जैसी कितनी ही
बेमौत मरती है
मेरा क्या कर लोगी?
यहां तो पुलिस भी बिकती है
जिसकी लाठी
भैंस उसी की ही होती है
जिसे समझती हो तुम
अपना खूबसूरत चेहरा
उसी को वो तेजाबी जलन दूंगा
कि फिर तुम ना कहने से पहले
सोचोगी दस बार,
सैकड़ों बार, हजारों बार
बेटी का फोन था
मुझे बचा लो मां का रिंगटोन था

Friday, October 2, 2009

बूढ़ा जाते है मां बाप


टूटता है जब मनोबल

तो घर देता है सम्बल
घर में -

मां है , बाबूजी है
जिनकी छाह तले
और भी किले है ।

नेह के धागों में
मन के मनके पिरोकर
छककर करता है अमृतपान
फिर बढ़ता है -दरखत मनोबल का
धीरे-धीरे
उन पर चढ़ने लगती है
स्वार्थों की फंफूद
बरगदसी बाहें फैलाये
आकाशीय जड़े महत्वकांक्षाओं की
तोड़ लेती है
सारे सरोकार, और
क्षणांश में
बूढ़ा जाते है मां बाप