Friday, May 28, 2010
जिन्दगी यहां
Saturday, May 8, 2010
कहां खो गये
जागे थे भाग कभी
बजे ढ़ोल, बंटे बताशे भी
लोरी और पालने के स्वर भी वहीं
फिर आज न जाने वे नन्दलाल कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
नहला धुलाकर
साफ-सुथरे कपड़े पहना
लगा दिये थे तूने काजल के टीके
फिर आज न जाने वो झूलेलाल कहां खो गये ?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
कई दौरो में
ऐसा भी इक दौर आया
तब मां मैंने तुझे खूब नचाया था
फिर आज न जाने सारे चुम्बन कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
पुरवाई चली जोरसे
या बिजली ने ली अंगड़ाई
दुबके सिमटे ये उत्पाती पतंगे
फिर आज न जाने किस छोर में कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
टिफन और तरकारी
के ताने बाने बुना करती थी
भोर सवेरे में
फिर आज न जाने वो सितारे कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
सुनो विशाखा की मां
आओ तो दिलावर की अम्मा
सम्बोधन के तार
फिर आज न जाने ढ़ीले कहां से हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
पल्लू में लिपटे
पल्लू छूटे तो दुख सताये
तुझे बिन बताये
फिर आज न जाने वे छैने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
डांटकर तो कभी
पुचकार कर तूने सिखाये थे
चाहत के सबक
फिर आज न जाने वे सबब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
झरबेरी हो चाहे
खट्टी-मीठी, तेरी नयनों का मधु
बरसा था दिनरैन
फिर आज न जाने तेरे दीवाने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
तूने जनी संताने
गूंजे भी थे तेरे घरोंदे
खामोश सदा के लिए
फिर आज न जाने ये वीराने क्यों हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
आंचल को फैलाये
तूने तो ढ़क दिये थे
सबको गिन गिनकर
फिर आज न जाने सभी शावक कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
ना कोस किस्मत को
ना दे कर्मो की दुहाई
जमाने की द्रुत गति में
फिर आज न जाने हम सब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।
Thursday, April 29, 2010
विश्वास
मैं ‘सुसाईड’ कर रही हूं। मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। कमरे के सभी खिड़की दरवाजे भीतर से बंद कर दिए है और टी. वी. चालू करके उसकी आवाज तेज कर दी है ताकि बाहर मेरे मम्मी पापा को भी किसी तरह की भनक ना लगे कि मैं क्या करने जा रही हूं। मैंने पंखे से साड़ी बांधकर फांसी का झूला बना लिया है और अब इस पर लटकने वाली हूं। लटकने से पहले सोचा आपसे बात कर लूं ताकि अपने आप को निर्दोष साबित कर सकूं। इसमें मेरा कोई दोष नहीं .......
आपके पास किसी का फोन आये और ये कहे तो? इतना सुनते ही आपके होश उड़ जाते। मेरे साथ भी यही हुआ। घबरा कर मैंने उससे कहा- ‘‘रूको, रूको · · तुम कौन हो?’’
‘‘आपने मुझे पहचाना नही? मैं सुखबीर हूं। उस उस दिन बस में आपसे मिली थी। पाली से जोधपुर के सफर के दौरान और वहीं मैंने आपके फोन नम्बर लिए थे। मुझे पता था कभी न कभी आपके फोन नम्बर मेरे काम आयेंगे। और आज जब मैं मरने जा रही हूं तो केवल आपको ही बताना चाहूंगी कि मैं बिल्कुल निर्दोष हूं। उन्होंने बेवजह मुझ पर शक किया और झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्होंने......’’
‘‘अरे! सुखबीर बात क्या हुई ?’’ उसकी बात मुझे बीच में काटनी पड़ी।
‘‘कुछ नहीं मेडम, अब मुझसे सहन नहीं होता। मेरी शक्ति चुक चुकी है। अब एक पल भी मैं जीना नहीं चाहती। मेरे बच्चे का कुछ पता नहीं और मेरा सामान......(सिसकी उभरती है उसकी) वे मेरा सारा सामान पैक करके यहां पीहर छोड़ गये है।’’ यह कहकर वह फूट फूटकर रोने लगी।
बड़ी असंमजस थी क्या कहूं? मैंने कहा -‘‘सुनो सुखबीर तुम सबसे पहले अपना फोन बंद करो। मैं तुम्हें फोन लगाती हूं.................. मैं फोन लगा रही हूं। कहते हुए मैंने फोन काट दिया।
मैंने दीर्घ श्वास खींची। देखा, मेरे सिर से पसीना चुह रहा है और दिमाग सुन्न। दिल जोर-जोर से
धड़क रहा था। याद आया वह पल जब मैं पाली से जोधपुर जा रही थी। मेरे पास पानी से भरी बोतल थी। मेरे साथ वाली सीट पर बैठी युवती की गोद में दो-ढ़ाई बर्ष का बच्चा था। वह बार-बार अपनी मां को तंग कर रहा था। मैंने ध्यान दिया बच्चे की पानी की बोतल खाली हो चुकी थी और शायद वह मेरी बोतल से पानी चाहता था। इसके लिए वह बार-बार अपनी मां को कोहनी मार रहा था।
‘‘क्या चाहिए?’’ बात को समझते हुए मैंने बच्चे से पूछा।
मेरे कहने पर वह कुछ बोला तो नही बल्कि रूठता हुआ मां को देखने लगा।
‘‘पानी चाहिए?’’ मेरे दोबारा पूछने पर उसने गर्दन हिला दी।‘‘यह लो’’ उसकी स्वीकोरक्ति पाते ही मैं अपनी बोतल का ढ़क्कन खोलने लगी। मैं उसे पानी देने को तैयार थी तभी उसकी मां ने कहा-‘‘मेडम, आप थोड़ा ही पानी देना। जब से बस में बैठा है यह पानी ही पी रहा है। पूरी बोतल पी गया है इतने से रास्ते में।’’ उसने थोड़ा पानी लिया और पूछने लगी - आप कहां जा रही है?
-जोधपुर
-वहीं रहती है?
-नहीं अस्पताल का काम है।
-अस्पताल का?
-हां, मेरी समधिन का फोन आया था। उनकी बेटी की प्रसूति होने वाली है।
-तो आप चिकित्सक है?
-नहीं, मेरे पास रहने से उन्हें तसल्ली रहेगी। मुझ पर बहुत विश्वास है उन्हें। विश्वास ही बड़ी पूंजी है। कहते है विश्वास के सहारे आदमी जीता है विश्वास के बिना आदमी मर जाता है।
-बात तो आपकी 100 प्रतिशत सही है।
-विश्वास की इस अहमियत पर मेरी मां अक्सर एक किस्सा सुनाया करती थी। सफर काटने की गरज से मैंने बातचीत का सूत्र आगे बढ़ाया। वह कहती थी, बात उस समय की है जब छप्पन का अकाल पड़ा था। लोगों के घरों में खाने को एक दाना नहीं था। भूखे मरते लोग भूसा खा रहे थे। भूख से बेबस लोग नमक-आटे के बदले अपने बच्चो को बेचने लगे थे। ऐसे दुष्काल से निजात पाने के लिये अब पलायन ही एक मात्र रास्ता था। काफिले के काफिले गांव छोड़कर जाने लगे। ऐसे ही एक दम्पति का बुरा हाल था। चार दिन से बच्चो ने कुछ नहीं खाया था वे लगातार रोटी मांग रहे थे और रोटी थी नही। भोजन के अभाव में उनको बिलबिला कर मरते देखना उनकी बर्दाश्त के बाहर था। इधर सारा गांव खाली हो चुका था। आखिरी काफिला था। लोगों ने उन्हे अंतिम बार साथ चलने के लिए पूछा तब विवश हो उन्हे निर्णय लेना पड़ा। वे जाने लगे तो बच्चों ने उनके तार-तार हुए कपड़े पकड़ लिए। पूछने लगे आप सब कहां जा रहे है? क्या आप रोटी लेने जा रहे है? एक बच्चे ने पूछा तो बेबस माता पिता को बहाना मिल गया और मां ने आंसू रोकते हुए अपने बच्चो से कहा- हां, हम रोटी लेने जा रहे है।
विदा लेते पिता ने कहा- तब तक तुम यहां खेलते रहना। हम जल्दी ही रोटी लेकर लौट आयेंगे।
छ: माह गुजर गये। वर्षा हुई तो समय सुधरा। सुकाल आया तो लागों के काफिले पुन: अपने गांव की ओर लौटने लगे। वह दम्पति भी पहुंचे। दुखी मन से उन्हांेने अपने घर का दरवाजा ठेलना चाहा। जानते थे अब उनका सामना बच्चो से नहीं उनके कंकाल से होगा। वह दरवाजा ठेलते इससे पूर्व ही हंसते-खेलते बच्चो ने माता पिता की आवाज पहचान दरवाजा खोल दिया। बच्चो को सही सलामत पा दम्पति के हर्ष ठिकाना नहीं रहा। अभी वह स्थिति से उबरे भी न थे कि बच्चो पूछा - आप रोटी लाये?
उन्होंने मना कर दिया- हम रोटी तो नहीं लाये। हमें क्या मालूम था कि तुम जीवित....
अभी उनकी बात मुंह में थी कि ‘ना’ सुनते चारो बच्चे वहीं जमीन पर गिर गये। माता पिता ने उन्हें संभाला तो उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
कहने का तात्पर्य है कि छ: महीने तक बच्चे भूखे प्यासे होकर भी इस विश्वास के सहारे जीवित थे कि हमारे मां-बाप आयेगे और रोटी लायेंगे। किन्तु जैसे ही उनका विश्वास टूटा वे वहीं खत्म हो गये। तब से यह बात प्रचलित हुई कि आदमी विश्वास के सहारे जीता है और विश्वास के टूटे मरता है।
आपकी बात बहुत सही है आंटी।’’ उसने भाव विभोर होकर बड़े अपनत्व के साथ उसने मुझे कहा। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही है। मेरा नाम सुखबीर है और यहां पाली में मेरा पीहर है। जोधपुर में मेरी ससुराल है। मेरे पति मेरी जेठानी के कहे पर चलते है। जेठानी मेरे बारे में उल्टी सीधी बाते करके उन्हे मेरे खिलाफ भड़काती है और ये है कि आंख मूंद कर अपनी भाभी की बात को सही मानते है।
-तुम्हारी सास कुछ नहीं कहती?
-जेठानी के आगे सास की भी कुछ नहीं नहीं चलती। बड़ी तेज है वह। सब उससे डरते है। उसकी नजर हमेशा मेरे पति की कमाई पर रहती है। शादी के पहले तो वह सारा पैसा उसको दे देते थे तो चलता था पर अब हमें भी अपनी गृहस्थी बसानी है कि नहीं? इतना कहकर वह रूक गई और मेरी ओर देखा। मेरा समर्थन पाकर वह आगे कहने लगी-‘‘जी आज एक बच्चा है कल को बड़ा होगा। अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए पैसा भी तो चाहिये। आजकल स्कूल वाले डोनेशन मांगते है तब जाकर एडमिशन हो पाता है अच्छे स्कूल में। मेरी बहन को भी पचास हजार देने पड़े थे बबली के एडमीशन के समय । जी क्या क्या बात कहे? आजकल मंहगाई देखो न सुरसा की तरह बढ़ती ही जा रही है। सब दे देंगे तो कहां से लायेंगे पैसा? मांगेगे तो वह तो ठेंगा ही बताने वाली है जी।
मैंने उसे ब्रेक देते हुए पूछा- ‘‘तुम्हारे पति करते क्या है?’’
-जी मेडमजी, सब्जी मार्केट में रेडीमेड कपड़ो की दुकान है। रब की दया से गल्ला भी अच्छा आ जाता है। रोज के पांच-छ: हजार तो घर ले ही आते है। इसी बात को लेकर तो वह कुढ़ती है।
-तुम अलग क्यों नहीं हो जाती? मेरे इस सुझाव पर वह व्यग्रता से झल्ला उठी- ‘‘रे बाबा! अलग की बात मैं मुंह से निकाल भी नहीं सकती। मेरे पति मुझ पर नहीं भाभी पर एतबार करते है। खाना भी उसीसे मांगते है और गल्ला भी उसे ही सौंपते है। मेरी तो हर बात में उन्हें कमी ही नजर आती है। हर बात में कहते है - सुख्खी भाभी से सीखा कर जरा।
‘‘फिर तुम्हें बुरा लगता होगा। गुस्सा आ जाता होगा। और मुंह फुलाकर बात करना बंद कर देती होगी। तब वह तुम्हें मनाते है या नहीं?’’ मैंने उसे हल्का सा छेड़ा।
‘‘नहीं आंटी, जब तक मुझे रूला न ले उन्हें शान्ति नहीं होती। तंग आ गई हूं इस मैं रोज की किच किच से।’’ बातों का सिलसिला जो चला तो वह गंतव्य आने पर ही थमा। मेरे उतरने से पहले ही उसने वायदा लिया था कि मैं उसके फोन का जवाब जरूर दूंगी।
‘‘ठीक है, मैं दूंगी जवाब।’’
.................और आज ये अप्रत्याक्षित रूप से यह फोन.......मैं बड़ी विचित्र स्थिति में अपने आप को पा रही थी। कैसे और क्या किया जाय? वो भी केवल फोन पर। वह कहीं कुछ कर न बैठे इस दबाव के चलते दूसरे ही पल मेरी अंगुलिया उसके फोन नम्बर पर घूमने लगी। एक घंटी के जाते ही सुखबीर ने फोन उठा लिया था।
‘‘हलो आंटी, जल्दी बोलिये।’’
‘‘मरने के लिए इतनी तत्परता? मैंने कड़ाई से पूछा - ‘‘सुखबीर क्या हुआ मुझे सबकुछ विस्तार से बताओ।’’
वह बोली- ‘‘मेरी कोई गलती नही और फिर रोने लगी।’’
-तुम्हारा बेटा कहां है?
-मुझे नहीं मालूम।
-तुम्हारे पति कहां है?
-पता नहीं।
-तुम्हें बिना बताये वह कहीं चले गये है?
-हां।
-जब वह गये तुम कहां थी?
-मैं जयपुर गई हुई थी।
-कौन था तुम्हारे साथ?
-मेरे दीदी जियाजी।
-जाने से पहले पति से पूछा था?
-हां, पर उन्होंने मना कर दिया था।
-फिर तुम क्यों गई?
-दीदी ले गई थी। दीदी के मकान की रजिस्ट्री होने वाली थी। दीदी चाहती थी कि मैं उनके साथ जाऊं।
-लगता है तुम्हारे चले जाने से तुम्हारे पति नाराज हो गये।
वह कुछ नहीं बोली सुबकती रही।
-फिर किया हुआ? जब तुम लौटी तो पति ने झगड़ा किया?
-नहीं · वह सिसक उठी। मेरे लौटने से पहले ही वह मेरा सामान पैक करके मेरे पीहर छोड़ गये। मेरे बेटे और पति को मैंने लौटने के बाद देखा तक नहीं।
-ओह! सुखबीर गलती तो तुमसे हुई है।
-मैंने और गलती? नहीं जी....
-हां सुखबीर, अपने यहां शादी के बाद पत्नी इस तरह पति की इजाजत के बिना चली जाय तो वह बर्दाश्त नहीं करते।
-मैं किसी ओर के साथ तो गई नहीं थी। अपनी दीदी के साथ ही तो गई थी। मेरी इच्छा थी कि मैं भी दीदी का मकान देखूं। ये तो कहीं ले जाते नहीं खुद ही अकेले चले जाते है और वो भी मुझे बगैर बताये तब?
-वो तो ठीक है सुखबीर यह तुम समझ रही हो। किन्तु तुम्हारे पति ने तो इस तरह से सोचा नहीं न। और वह तुमसे नाराज हो गये।
-ठीक है आंटी वो मुझसे ना बोले पर मेरा बेटा? जाने किस हाल में होगा वह.....
-जहां भी होगा सुरक्षित ही होगा। तुम अपनी चिन्ता करो ।
-आप कह रही है तो मुझे भी अब लग रहा है कि इस तरह बिना बताये मुझे भी नहीं जाना चाहिये था। पर इसका मतलब यह तो नही कि वह मुझ पर शक करे और घर से ही निकाल दे। अब चार दिन बाद दीपावली का त्यौहार है। मुझे यहां आस पड़ौस वाले देखेंगे तो क्या समझेंगे। मेरे मम्मी पापा उन्हें क्या जवाब देगे? आपको पता है इस डर के मारे मैं बाहर तक नहीं निकली हूं। बंटी से भी नहीं मिली। कहीं लोग ये ना पूछ ले कि त्यौहार पर तुम इधर कैसे?
-सुखबर प्लीज, तुम लागो कि चिन्ता छोड़ो। एक दो दिन में तुम्हारे पति का गुस्सा उतर जायेगा और वह तुम्हें लेने आ जायेंगे।
-सच! आंटी ऐसा होगा? उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा? फिर तो मैं भी सॉरी बोल दूंगी।
-आज तुम्हे भी तो महसूस हो रहा कि तुमसे कहीं भूल हुई है।
-आं आंटी। उसकी स्वीकारोक्ति के बाद मैंने पूछा- मगर गलती तो तुम अब करने जा रही हो। क्या मरने से इसका समाधान हो जायेगा? और तुम आत्महत्या करके मर गई तो जो शक तुम पर किया गया है उस दोष से कैसे मुक्त हो सकोगी?
वह मौन रही। कुछ पल बाद मैंने कहा- ‘‘अपने को निर्दोष तुम तभी साबित कर सकती हो जब जीवित रहोगी। वर्ना तुम अपने साथ यह झूठा कलंक लेकर जाओगी।’’
-ओह! यह तो मैंने सोचा नहीं था। अब क्या करूं आंटी?
-तुम नार्मल हो जाओ। एक दो दिन इंतजार करो या तो वह आयेंगे या तुम्हारे पास उसका फोन आयेगा। उन्होंने यह सब गुस्से में किया है और तुम भी यह सब गुस्से में ही कर रही हो। गुस्सा करना अच्छी बात नहीं। पति पत्नी में रूठना मनाना तो चलता रहता है।
-देखती हूं।
इतना ही कहा था उसने और फोन कट गया। इसके बाद उसका कोई फोन नहीं आया। मेरे मन में बराबर उथल पुथल लगी रही कि सुखबीर का पति आया या नहीं? उसे बच्चा मिला या नही? कहीं झगड़ा और बढ़ तो नहीं गया। अनेक बुरी बाते मन में घूम रही थी। फिर भी मन में यह विश्वास अपनी जड़े जमाये हुए था कि शुभ शुभ सोचो। अच्छा ही हुआ होगा।
दीपावली धूमधाम से आयी और अपनी रौनक बिखेर कर चली गई।
मैं थोड़ी फुर्सत में बैठी अपने मोबाईल पर आये एस.एम.एस. पढ़+ रही थी। एक हिन्दी में आये एस.एम.एस. पर मेरी नजर पड़ी- ‘दीपावली की शुभकामनाएं’ और नीचे नाम सुखबीर का देख मैं चौंक उठी। क्षणभर में यह सोचकर राहत मिली कि वह जीवित है यानि उसने आत्महत्या नहीं की। दूसरे ही पल मैंने उसका नम्बर डायल कर दिया। उधर से सुखबीर का चहकता हुआ स्वर सुनाई दिया -
‘‘थैंक्यू आंटी। आपके आर्शीवाद से हमारी दीपावली बहुत अच्छी मनी। अब मैं अपने घर आ गई हूं और बहुत खुश हूं।’’
-सही कह रही हो सुखबीर? कहते हुए मुझे अपना स्वर आद्र लगा। ‘‘और वो लड़ाई?’’
-नहीं आंटी हमने अब नहीं लड़ने की कसम खा ली है। उन्होंने मुझसे और मैंने उनसे क्षमा मांग ली है। वो मुझ पर विश्वास करेंगे और मैं उन पर......................
Friday, April 23, 2010
हर बार
कि हर बार
मुझे ही हारना होता है
फिर चाहे वह
मेरी तरूण अवस्था हो
या यौवन का मधुमास
मेहनत का फल
क्यों खट्टा ही
पकता है मेरी
अम्बुए की डाल
मेरे सामने हर बार हार ही होती है
जीत से तो वास्ता
मेरा कभी पड़ा नहीं
छद्म रूपधारी देवताओं की तरह
उसे तुम पहले ही हथिया लते हो
क्यों मुझे भोगना होता है
सारा का सारा
कुंठा और संत्रास
सीता हरण का अंश हो
या अग्नि परिक्षण का दंश
उठती है अंगुली तुम्हारी
हरदम मेरी ओर
जो मुझे बोना करती
बोनसाई कर देती है
खुद अपनी ही नजर में
कठघरे में हरदम
घिरी मैं ही क्यों होती हूं
क्यों नहीं मैं खुलकर
हंस पाती हूं
महफिल की मैं बात नहीं करती
अपने ही घर में
जी भी नहीं पाती
कई बार पूछती हूं मैं अपने आप से
ये सवाल
क्यों जीत पर मेरा नहीं अख्तियार
क्यो होता है मेरे साथ ऐसा हरबार
Saturday, April 3, 2010
आज का दिन
आज का दिन खूनी था शायद, तभी तो- अभी वह घर से निकलकर पचास कदम आगे बढ़ भी नहीं पाया था कि........
बस! एक मोड़ ही मुड़ा था। सीधी और चौड़ी सड़क थी। सुबह के सात बजे वह निकला था, तब हल्का धुंधलाका था पर अब सात बजकर पांच मिनिट होने को हैं, चारों ओर पूरा उजियाला पसर चुका है। स्ट्रीट लाईट बंद हो चुकी है। वीरान सी सड़कों पर कुछ इक्के दुक्के लोगों के होने का एहसास भर हुआ था उसे।
वे लोग- उनके चेहरे कपड़े से लिपटे हुए थे। उसे लगा वे सफाई कर्मचारी है, आज शायद सड़क पर कोई विशेष सफाई अभियान हो। पर वह गलत था। वह सफाई करने वाले नहीं थे, बल्कि हमलावर थे। यकायक उन्होंने आकर उसे घेर लिया और प्रहार के लिए जैसे उनके डण्डे उठे, वह भागा। उसने न इधर देखा न उधर बस पांव जिधर उठ गये वो सरपट दौड़ पड़ा। उसने बेतहाशा दौड़ बढ़ाई। वे पीछे थे, कुल गिनती में चार लोग।
वह दौड़ रहा था और दौड़ते-दौड़ते ही उसने निर्णय किया- कहीं पनाह लेनी होगी। एक घर सामने था- मिश्राजी का।
वह उन्हें अच्छी तरह जानता था। घर की फाटक खोल भीतर घुसने में वह सफल हो गया। दरवाजे तक पहुंच पाता इससे पूर्व ही उन हमलावारों में से एक के लठ्ठ का प्रहार उसके पांव पर गिरा। पिंडली पर लगी भंयकर चोट के कारण वह थोड़ा लड़खड़ाया इतने में दूसरा प्रहार उसके कंधे को तोड़ गया। वह संभल नहीं पाया। वहीं अपने सिर को दोनों हाथों से बचाते हुए उकड़ू बैठ कर सहायता के लिए पुकारने लगा। अब तो वे चारों उस पर पिल पड़े। वे उसे इस तरह पीट रहे थे मानो रूई धुन रहे हो। तड़ातड तड़ातड़, प्रहार पर प्रहार। उसकी भयानक चीखे और डण्डे बरसने की आवाजे दोनों घुलमिलकर खौफनाक रिदम बन गई थी।
जानलेवा हमला हो रहा था उस पर। डण्डों के अगले मुहाने पर लगभग 6 इंच तक कीले ठुकी हुई थी। जो पिटाई के साथ साथ उसकी चमड़ी भी उधेड़े जा रही थी। धड़ाधड़
धड़ाधड़........
आज का दिन ममता भरा दिन था शायद, तभी तो- सड़क बुहारते हुए उसकी नजर इस हमले पर गिरी। वह झाडू हाथ में लिए हुए अपनी सरकारी ड~यूटी पर थी। सड़क से कचरा हटा रही थी। इसी दौरान उसे दौड़ते हुए बूटों का स्वर सुनाई पड़ा। सामने देखा- एक युवक के पीछे कुछ लठैतों को दौड़ते हुए। वह कुछ समझ पाती तब तक वह लड़का एक घर के भीतर घुस गया, पर वह वहीं बाहर संकरी बाऊंडरी में फंसकर धिर चुका था। वे उसे निर्दयता से पीट रहे थे। वह उस जगह के लिए दौड़ी जहां ये हादसा हो रहा था। उसने उन्हें रोकते हुए ललकारा- ‘‘खबरदार जो किसी ने अब इस पर हाथ भी उठाया तो.......क्या मार डालोगे उसे?कमीनों · · ...... एक निहत्थे पर चार चार पिल रहे हो। शर्म नहीं आती तुम्हें.......दफा हो जाओ यहां से नहीं तो एक एक को टांग तोड़कर .....’’दहाड़ते हुए उसके हाथ में झाडू मजबूती से कुछ इस तरह ऊपर उठ आया मानो एक सशक्त हथियार हो। उसने हमलावरों में से एक का हाथ पकड़ कर धक्का दिया और घेरे को तोड़ती हुई भीतर घुस कर उसने अपना आंचल पीटने वाले पर फैलाकर ढ़कने की कोशिश में वह उससे लिपट गई। इसी बीच एक वार से खनखनाकर कांच की सारी चूड़िया झड़ गई।
अचानक हुए इस व्यवधान से हमलावर कुछ ठिठके। वह गुस्से में भरी हुई फिर बरसी- ‘‘कुछ तो शर्म करो। ओ मोहल्ले वालो क्या तुमको कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है ? आंख कान वाले
अंधों-बहरो.....जरा सुनो तो....क्या सबके सब नपुसंक होकर दुबके बैठे हो? खोलो, अपने दरवाजे खोलो......’’
समय की नजाकत को समझ हमलावर भाग खड़े हुए। अब वह उस भयभीत युवक को सहला रही थी। अपने आंचल से उसके बहते खून को पौंछते हुए उसने पुचकारा- ‘‘क्यों ये दुष्ट तेरी जान के पीछे पड़े थे...........कहां कहां चोट लगी तुझे......मुझे बता तो......’’
अब तक दबे बैठे, या तमाशा देखने वाले सभी लोग बाहर निकल आये थे। सभी के मुख से उसके गुणगान हो रहे थे। कोई कह रहा था.......जन्म देने वाली से भी बढ़कर, नवजीवन देने वाली मां’’, किसी ने कहा- ‘‘उसके जीवन की रक्षा कर सचमुच वह यशोदा मैया बन गई है।’’ यहां वे इस बात को सब नजरअंदाज कर चुके थे कि यहीं वो महिला है जिसने अभी-अभी मोहल्ले वालो को गाली गलौच दी थी। उन्हें बेशर्म और खुदगर्ज कहकर उनकी गैरत को ललकारा था।
आज का दिन शायद मानवीय सभ्यता के कलंक अछूत दर्शन का भी था। तभी तो- मुर्दा बस्ती के उन लोगों ने यह भी कहा था- हरिजन स्त्री है, इसे क्या मुंह लगाना यह तो हर रोज ही सड़क बुहारने आती है।
‘जल ही जीवन है’ जिसे वह घायल युवक मांग रहा था। वह युवक जो कि उनकी पिछली सड़क पर रहने वाले डगवाल सा. का बेटा था जिसे वे भलीभांति पहचानते थे। कोई भी उसे पानी नहीं दे रहा था क्योंकि वह उस हरिजन स्त्री की गोदी में गिरा पानी मांग रहा था। एक मेहतर ने इसे छू लिया है। अब कौन अपना धर्म भ्रष्ट करें?
मैया अपने आंचल से उस पर हवा कर रही थी। पर पानी...? पानी...वो कहां से लाती? तमाशाबीन लोग खामेश से इस बेबसी का अनोखा खेल देख रहे थे। उसने हाथ जोड़कर मोहल्ले वालो से प्रार्थना की। तब जाकर किसी एक का मन पसीजा और विकल्प के रूप एक आईडिया उसको क्लिक हुआ होगा तभी तो वह एक डिस्पोसेबल ग्लास में पानी भर कर दूर रख गया। उस मैया ने उसे सहारा देकर उठाना चाहा तो वह उठ नहीं पाया। उसका कंधा झूल गया। मैया ने चम्मच के लिये फिर याचक दृष्टि दौड़ाई। कोई समझकर प्लास्टिक का चम्मच लाता इससे पूर्व ही उस युवक की पत्नी दौड़ती हुई चली आई। उसके पीछे पीछे उसकी सगी मां भी थी। सचमुच यह एक संवेदनाशून्य दिवस होता अगर वे लोग नहीं आयी होती तो? उनके आने से सोये लोगों की संवेदनाएं अब जाग चुकी थी।
आज का दिन एक सुनियोजित अपराध का भी था। पूरणमल ठेकेदार बरसो से वर्मा स्टील कम्पनी में टेण्डर भरता आ रहा था। अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि टेण्डर उसे न मिला हो या किसी ने कोई मीनमेख भी निकाली हो। बरसो से वेस्ट का मलबा वही उठाता आ रहा है। इस बार देखो- ये नया नया लड़का क्या आया, अकल की गर्मजोशी दिखाने लगा। जोड़ बाकि की गणित तो पिछले भी सब जानते थे पर वे सब भरी पूरी उम्र के घर गृहस्थी वाले लोग थे। उनकी भी अपनी जरूरते थी। पैसे के बिना सब सून, सेटल था ऊपर से लेकर नीचे तक।
‘‘अब इसने आकर ऊपर बैठे अफसर को कौनसा पान चबवाया कि इस बार का टेण्डर उसके हाथ ही निकल गया। मेरा तो सारा धंधा ही चौपट कर दिया इस कल के लौंडे ने.......’’पिच्च करके पीक थूकते हुए पूरणमल ने इस छोरे को सबक सीखाने की ठान ली थी। किसी को कानों कान खबर न हो और काम हो जाय। ऐसा ही तरीका था पूरणमल का।
आज का दिन भंयकर असमंजस से गुथमगुत्था होने का दिन भी था शायद। किसने हमला करवाया? कौन थे हमलावर? क्या रंजिश थी? कुछ लूटकर तो नहीं ले गये?
सब यथावत था। जेब को हाथ तक नहीं लगाया गया, घड़ी, चेन, मोबाईल सब यथावत थे तो फिर क्यों जानलेवा हमला हुआ? किसलिए और किसने किया अपराध? जितने मुंह उतनी बाते। जितनी संवेदनाएं उतने दिमाग। खोज लाये दूर की कौड़ी पर-
किराये के अपराधी कहीं पकड़ में आते हैं क्या? आज का दिन अपराध का ही नहीं भ्रष्ट प्रशासनिक दर्शन का भी था। पिटाई करने वालो के खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज हुई। किसने हमला करवाया और कौन थे हमलावर, आखिर पता लग ही गया।
जब सब खोज खबर हो गई तो क्यों नहीं पकड़े गये अपराधी? प्रश्न सिक्के के एक पहलू की तरह सामने था तो उत्तर भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह पीछे दबा, छिपा झलक रहा था। सभी ने जान लिया था- पिटने वाले युवक ने भी, उसके घर वालों ने भी, तमाम रिश्तेदारों ने भी यहां तक कि मोहल्ले वालों ने भी। पुलिस रिपोर्ट का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कोई नहीं पकड़ा जायेगा क्योंकि उन गुण्डों में से दो पुलिस वालों के बेटे थे और बाकि बचे दो राजनैतिक संरक्षण पाये हुए शराबी कबाबी। जिनका वास्ता तत्कालीन विधायक से होता हुआ कुछ और ऊपर तक.....शायद भाई भतीजे थे।
तो आज का दिन.....................अभी भी बहुत कुछ शेष है, ये किस्सा अंतहीन है। कहां तक की बात मैं कहूं?
Friday, January 22, 2010
‘तुम चुप रहो!’
यदि महिला आरक्षण की बात नहीं होती तो उसका नाम कौन लेता?
‘‘जठे परधान वणवां वास्ते होड़-होड़ी में आदमियां’रा माथा फूटी जावता, वठे अणी पद ने आरक्षित करी’न सरकार बब्बूड़ी’री तकदीर खोल दीदी’’।
झण्डा पार्टी की ओर से बब्बूड़ी को चुनाव टिकट मिला था। वैसे तो बब्बूड़ी अर्थात चन्द्रकला में कई योग्यताएं होते हुए भी ऐसी कोई योग्यता नहीं थी कि उसको चुनावी टिकट मिलता। न तो उसका कोई राजनैतिक कद था और न ही पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता। उसने कभी पार्टी के लिए कोई काम नहीं किया था। करती भी कैसे? उसे पार्टी, राजनिति से क्या लेना देना? सुबह से लेकर शाम तक चौप्पों’चौपायों’, खेत खलिहानों और रसोड़े से जो थोड़ी बहुत फुर्सत मिलती वो उसके छोरों के हक की थी। राजनिति क्या होती है वो तो क ख ग भी नहीं जानती थी। निपट ढ़ोर, अनाड़ी बब्बूड़ी। फिर बब्बूड़ी में ऐसी क्या योग्यता थी कि किसी ओर को न मिलकर सत्तारूढ़ पार्टी ने अपना टिकट देकर उसे चुनावी दंगल में उतारने का फैसला लिया?
सीधीसी बात है बब्बूड़ी के पिता इस टिकट के असली हकदार थे। अब जब प्रधान की कुर्सी महिला के लिए आरक्षित थी तो पिता टिकट लेकर क्या करते? पुत्री का नाम दे दिया। देने को तो वो बहूओं का नाम भी दे सकते थे पर एक तो बहुएं उनसे पर्दा करती थी। फिर बहुओं का मर्दो के सामने आना, बतियाना उन्हें पसन्द नहीं था। बेटो की भी यहीं राय थी। दूसरा बब्बूड़ी का उसके पति से झगड़ा चल रहा था। कोई पांचेक बरस से उसका डेरा मैके में डला हुआ था।
कल बब्बूड़ी फार्म भरने जायेगी।
‘‘इधर आ बब्बूड़ी’’
‘‘भिंया दुई’न आऊं दाता होकम’’ वह भैंस को बांटा रख दुहने की तैयारी कर रही थी।
अरे! पैली अठी आ। भौजाई ने कैव जो भिंया दुई लेगा। थूं अठीं आ।’’
बब्बूड़ी घाघरे से गीले हाथ पौंछती दरीखाने पहुंची। देखा वहां पिता के साथ पार्टी के और भी कार्यकर्ता मौजूद है। उसे देख कई हाथ ‘नमस्कार’ कर उठे। उसको ‘अचरज’ हुआ। अपने ही गांव के आदमी जिन्हें वह काकोसा, दादासा, भाईसा कहती रही, जिनकी गोद में वह खेली, अंगुली पकड़कर चली और बड़ी हुई वे उसे नमस्कार करें? उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि शर्मा गयी।
‘‘चन्द्रकला देवी अब आप हमारी नेता है....चन्द्रकला देवी जिन्दाबाद’’ रामबोला दर्जी ने उत्साह में भर नारा लगाया।
चुनाव पूर्व सरगर्मी वहां देखी जा सकती थी। दो, चार, तीन के समूह में खुसर-पुसर, कईं मुंह कान पर लगे थे। मतदाता सूची सामने फैली पड़ी थी। मर्मज्ञ राजनीतिज्ञों ने मिल बैठकर तमाम सूची को जातिगत आधार पर कई खण्डों में विभक्त कर दिया था। मसलन 15 घर सुनारों के जिनमें 34 मतदाता थे। महाजनों के कुल 20 वोट ही थे। ‘चतुरानन्द की महाजनों के वोट पर अच्छी पकड़ है’ दीनू फुसफुसाया। गूजरा, भोईयों, मालियों और पटेलों के 60 और 80 के आसपास वोट थे। बलाई, खटीकों और मुसलमानों, सिंधियों के भी काफी वोट है। दर्जी धोबी, रेगर, भिस्ती....कई जातिगत बंटाव, मतदाता बैंक की गणित चल रही थी। किसके कितने वोट है? कितने वोट पार्टी पक्ष में है और कितने विपक्ष के और कितने तटस्थ। पक्ष वाले तो झोली में थे ही। देखना यह था कि विपक्ष की जाजम में कितने छेद किये जा सकते है? कितनी सेंध, कहां-कहां मारी जा सकती है और सर्वाधिक ताकत तो तटस्थ वोटों पर लगानी थी। कितने जुटाये या तोड़े जा सकते है? हार जीत का फैसला तो यहीं मतदाता करते है।
‘‘काले ही फार्म भरनों है। साढ़े दस बजा रो मौ’रत आयो है’’
‘‘काले थ्हारी घरवाली ने भी बब्बूड़ी रे ल्हारे तै’सील में जाणों है।’’ शाम के सात बजने वाले थे। बब्बूड़ी ने जम्हाई ली, यह सब देख सुन उकताहट होने लगी। ‘‘दाता, होकम...’’
‘‘तू चुप रह...! हां, यो ठीक रैगा। आठ-दस लुंगायां रो जत्थो साथ वैणो चावै।’’
‘‘हां बाऊजी, चन्द्रकला देवी के साथ आठ दस नहीं कम से कम पचास औरते होनी चाहिए। हरेक जाति में से पांच-पांच औरते होनी चाहिए। ये हमारी ताकत का प्रदर्शन होगा। आधी गुवाड़ी मैं नूता भिजवा दों। पहले फार्म भरना फिर जीमण’’
‘चुनाव के लिए कल फार्म भरेगी बब्बूड़ी’ पूरे गांव में, बस्ती में लोगो को खबर लग गई थी। नूते लग गये थे।
‘‘चन्द्रकला देवी के पक्ष में अच्छा वातावरण है’’
‘‘हमारी जीत निश्चित है’’
‘‘परधान हमारा होगा’’ कार्यकर्ताओं में पूरा उत्साह था।
भोर का सूरज सूर्यप्रतापसिंह के आंगन में पसरा पड़ा था। अन्दर की डयोढ़ी में आज बब्बूड़ी हमेशा की भांति पौट्टे ’गोबर की थेपड़ी’ नहीं थाप रही थी। उसका सात वर्षीय बेटा भारतेन्दु उसे हस्ताक्षर करवाने की अन्तिम ‘प्रेक्टिस’ करवा रहा था। पास में ही बैठा उसका छोटा बेटा अमलेन्दु मां के हाथ से पैन खींचने की कोशिश में लगा था। मानो कह रहा हो ‘पेन पर मेरा अधिकार है।’
‘‘हां! यों·· यों··· ले बैठ’’ बब्बूड़ी उसे उठाकर जरा दूर बैठा आयी। वह पहुंचती इससे पूर्व ही वह पहुंचकर पेन उठा चुका था।
‘‘बाईसा पेन तो मर्दा रे हाथ में’ईज सौवे’’ भाभी के कहने पर बब्बूड़ी ‘फिस्स’ से हंस पड़ी।
झमरू मासी, पार्वती भुआ, गोदावरी तैलण, मंगनी जाटनी, नाथूड़ी रंगरेजण, बसन्ती मालण, गोवनी मीणी और न जाने कितनी जानी अनजानी औरतों का हजूम तहसील की ओर जा रहा था। रंगबिरंगे घाघरा-लूगड़ी में सजी हुई औरते, घूंघटा निकाले औरते, जिनके सबके हाथ में पार्टी के छोटे-छोटे झण्डे थे। औरतों के पीछे मर्दो का टोला था। यह भीड़ तहसील की मुख्य सड़क पर पहुंच चुकी थी। उत्साही कार्यकर्ता नारे लगाने लगे।
‘‘चन्द्रकला देवी....जिन्दाबाद·’’
‘‘झण्डा पार्टी...जिन्दाबाद··’’
एक उत्साही कार्यकर्ता जोर से चिल्लाया- ‘‘जब तक सूरज चांद रहेगा...’’
चन्दाबाई, चन्दू बाईसा, चन्द्रकला देवी, बब्बूड़ी...कई नामों की आवाजे आपस में गडमड हो गई तो नारों का स्वर धीमे से धीमा होता गया। युवा कार्यकर्ता खिलखिला उठे फिर हंसी का फव्वारा छूट गया।
‘‘चोप्प·’’ बुजुर्ग ने उन्हें दपटा...‘ढ़ग से नारे लगाओ’
युवको में खुसर पुसर हुई फिर नारे लगने लगे, एक स्वर में एक लय में।
हरे गोटे वाली मलमल की साड़ी और लाल बूंटेदार रेशमी लहंगा पहने, मुंह पर आधा घूंघट डाले, कई फूलमाला गले में पहने बब्बूड़ी अर्थात चन्द्रकला देवी बड़ी ‘ठहमराई’ ’गम्भीरता’ के साथ चल रही थी। उसकी जिन्दगी में यह पहला अवसर था। मन ही मन घर के सगला देवी देवता, डयाढ़ी माता, कुलदेवी बाणमाता और भैरूजी को बारम्बार यह कहते हुए धोग लगा रही थी कि ‘हे बावजी! म्हारो सत राखजै। म्हूं सत्राणी री फतै करजै।’
जय जयकार के साथ उसने फार्म पर अपने हस्ताक्षर किये। जैसे ही वह तहसील भवन के बाहर निकली सामने उसका पति भूपेन्द्रसिंह एक जीप के पास खड़ा था। आठ-दस लोग हाथ में लठ्ठ सम्भाले उसके साथ तने हुए थे। भूपेन्द्रसिंह आगे बढ़ा और उसका रास्ता रोकते हुए बोला-
‘‘तू चुनाव नहीं लड़ेगी। रजपूत की लुगाई है अपनी मरजादा में रह। बेसरम अब तू वोट मांगने घर-घर जायेगी? येई’ज काम पांती आया है तेरे...करमखोड़ली पूर्वजांे का नाम डूबायेगी...?...’’
वह चुप्प धणी को यहां इस तरह देख भौंचकी रह गई। वह कुछ कहती इससे पूर्व उसे धकियाते उसके पिता सूर्यप्रतापसिंह सामने आ गये। ‘‘घरै पधारो कंवरसा। पामणा भाई ने तै’सील में हील हुज्जत सोभा नीं देवे। आप घरै पधारो। पामणा री सोभा हवेली रे दरीखाने वैं है।’’
श्वसुर को समने पा भूपेन्द्रसिंह ठिठका। कड़ाई से कहे गये शब्द सम्मानजनक होते हुए भी उसे विष के घूंट की तरह लगे। उसने वहीं जमीन पर थूंक दिया। बुजुर्ग कार्यकर्ताओं ने समय की नजाकत को समझा। कहीं विपक्ष वाले इसका राजनैतिक लाभ न ले ले। इससे पूर्व ही वे यहां से खिसक लें। उन्होंने नारा लगाया- ‘‘चन्द्रा देवी...जिन्दाबाद’’
जिन्दाबाद के नारों के बीच से गुजरती हुई बब्बूड़ी एक मुकाम पार कर मैदान में उतर चुकी थी। इस दौड़ की पहली बाधा उसका पति अपने आदमियों के साथ दरीखाने पहुंच चुका था।
सूर्यप्रतापसिंह ने राजनीति में पूरी उमर खपा दी थी। वह समय की नजाकत को समझ रहा था। चन्द्रकला फार्म भर चुकी थी। चुनाव में केवल दस दिन बाकी थे। उसे अपनी पूरी ताकत से इस चुनाव को लड़ना ही नहीं, जीतना भी था। विपक्ष का जोर भी कुछ कम नहीं था। वैसे भी आजकल चुनाव लड़ना आसान चीज नहीं रहा। पैसा पानी की तरह बहता है। मोटी रकम का हिस्सा अगर दामाद को राजी रखने में चुक गया तो क्या हुआ। वैसे तो उसे टेढ़ी अंगुली से घी निकालना भी आता था, पर वह भलीभांति जानता था कि यह अवसर दामाद को नाराज करने और उत्तेजित होने का नहीं है। वह मौका देखकर तिलक निकालना खूब जानता था। सो जंवाई के साथ पधारे हुए अतिथिगणों का खूब आदर सत्कार हुआ। मीठे शर्बत और मीठे फलों से उन्हें तृप्त किया गया। अब दामाद की बारी थी। ‘एक बार बब्बूड़ी परधान बन जाय। ऐसे कई वारे न्यारे तो वो आगामी पांच सालो में कर लेगा’ उसने दांव लगा ही दिया। अखबार में लिपटा नोटो का बण्डल उसने दामाद के सामने करते हुए अत्यन्त मधुरता से कहां, ‘‘यो आपरी सीख रो बीड़ों, हाजर..और कई ताबेदारी वे तो कौं’’ । भूपेन्द्रसिंह एक नम्बर का पियक्कड़। इतने रूपये देखते ही उसकी बांछे खिल गई।
सामने आयी बला सूर्यप्रताप की कुशलता से टल चुकी थी। अब बब्बूड़ी को ले वह निर्विघ्न चुनावी मैदान में उतर गये। यह बब्बूड़ी के जीवन में पहला मौका था जब वह ‘जीपड़े’ में बैठ चुनाव प्रचार पर निकली थी। गवाड़ी गवाड़ी जाकर ‘वोट किन्ने देणो है?’ समझाती। किसी कटाक्ष के प्रत्युत्तर भी वह अपने तरीके से दे आती थी। रोज की घर गृहस्थी, खेतीबाड़ी की जिन्दगी से यह अनुभव अलग था। घर आकर अपने अनुभव भाभीयों को सुनाती- ‘पाणी कठारो तो रोटियां कठै, लुगाई जात वास्ते घणों करड़ों काम है।
‘‘बाईसा आप राज कींकर समभालोगी?’’
‘‘ऐ यालो! कींकर कई, रोज ढ़ोर चौप्पा नीं समभालै कई..विस्तर ही तो सम्भालनो पड़तो वैई।’’ साड़ी मुंह में दबाकर दानी बुर्जग महिलाएं सभी हंस पड़ी।
विपक्ष भी पूरी कमर कस कर मैदान में उतरा था। बब्बूड़ी के सामने प्रत्याशी थी गमेरी कलाल। दोनों बचपन की साथिन चुनावी दंगल में आमने-सामने। पहले पहल आमना सामना हुओ तो खुश खुश मिली। धीरे धीरे माहौल गर्माने लगा। सवर्ण और पिछड़ी जातियों के अलग-अलग खेमे बन गये। दो धड़े हो गये। लोग खुलकर सामने आने लगे। इसका असर प्रत्याशियों पर भी पड़ा। गमेरी और बब्बूड़ी आमने सामने हो जाते तो ‘जिन्दाबाद’ के नारे लगने लग जाते। चुनाव प्रचार में व्यक्तिगत आक्षेप होने लगा। राजनीति के रंग से अब तक अछूती महिलाओं में चैतन्य आ गया था। किसी के सिर पर घास का ‘भारा’ लदा हुआ है तो किसी के सिर पर पानी से भरा ‘बेवड़ा’। यूं तो वह बोझे मर रही होती है पर चुनाव की चर्चा छिड़ते ही वह खड़ी रह जाती, सिर का बोझ भूल जाती। गोबर के हाथ सने हो या राख से बर्तन रगड़नें वाले, हार जीत की अटकले लगने लगती।
चुनाव में आयी इस चेतना से वोटों की गणित गड़बड़ाने लगी। बुजुर्गो के आदेश मानने वाले युवा बागी नजर आते थे। महिलाओं को भी समझाना मुश्किल पड़ रहा था।
इस चुनाव में गांवों के विकास या सिद्धान्तों की बाते तो नगण्य प्राय: थी। प्रतिष्ठा के प्रश्न अड़े हुए थे। टक्कर कांटे की थी। सूर्यप्रतापसिंह कोई ‘रिस्क’ नहीं लेना चाहते थे। रातों रात कारगर उपाय कर डाले। कुछ जातियों से मुफ्त में यात्रा का वायदा हुआ तो कुछ मांस मदिरा से माने।
मतदान की तारीख आ पहुंची। कड़े बंदोवस्तों के बीच मतदान सम्पन्न हुआ। प्रधान की कुर्सी जीतकर बब्बूड़ी ने विजयमाला पहनी। जगह-जगह स्वागत समारोह हुए। वह भीड़ को संबोधित करने लगी-
‘‘सरकार लुगायां ने कुर्सी दीदी। लुगायां घर सम्भालै, छोरा छौरी सम्भालै अबै राज सम्भाली’ई ...गाय बकरिया री गुवार वे के पामण पीर री खातरी, माथे आई पड़िया सगलो करै। अबै आप री सैवा रो मौको मल्यो है तो आपरी परख मांय खरी उतरू’’ कहते हुए वह उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। भीड़ ने ताली बजाई। कभी विद्यालय का मुंह न देखने वाली बब्बूड़ी आज प्रधान बन चुकी थी।
हस्ताक्षर करने वाली इस जनप्रतिनिधी के पंचायत के काम तो उसके पिता की निगरानी में ही पूरे होते थे। उसे कोड आदेश थे कि फंला चपरासी के हाथों भेजे गये कागजों, फाईलों पर ही मंजूरी के हस्ताक्षर करने है। सब कुछ पहले से ही तय, समझाया हुआ चलता। वह तो केवल चिन्हित स्थानों पर हस्ताक्षर करती थी। बाकि मामलों मे वह चुप्पी साध लेती। पिता के ऐसे ही आदेश थे। छ: माह तो सब निर्बाध गति से चलता रहा। विपक्ष अपना पैंतरा चलता तो सूर्यप्रताप उसे ध्वस्त कर देता। उसने अपना खेमा मजबूती से बांध रखा था।
विपक्ष ने अपनी नई चाल चली। उन्होंने भूपेन्द्रसिंह अर्थात चन्द्रकला देवी के पति को अपना मोहरा बनाया। उसे उकसाया और भड़काया कि वह अपनी रूठी पत्नी को मैके से ले आये। उसकी पत्नी प्रधान है। पत्नी के प्रधान होने से जो इज्जत और धन उसे मिलना चाहिये, वह सब उसका ससुर ऐंठ रहा है। फलस्वरूप वह अपनी पत्नी ‘प्रधान’ को मना घर ले आया। अब जो सरकारी मजमा सुसर के यहां लगा रहता था वह उसके द्वार पर रहने लगा। उसकी छाती फूलकर चौड़ी हो गई। उसकी दखल बढ़ने लगी। एक सुबह की बात है-
‘‘दो-तीन कप ‘चा’ बना ला’री’’
बब्बूड़ी चाय लेकर आयी। भूपेन्द्रसिंह ऑफीस के चपरासी के साथ बैठे एक आदमी से बतिया रहा था। यह चाय उसने उन्हीं के लिए बनवायी थी। ‘‘सबको पानी भी पिला और मेरे बूट के पालिस कर दे।’’
‘‘वो जो आज टेण्डर खुलने वाले है उसमें बखतावर का काम हो जाना चाहिये।’’
‘‘पर वो तो एक नम्बर वाले का...’’
‘‘तू चुप रै! समझदार की पूछड़ी। म्हे कैऊं जो कर’’
वह मनमाने तरीके से धन ऐंठने लगा। श्वसुर और उसके बीच टकराहट होने लगी। सूर्यप्रताप ने पैतरा खेला। भूपेन्द्रसिंह इतना दक्ष खिलाड़ी तो था नहीं। कहीं न कहीं मात खानी ही थी। वह उलझन में पड़ गया। घर आकर उसने सारी झल्लाहट अपनी पत्नी पर निकाली -
‘‘थ्हे ट्रांसफर री लिस्टा में धांधली क्यूं कीदी?’’
‘‘म्हने तो दाता होकम कियो। मैं वणाने पूछया बगैर नी करूं।’’
‘‘जूता खाणा वै तो जबान लड़ावजै..’’
‘‘नै करूं...नै करूं...कई कर लेइ..?’’
तभी भूपेन्दzसिंह ने उसकी चोटी खींच एक लात जमा दी।
ड्राईवर हो या बाबू, चपरासी हो या अफसर, उसकी बात न मनाने पर वह सबके सामने ही गाली गलौच करता या झापड़ रसीद कर देता। रोज-रोज की ठुकाई और अपमान से घबराकर वह फिर पिता के पास लौट आयी।
वह अस्वस्थ रहने लगी। उसे अंदेशा होने लगा तो डाक्टरी परीक्षण करवाया। उसका संदेह ठीक निकला। वह गर्भवती है। जब पिता को मालूम चला तो मानो उन पर गाज गिर गई। प्रधान का पद हाथ से जाता दिखा। चुनाव में रूपया पानी की तरह बहा था। अभी तो खेत भी गिरवी पड़े है। बैठे बिठाये ये मुसीबत कहां से आ पड़ी। तीसरी संतान होते ही बब्बूड़ी को इस्तीफा देना पड़ेगा। नया कानून ही ऐसा आया है।
बब्बूड़ी की शहर के प्राईवेट अस्पताल में जांच हुई। बच्चा तो ठीक था पर उसका ब्लड प्रेशर कम था। डाक्टरनी ने गर्भपात नहीं कराने की सलाह दी।
सूर्यप्रतापसिंह माथा पकड़कर बैठ गये। अब क्या हो? उन्होंने बेटी से पूछवाया तो पता चला वह भी गर्भपात के विरोध में थी। उसके दो बेटे थे और अब बेटी की आस उसके मन में पलने लगी थी। सूर्यप्रताप धर्मसंकट में फंस गये। एक तरफ प्रधान की दावेदारी जाती है दूसरी तरफ बेटी की जान। उसकी मर्जी के बिना गर्भपात कराना भी मुश्किल है। ये बाते छुपाये नहीं छुपती, कहीं विपक्ष या इसके पति को पता चल गया तो? समस्या एक नहीं कई खड़ी हो जायेगी। आखिर निर्णय तो लेना ही था। उन्होंने पत्नी की मदद ली और समझाबुझाकर बड़ी गोपनीयता से काम को अंजाम दिया गया। कागजों में पीलिये का केस बताया गया।
अस्पताल में बब्बूड़ी पीली पंजर पड़ी हुई थी। मानो शरीर का सारा रक्त ही निचुड़ गया हो। उसके पिता के पास मिलने वाले कई परिचित आते, हालचाल पूछते। फूलों का गुलदस्ता लिए विधायक महोदय आये -
‘‘अब कैसी है प्रधानजी?’
‘प्रधानजी’ उसे लगा जैसे किसी ने घौंसा मार दिया हो। ‘भाड़ में जाय प्रधान की कुर्सी वह बिलबिला उठी। जैसे ही बब्बूड़ी ने बोलने को मुंह खोला, पिता ने कहा -
‘‘तू चुप रह! आराम कर’’ और उसने अपने होठ मजबूती से ‘सी’ लिए।


