Sunhare Pal

Wednesday, July 14, 2010

माटी का रंग

‘छपाक!’ की आवाज हुई और कई पानी की बूंदे इधर-उधर, चारों ओर उछल गई। इसके साथ ही वह घूमी और गुस्से से दांत पीसती हुए चीखी - ‘‘कौन है ये बेशरम......?’’
दूसरे ही पल उसकी नजरे पानी के छींटे उड़ाने वाली से मिली और वो स्तब्ध रह गई। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। फिर उसके मुंह से फूटा - ‘‘अरी शारदा तू........यहां............?’’
‘‘म्हें भी यही पूछूं हूं, तू यहां कैसे?.........गुलनारा ही नाम है न तेरा।’’ वह इत्मीनान करती हुई पूछने लगी। उसने ‘हां’ में गर्दन हिलायी। दोनों मुस्कुरा उठी।
पहचान में भी एक अपनापन होता है और ये अपनापन उस समय और भी बढ़ जाता है जब एक ही शहर के दो व्यक्ति कहीं अन्यत्र मिलते हैं आने शहर में रहते हुए चाहे वे आपस में कभी न बोले हो पर अन्य जगह की बात ही कुछ ओर है। वहां अपने ही शहर के व्यक्ति को देख कर विश्वास से भरा जो अपनेपन का भाव पैदा होता है उसकी आत्मीयता निराली होती है। जाति, वर्ण, वर्ग, रंग सब भेदभाव भूलकर वे अपने बन जाते हैं। यहां भी यही दृष्टिगोचर हो रहा था। गुलनारा और शारदा एक दूसरे का हाथ पकड़कर वहीं नदी किनारे बने कच्चे घाट पर बैठ गई जैसे कभी गहरी मित्रता रही हो।
बरसात के दिन थे और सरणी नदी पूरे उफान पर थी। चारों तरफ फैली हरीतिमा ने वातावरण को खुशगवार बना दिया था। वहीं घाट के पत्थर पे कपड़े धोती हुई आपस में बतियाने लगी -
‘‘तेरी शादी कब हुई?’’ शारदा ने पूछा।
‘‘पिछले बरस ही और तेरी.....?’’
‘‘पूरे आठ महीने और दस दिन हुए है। तेरा वो क्या करै रे?’’
‘‘ड्राईवर है, जीप चलावै है और तेरा वो....?’’
‘‘अभी कम्पाऊंडरी में पढ़े है.......ऐं गुलनारा, तुझे बच्चा हुआ?’’
नहीं कहकर गुलनारा हंस पड़ी। ‘‘तेरे कुछ है...?’’
उसने ‘ना’ में गर्दन हिलाई और दोनो हंस पड़ी।
‘‘तू भी नीली बट्टी से कपड़े धोवै है?’’
‘‘हां, मेरे उसको यहीं पसंद है।’’ कहते हुए उसने पेंट को पछाड़ना शुरू किया। फलस्वरूप साबुन के झाग मिले पानी के छींटे उड़ने लगे।
‘‘ऐं.......ऐं.....देख छींटे मत उड़ा। ठीक से कपड़े धो। कहीं छींटा लगे, यह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। ये तो तू मेरे शहर की है जो तुझे कुछ नहीं कह रही हूं। अगर तेरी जगह कोई ओर होती तो निगोड़ी की चुटिया पकड़ यहीं पछाड़ देती....।’’
‘‘ऐं.....ऐं.....किसे धमकावै है तू। मुझे कोई ऐसी वैसी डरपोक, कच्ची खिलाड़ी मत समझना। धोबी की बेटी हूं। बरसों से पुरखो ने नैं-नैं घाट पे कपड़े धोये, पछाड़े और निचोड़े हैं। ये तो तू है मेरे पीहर से जो लिहाज कर रही हूं। वरना ससुरी की एक टांग पकड़कर ऐसा घुमाती कि चक्करघिन्नी बनी नजर आती.....’’और हीं-हीं कर हंसने लगी।
‘‘तू धोबी की बेटी है तो मेरी रगों में भी खालिस पठान का खून बहता है। मेरा कब्बड्डी खेलना याद है कि नहीं तुझे? था कोई मेरा जोड़? हमेश कक्षा को जिताया था मैंनें........।’’
‘‘चुप कर। हम ‘अ’ अन्दर और तू ‘ब’ बन्दर थी।’’ कहकर शारदा फिर हंसने लगी। शारदा को हंसता देख गुलनारा को भी हंसी आ गई। ‘‘आगे-आगे बन्दर पीछे-पीछे रामचन्दर’’ दोनों एक साथ बोली। शारदा ने गुलनारा की ओर पानी उछाला तो गुलनारा कहां पीछे रहने वाली थी। उसने भी पानी में जमकर हाथ चलाये और बौछारे शुरू कर दी। फिर तो मानो वे उन्हीं स्कूली दिनों में लौट आयी थी। दोनों एक दूसरे पर पानी उछालती हुई वर्तमान को पीछे धकेल बचपन में लौट आयी। हाथ पकड़कर पानी में ‘डुबकी’ खाने लगी। तैरने लगी कभी सीधी तो कभी उल्टी होकर, पानी में किलौलें करने लगी।
जब वे पानी से बाहर निकली तो एक दूसरे के सिरों पे गीले कपड़ों से भरे तगारे रखने में मदद करने लगी और फिर साथ-साथ चल पड़ी। शारदा का मकान पहले आ गया। गुलनारा ने भी उसकी घर के बाहर बनी चबूतरी पर अपना सिर का बोझ उतार विश्राम लिया।
‘‘आ अंदर आ।’’ शारदा मनुहार करती हुई कहने लगी।
‘‘उं हूं! आज नहीं। तू इतनी कड़वी जुबान की क्यों हैं?’’
‘‘तेरी जुबान में कौन सी गुड़ की डली है?’’
फिर दोनो एक साथ खिलखिला कर हंस पड़ी।
यह सही था कि शारदा और गुलनारा दोनो ही सरकारी स्कूल में, एक ही कक्षा में पढ़ती थी। पर दोनो के ‘सेक्शन’ हमेशा अलग रहे थे। एक अ में थी तो दूसरी ब में। आठवीं तक दोनो साथ-साथ पढ़ी पर शायद ही उनमें कभी बातचीत हुई हो किन्तु यहां आकर उनमें एक अलग सा ही अपनापन पैदा हो गया। जिसका कारण था दोनो का एक ही शहर का होना। ससुराल का गांव चाहे छोटा था किन्तु यहां वो अपनापन किसी के साथ नहीं जुड़ पाया था जो शारदा को गुलनारा में और गुलनारा को शारदा में मिला था। उनकी प्रगाढ़ता समय के साथ बढ़ने लगी।
यह भी संयोग की बात थी कि दोनो के मकान के पिछवाड़े की छत मिलती थी। जब वे काम निपट जाती तो एक दूसरे को छत पर ककंरी डाल चलने का इशारा कर देती थी। वे साथ-साथ कपड़े धोने व नहाने आती। यहां नदी किनारे जो स्वतंत्रता उन्हें मिलती थी वह पिछवाड़े के पड़ौसी होने के बावजूद भी नहीं थी। पहले जी भर के वे चंगा-बित्तू खेलती फिर कपड़े धोती और नहाती थी।
जहां दोनों कपड़े धोती व नहाती थी वो त्रिवेणी संगम का किनारा था। बेड़ावल के जंगलों से जो बूढ़ी नदी बहकर आती थी। यहीं आकर लोड़ी नदी से मिल जाती थी। यहां आकर नदी का पाट कुछ चौड़ा हो जाता था और उसके बहाव की रफ़्तार भी धीमी हो जाती थी। दोनो नदियों का पानी जब मिलकर आगे बढ़ता था तो वे सरणी नदी कहलाती थी। इसी सरणी के किनारे किनारे आबादी बसी हुई थी। एक ओर मुस्लिम बहुल आबादी थी तो दूसरी ओर हिन्दु बहुल। दोनों आबादी को विभाजित करता बीच में सीना ताने खड़ा था - खंडित, जर्जर एक प्राचीन दरवाजा। इस दरवाजे के जर्जर कंगूरे देख सहज ही अनुमान लगया जा सकता था कि ये कभी बेहद सुन्दर रहा होगा। प्राचीन वास्तु शिल्प के साक्षी इस दरवाजे की प्राचीर के एक भाग में मजार थी और दूसरे भाग के छोटे आलिये में हनुमान मूर्ति। उपेक्षित पड़े इस मजार और मूर्ति को कोई नहीं पूछता था।
समय बदला तो बहुत कुछ बदला। ‘इस दरवाजे का जीर्णोद्धार हो’ इस पर पूरा गांव एकमत था। बस उनमें केवल उसके नाम को लेकर मतभेद था। मुसलमान अपनी पसंद का नाम देना चाहते थे जबकि हिन्दू अपनी पसंद का। दोनो समुदाय में इस बात को लेकर जब तब उलझन लगी रहती थी। कुछ समझदार लोग ये भी समझाते थे कि नाम में क्या रखा है, ये तो पुरखों की धरोहर है इस का नाम इस गांव के नाम पर या नदी के नाम पर रख दो। पर कुछ स्वार्थी लोग शान्ति रहे ऐसा कहां चाहते थे। अवसर आने पर भड़काते रहते थे।
इधर हिन्दू सर्मथकों ने दरवाजा पुनर्उद्धार की एक समिति बना ली। रातों रात गांव के उस सिरे पर भी मिटिंग हुई और मुस्लिम समर्थकों की कमेटी गठित हो गई। दोनो पक्ष कार्यवाही करने लगे। सरकार ने मौका मुआयना करने एक दल भेजना तय किया।
इसके बाद रातों रात मजार पर हरी चादर चढ़ गई। लाल गुलाब और मोगरे के फूल सज गये। जलती हुई अगरबत्ती की धूप वातावरण में फैलने लगी। इसके दो रोज बाद ही हनुमान भक्तों को इस टूटे खण्डहर वीरान पड़े उपेक्षित हनुमान लल्ला की याद हो आयी। अब यहां भी पूजा, धूपबत्ती, दीपक, सिन्दूर-मालीपन्ना, फूलमाला चढ़ने लगी। धीरे-धीरे दोनो ओर भक्तों की संख्या बढ़ने लगी। मंगलवार रामबोले हनुमान के यहां भीड़ जुटती थी तो शुक्रवार सुल्तान हाजी पीर की मजार पर। हरी लाल ध्वजाएं हवा में लहराने लगी तो इसके साथ ही भीड़ भी बढ़ने लगी। अब कुछ फूल वाली मालिने भी अपने टोकरे लिए यहां बैठने लगी। कभी कभार मूंगफली वाले, चाट पकौड़ी के थैले वाले थी यहां आने लगे। पान के केबिन का ढ़ांचा भी खड़ा हो गया है और तो और अब तो यहां उर्स भी भरने लगा। हनुमान जयन्ती मनने लगी। अन्नकूट पर भोग भी लगने लगा।
दरवाजे के उस पार और इस पार का तनाव दिनों दिन पैर पसारता जा रहा था। इन सब से बेखबर त्रिवेणी संगम पर गुलनारा और शारदा की दोस्ती परवान चढ़ती जा रही थी। उनके चंगा-बित्तू खेलने के दिन अब लद चुके थे। अब तो उनकी गोद जीते जागते खिलौनो से भरने वाली थी।
‘‘दो दिन से तू आज आयी है?’’
‘‘क्या करूं जी मचलता है। कुछ अच्छा नहीं लगता।’’
‘‘इमली खायेगी?’’
क्रमश : अगली पोस्ट में

Friday, May 28, 2010

जिन्दगी यहां


हर कदम से ताल मिला ले
ऐसी भी आसान नहीं है जिन्दगी यहां
पल पल मरकर भी
जीते है लोग
ऐसी भी लाचार नहीं है जिन्दगी यहां
नफे नुक्सान का हिसाब न मांगे
ऐसी भी बेजुबां नहीं है जिन्दगी यहां
अरे हंसने वालो
सिसक सिसक कर दम तोड़ती
है जिन्दगी यहां
अपनी राते काली कर
महफिल रोशन करती है जिन्दगी यहां
मां बहन बेटी बीबी नहीं
सिर्फ औरत बनकर
बिस्तर की सलवटे
बनती है जिन्दगी यहां

Saturday, May 8, 2010

Mother's Day

Posted by Picasa

कहां खो गये

जागे थे भाग कभी
बजे ढ़ोल, बंटे बताशे भी
लोरी और पालने के स्वर भी वहीं
फिर आज न जाने वे नन्दलाल कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

नहला धुलाकर
साफ-सुथरे कपड़े पहना
लगा दिये थे तूने काजल के टीके
फिर आज न जाने वो झूलेलाल कहां खो गये ?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

कई दौरो में
ऐसा भी इक दौर आया
तब मां मैंने तुझे खूब नचाया था
फिर आज न जाने सारे चुम्बन कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

पुरवाई चली जोरसे
या बिजली ने ली अंगड़ाई
दुबके सिमटे ये उत्पाती पतंगे
फिर आज न जाने किस छोर में कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।


टिफन और तरकारी
के ताने बाने बुना करती थी
भोर सवेरे में
फिर आज न जाने वो सितारे कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

सुनो विशाखा की मां
आओ तो दिलावर की अम्मा
सम्बोधन के तार
फिर आज न जाने ढ़ीले कहां से हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

पल्लू में लिपटे
पल्लू छूटे तो दुख सताये
तुझे बिन बताये
फिर आज न जाने वे छैने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

डांटकर तो कभी
पुचकार कर तूने सिखाये थे
चाहत के सबक
फिर आज न जाने वे सबब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

झरबेरी हो चाहे
खट्टी-मीठी, तेरी नयनों का मधु
बरसा था दिनरैन
फिर आज न जाने तेरे दीवाने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।


तूने जनी संताने
गूंजे भी थे तेरे घरोंदे
खामोश सदा के लिए
फिर आज न जाने ये वीराने क्यों हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

आंचल को फैलाये
तूने तो ढ़क दिये थे
सबको गिन गिनकर
फिर आज न जाने सभी शावक कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

ना कोस किस्मत को
ना दे कर्मो की दुहाई
जमाने की द्रुत गति में
फिर आज न जाने हम सब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

Thursday, April 29, 2010

विश्वास


मैं ‘सुसाईड’ कर रही हूं। मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। कमरे के सभी खिड़की दरवाजे भीतर से बंद कर दिए है और टी. वी. चालू करके उसकी आवाज तेज कर दी है ताकि बाहर मेरे मम्मी पापा को भी किसी तरह की भनक ना लगे कि मैं क्या करने जा रही हूं। मैंने पंखे से साड़ी बांधकर फांसी का झूला बना लिया है और अब इस पर लटकने वाली हूं। लटकने से पहले सोचा आपसे बात कर लूं ताकि अपने आप को निर्दोष साबित कर सकूं। इसमें मेरा कोई दोष नहीं .......
आपके पास किसी का फोन आये और ये कहे तो? इतना सुनते ही आपके होश उड़ जाते। मेरे साथ भी यही हुआ। घबरा कर मैंने उससे कहा- ‘‘रूको, रूको · · तुम कौन हो?’’
‘‘आपने मुझे पहचाना नही? मैं सुखबीर हूं। उस उस दिन बस में आपसे मिली थी। पाली से जोधपुर के सफर के दौरान और वहीं मैंने आपके फोन नम्बर लिए थे। मुझे पता था कभी न कभी आपके फोन नम्बर मेरे काम आयेंगे। और आज जब मैं मरने जा रही हूं तो केवल आपको ही बताना चाहूंगी कि मैं बिल्कुल निर्दोष हूं। उन्होंने बेवजह मुझ पर शक किया और झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्होंने......’’
‘‘अरे! सुखबीर बात क्या हुई ?’’ उसकी बात मुझे बीच में काटनी पड़ी।
‘‘कुछ नहीं मेडम, अब मुझसे सहन नहीं होता। मेरी शक्ति चुक चुकी है। अब एक पल भी मैं जीना नहीं चाहती। मेरे बच्चे का कुछ पता नहीं और मेरा सामान......(सिसकी उभरती है उसकी) वे मेरा सारा सामान पैक करके यहां पीहर छोड़ गये है।’’ यह कहकर वह फूट फूटकर रोने लगी।
बड़ी असंमजस थी क्या कहूं? मैंने कहा -‘‘सुनो सुखबीर तुम सबसे पहले अपना फोन बंद करो। मैं तुम्हें फोन लगाती हूं.................. मैं फोन लगा रही हूं। कहते हुए मैंने फोन काट दिया।
मैंने दीर्घ श्वास खींची। देखा, मेरे सिर से पसीना चुह रहा है और दिमाग सुन्न। दिल जोर-जोर से
धड़क रहा था। याद आया वह पल जब मैं पाली से जोधपुर जा रही थी। मेरे पास पानी से भरी बोतल थी। मेरे साथ वाली सीट पर बैठी युवती की गोद में दो-ढ़ाई बर्ष का बच्चा था। वह बार-बार अपनी मां को तंग कर रहा था। मैंने ध्यान दिया बच्चे की पानी की बोतल खाली हो चुकी थी और शायद वह मेरी बोतल से पानी चाहता था। इसके लिए वह बार-बार अपनी मां को कोहनी मार रहा था।
‘‘क्या चाहिए?’’ बात को समझते हुए मैंने बच्चे से पूछा।
मेरे कहने पर वह कुछ बोला तो नही बल्कि रूठता हुआ मां को देखने लगा।
‘‘पानी चाहिए?’’ मेरे दोबारा पूछने पर उसने गर्दन हिला दी।‘‘यह लो’’ उसकी स्वीकोरक्ति पाते ही मैं अपनी बोतल का ढ़क्कन खोलने लगी। मैं उसे पानी देने को तैयार थी तभी उसकी मां ने कहा-‘‘मेडम, आप थोड़ा ही पानी देना। जब से बस में बैठा है यह पानी ही पी रहा है। पूरी बोतल पी गया है इतने से रास्ते में।’’ उसने थोड़ा पानी लिया और पूछने लगी - आप कहां जा रही है?
-जोधपुर
-वहीं रहती है?
-नहीं अस्पताल का काम है।
-अस्पताल का?
-हां, मेरी समधिन का फोन आया था। उनकी बेटी की प्रसूति होने वाली है।
-तो आप चिकित्सक है?
-नहीं, मेरे पास रहने से उन्हें तसल्ली रहेगी। मुझ पर बहुत विश्वास है उन्हें। विश्वास ही बड़ी पूंजी है। कहते है विश्वास के सहारे आदमी जीता है विश्वास के बिना आदमी मर जाता है।
-बात तो आपकी 100 प्रतिशत सही है।
-विश्वास की इस अहमियत पर मेरी मां अक्सर एक किस्सा सुनाया करती थी। सफर काटने की गरज से मैंने बातचीत का सूत्र आगे बढ़ाया। वह कहती थी, बात उस समय की है जब छप्पन का अकाल पड़ा था। लोगों के घरों में खाने को एक दाना नहीं था। भूखे मरते लोग भूसा खा रहे थे। भूख से बेबस लोग नमक-आटे के बदले अपने बच्चो को बेचने लगे थे। ऐसे दुष्काल से निजात पाने के लिये अब पलायन ही एक मात्र रास्ता था। काफिले के काफिले गांव छोड़कर जाने लगे। ऐसे ही एक दम्पति का बुरा हाल था। चार दिन से बच्चो ने कुछ नहीं खाया था वे लगातार रोटी मांग रहे थे और रोटी थी नही। भोजन के अभाव में उनको बिलबिला कर मरते देखना उनकी बर्दाश्त के बाहर था। इधर सारा गांव खाली हो चुका था। आखिरी काफिला था। लोगों ने उन्हे अंतिम बार साथ चलने के लिए पूछा तब विवश हो उन्हे निर्णय लेना पड़ा। वे जाने लगे तो बच्चों ने उनके तार-तार हुए कपड़े पकड़ लिए। पूछने लगे आप सब कहां जा रहे है? क्या आप रोटी लेने जा रहे है? एक बच्चे ने पूछा तो बेबस माता पिता को बहाना मिल गया और मां ने आंसू रोकते हुए अपने बच्चो से कहा- हां, हम रोटी लेने जा रहे है।
विदा लेते पिता ने कहा- तब तक तुम यहां खेलते रहना। हम जल्दी ही रोटी लेकर लौट आयेंगे।
छ: माह गुजर गये। वर्षा हुई तो समय सुधरा। सुकाल आया तो लागों के काफिले पुन: अपने गांव की ओर लौटने लगे। वह दम्पति भी पहुंचे। दुखी मन से उन्हांेने अपने घर का दरवाजा ठेलना चाहा। जानते थे अब उनका सामना बच्चो से नहीं उनके कंकाल से होगा। वह दरवाजा ठेलते इससे पूर्व ही हंसते-खेलते बच्चो ने माता पिता की आवाज पहचान दरवाजा खोल दिया। बच्चो को सही सलामत पा दम्पति के हर्ष ठिकाना नहीं रहा। अभी वह स्थिति से उबरे भी न थे कि बच्चो पूछा - आप रोटी लाये?
उन्होंने मना कर दिया- हम रोटी तो नहीं लाये। हमें क्या मालूम था कि तुम जीवित....
अभी उनकी बात मुंह में थी कि ‘ना’ सुनते चारो बच्चे वहीं जमीन पर गिर गये। माता पिता ने उन्हें संभाला तो उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
कहने का तात्पर्य है कि छ: महीने तक बच्चे भूखे प्यासे होकर भी इस विश्वास के सहारे जीवित थे कि हमारे मां-बाप आयेगे और रोटी लायेंगे। किन्तु जैसे ही उनका विश्वास टूटा वे वहीं खत्म हो गये। तब से यह बात प्रचलित हुई कि आदमी विश्वास के सहारे जीता है और विश्वास के टूटे मरता है।
आपकी बात बहुत सही है आंटी।’’ उसने भाव विभोर होकर बड़े अपनत्व के साथ उसने मुझे कहा। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही है। मेरा नाम सुखबीर है और यहां पाली में मेरा पीहर है। जोधपुर में मेरी ससुराल है। मेरे पति मेरी जेठानी के कहे पर चलते है। जेठानी मेरे बारे में उल्टी सीधी बाते करके उन्हे मेरे खिलाफ भड़काती है और ये है कि आंख मूंद कर अपनी भाभी की बात को सही मानते है।
-तुम्हारी सास कुछ नहीं कहती?
-जेठानी के आगे सास की भी कुछ नहीं नहीं चलती। बड़ी तेज है वह। सब उससे डरते है। उसकी नजर हमेशा मेरे पति की कमाई पर रहती है। शादी के पहले तो वह सारा पैसा उसको दे देते थे तो चलता था पर अब हमें भी अपनी गृहस्थी बसानी है कि नहीं? इतना कहकर वह रूक गई और मेरी ओर देखा। मेरा समर्थन पाकर वह आगे कहने लगी-‘‘जी आज एक बच्चा है कल को बड़ा होगा। अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए पैसा भी तो चाहिये। आजकल स्कूल वाले डोनेशन मांगते है तब जाकर एडमिशन हो पाता है अच्छे स्कूल में। मेरी बहन को भी पचास हजार देने पड़े थे बबली के एडमीशन के समय । जी क्या क्या बात कहे? आजकल मंहगाई देखो न सुरसा की तरह बढ़ती ही जा रही है। सब दे देंगे तो कहां से लायेंगे पैसा? मांगेगे तो वह तो ठेंगा ही बताने वाली है जी।
मैंने उसे ब्रेक देते हुए पूछा- ‘‘तुम्हारे पति करते क्या है?’’
-जी मेडमजी, सब्जी मार्केट में रेडीमेड कपड़ो की दुकान है। रब की दया से गल्ला भी अच्छा आ जाता है। रोज के पांच-छ: हजार तो घर ले ही आते है। इसी बात को लेकर तो वह कुढ़ती है।
-तुम अलग क्यों नहीं हो जाती? मेरे इस सुझाव पर वह व्यग्रता से झल्ला उठी- ‘‘रे बाबा! अलग की बात मैं मुंह से निकाल भी नहीं सकती। मेरे पति मुझ पर नहीं भाभी पर एतबार करते है। खाना भी उसीसे मांगते है और गल्ला भी उसे ही सौंपते है। मेरी तो हर बात में उन्हें कमी ही नजर आती है। हर बात में कहते है - सुख्खी भाभी से सीखा कर जरा।
‘‘फिर तुम्हें बुरा लगता होगा। गुस्सा आ जाता होगा। और मुंह फुलाकर बात करना बंद कर देती होगी। तब वह तुम्हें मनाते है या नहीं?’’ मैंने उसे हल्का सा छेड़ा।
‘‘नहीं आंटी, जब तक मुझे रूला न ले उन्हें शान्ति नहीं होती। तंग आ गई हूं इस मैं रोज की किच किच से।’’ बातों का सिलसिला जो चला तो वह गंतव्य आने पर ही थमा। मेरे उतरने से पहले ही उसने वायदा लिया था कि मैं उसके फोन का जवाब जरूर दूंगी।
‘‘ठीक है, मैं दूंगी जवाब।’’
.................और आज ये अप्रत्याक्षित रूप से यह फोन.......मैं बड़ी विचित्र स्थिति में अपने आप को पा रही थी। कैसे और क्या किया जाय? वो भी केवल फोन पर। वह कहीं कुछ कर न बैठे इस दबाव के चलते दूसरे ही पल मेरी अंगुलिया उसके फोन नम्बर पर घूमने लगी। एक घंटी के जाते ही सुखबीर ने फोन उठा लिया था।
‘‘हलो आंटी, जल्दी बोलिये।’’
‘‘मरने के लिए इतनी तत्परता? मैंने कड़ाई से पूछा - ‘‘सुखबीर क्या हुआ मुझे सबकुछ विस्तार से बताओ।’’
वह बोली- ‘‘मेरी कोई गलती नही और फिर रोने लगी।’’
-तुम्हारा बेटा कहां है?
-मुझे नहीं मालूम।
-तुम्हारे पति कहां है?
-पता नहीं।
-तुम्हें बिना बताये वह कहीं चले गये है?
-हां।
-जब वह गये तुम कहां थी?
-मैं जयपुर गई हुई थी।
-कौन था तुम्हारे साथ?
-मेरे दीदी जियाजी।
-जाने से पहले पति से पूछा था?
-हां, पर उन्होंने मना कर दिया था।
-फिर तुम क्यों गई?
-दीदी ले गई थी। दीदी के मकान की रजिस्ट्री होने वाली थी। दीदी चाहती थी कि मैं उनके साथ जाऊं।
-लगता है तुम्हारे चले जाने से तुम्हारे पति नाराज हो गये।
वह कुछ नहीं बोली सुबकती रही।
-फिर किया हुआ? जब तुम लौटी तो पति ने झगड़ा किया?
-नहीं · वह सिसक उठी। मेरे लौटने से पहले ही वह मेरा सामान पैक करके मेरे पीहर छोड़ गये। मेरे बेटे और पति को मैंने लौटने के बाद देखा तक नहीं।
-ओह! सुखबीर गलती तो तुमसे हुई है।
-मैंने और गलती? नहीं जी....
-हां सुखबीर, अपने यहां शादी के बाद पत्नी इस तरह पति की इजाजत के बिना चली जाय तो वह बर्दाश्त नहीं करते।
-मैं किसी ओर के साथ तो गई नहीं थी। अपनी दीदी के साथ ही तो गई थी। मेरी इच्छा थी कि मैं भी दीदी का मकान देखूं। ये तो कहीं ले जाते नहीं खुद ही अकेले चले जाते है और वो भी मुझे बगैर बताये तब?
-वो तो ठीक है सुखबीर यह तुम समझ रही हो। किन्तु तुम्हारे पति ने तो इस तरह से सोचा नहीं न। और वह तुमसे नाराज हो गये।
-ठीक है आंटी वो मुझसे ना बोले पर मेरा बेटा? जाने किस हाल में होगा वह.....
-जहां भी होगा सुरक्षित ही होगा। तुम अपनी चिन्ता करो ।
-आप कह रही है तो मुझे भी अब लग रहा है कि इस तरह बिना बताये मुझे भी नहीं जाना चाहिये था। पर इसका मतलब यह तो नही कि वह मुझ पर शक करे और घर से ही निकाल दे। अब चार दिन बाद दीपावली का त्यौहार है। मुझे यहां आस पड़ौस वाले देखेंगे तो क्या समझेंगे। मेरे मम्मी पापा उन्हें क्या जवाब देगे? आपको पता है इस डर के मारे मैं बाहर तक नहीं निकली हूं। बंटी से भी नहीं मिली। कहीं लोग ये ना पूछ ले कि त्यौहार पर तुम इधर कैसे?
-सुखबर प्लीज, तुम लागो कि चिन्ता छोड़ो। एक दो दिन में तुम्हारे पति का गुस्सा उतर जायेगा और वह तुम्हें लेने आ जायेंगे।
-सच! आंटी ऐसा होगा? उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा? फिर तो मैं भी सॉरी बोल दूंगी।
-आज तुम्हे भी तो महसूस हो रहा कि तुमसे कहीं भूल हुई है।
-आं आंटी। उसकी स्वीकारोक्ति के बाद मैंने पूछा- मगर गलती तो तुम अब करने जा रही हो। क्या मरने से इसका समाधान हो जायेगा? और तुम आत्महत्या करके मर गई तो जो शक तुम पर किया गया है उस दोष से कैसे मुक्त हो सकोगी?
वह मौन रही। कुछ पल बाद मैंने कहा- ‘‘अपने को निर्दोष तुम तभी साबित कर सकती हो जब जीवित रहोगी। वर्ना तुम अपने साथ यह झूठा कलंक लेकर जाओगी।’’
-ओह! यह तो मैंने सोचा नहीं था। अब क्या करूं आंटी?
-तुम नार्मल हो जाओ। एक दो दिन इंतजार करो या तो वह आयेंगे या तुम्हारे पास उसका फोन आयेगा। उन्होंने यह सब गुस्से में किया है और तुम भी यह सब गुस्से में ही कर रही हो। गुस्सा करना अच्छी बात नहीं। पति पत्नी में रूठना मनाना तो चलता रहता है।
-देखती हूं।
इतना ही कहा था उसने और फोन कट गया। इसके बाद उसका कोई फोन नहीं आया। मेरे मन में बराबर उथल पुथल लगी रही कि सुखबीर का पति आया या नहीं? उसे बच्चा मिला या नही? कहीं झगड़ा और बढ़ तो नहीं गया। अनेक बुरी बाते मन में घूम रही थी। फिर भी मन में यह विश्वास अपनी जड़े जमाये हुए था कि शुभ शुभ सोचो। अच्छा ही हुआ होगा।
दीपावली धूमधाम से आयी और अपनी रौनक बिखेर कर चली गई।
मैं थोड़ी फुर्सत में बैठी अपने मोबाईल पर आये एस.एम.एस. पढ़+ रही थी। एक हिन्दी में आये एस.एम.एस. पर मेरी नजर पड़ी- ‘दीपावली की शुभकामनाएं’ और नीचे नाम सुखबीर का देख मैं चौंक उठी। क्षणभर में यह सोचकर राहत मिली कि वह जीवित है यानि उसने आत्महत्या नहीं की। दूसरे ही पल मैंने उसका नम्बर डायल कर दिया। उधर से सुखबीर का चहकता हुआ स्वर सुनाई दिया -
‘‘थैंक्यू आंटी। आपके आर्शीवाद से हमारी दीपावली
बहुत अच्छी मनी। अब मैं अपने घर आ गई हूं और बहुत खुश हूं।’’
-सही कह रही हो सुखबीर? कहते हुए मुझे अपना स्वर आद्र लगा। ‘‘और वो लड़ाई?’’
-नहीं आंटी हमने अब नहीं लड़ने की कसम खा ली है। उन्होंने मुझसे और मैंने उनसे क्षमा मांग ली है। वो मुझ पर विश्वास करेंगे और मैं उन पर......................

Friday, April 23, 2010

हर बार

ऐसा क्यों होता है
कि हर बार
मुझे ही हारना होता है
फिर चाहे वह
मेरी तरूण अवस्था हो
या यौवन का मधुमास
मेहनत का फल
क्यों खट्टा ही
पकता है मेरी
अम्बुए की डाल
मेरे सामने हर बार हार ही होती है
जीत से तो वास्ता
मेरा कभी पड़ा नहीं
छद्म रूपधारी देवताओं की तरह
उसे तुम पहले ही हथिया लते हो
क्यों मुझे भोगना होता है
सारा का सारा
कुंठा और संत्रास
सीता हरण का अंश हो
या अग्नि परिक्षण का दंश
उठती है अंगुली तुम्हारी
हरदम मेरी ओर
जो मुझे बोना करती
बोनसाई कर देती है
खुद अपनी ही नजर में
कठघरे में हरदम
घिरी मैं ही क्यों होती हूं
क्यों नहीं मैं खुलकर
हंस पाती हूं
महफिल की मैं बात नहीं करती
अपने ही घर में
जी भी नहीं पाती
कई बार पूछती हूं मैं अपने आप से
ये सवाल
क्यों जीत पर मेरा नहीं अख्तियार
क्यो होता है मेरे साथ ऐसा हरबार

Saturday, April 3, 2010

आज का दिन






आज का दिन खूनी था शायद, तभी तो- अभी वह घर से निकलकर पचास कदम आगे बढ़ भी नहीं पाया था कि........
बस! एक मोड़ ही मुड़ा था। सीधी और चौड़ी सड़क थी। सुबह के सात बजे वह निकला था, तब हल्का धुंधलाका था पर अब सात बजकर पांच मिनिट होने को हैं, चारों ओर पूरा उजियाला पसर चुका है। स्ट्रीट लाईट बंद हो चुकी है। वीरान सी सड़कों पर कुछ इक्के दुक्के लोगों के होने का एहसास भर हुआ था उसे।
वे लोग- उनके चेहरे कपड़े से लिपटे हुए थे। उसे लगा वे सफाई कर्मचारी है, आज शायद सड़क पर कोई विशेष सफाई अभियान हो। पर वह गलत था। वह सफाई करने वाले नहीं थे, बल्कि हमलावर थे। यकायक उन्होंने आकर उसे घेर लिया और प्रहार के लिए जैसे उनके डण्डे उठे, वह भागा। उसने न इधर देखा न उधर बस पांव जिधर उठ गये वो सरपट दौड़ पड़ा। उसने बेतहाशा दौड़ बढ़ाई। वे पीछे थे, कुल गिनती में चार लोग।
वह दौड़ रहा था और दौड़ते-दौड़ते ही उसने निर्णय किया- कहीं पनाह लेनी होगी। एक घर सामने था- मिश्राजी का।
वह उन्हें अच्छी तरह जानता था। घर की फाटक खोल भीतर घुसने में वह सफल हो गया। दरवाजे तक पहुंच पाता इससे पूर्व ही उन हमलावारों में से एक के लठ्ठ का प्रहार उसके पांव पर गिरा। पिंडली पर लगी भंयकर चोट के कारण वह थोड़ा लड़खड़ाया इतने में दूसरा प्रहार उसके कंधे को तोड़ गया। वह संभल नहीं पाया। वहीं अपने सिर को दोनों हाथों से बचाते हुए उकड़ू बैठ कर सहायता के लिए पुकारने लगा। अब तो वे चारों उस पर पिल पड़े। वे उसे इस तरह पीट रहे थे मानो रूई धुन रहे हो। तड़ातड तड़ातड़, प्रहार पर प्रहार। उसकी भयानक चीखे और डण्डे बरसने की आवाजे दोनों घुलमिलकर खौफनाक रिदम बन गई थी।
जानलेवा हमला हो रहा था उस पर। डण्डों के अगले मुहाने पर लगभग 6 इंच तक कीले ठुकी हुई थी। जो पिटाई के साथ साथ उसकी चमड़ी भी उधेड़े जा रही थी। धड़ाधड़
धड़ाधड़........
आज का दिन ममता भरा दिन था शायद, तभी तो- सड़क बुहारते हुए उसकी नजर इस हमले पर गिरी। वह झाडू हाथ में लिए हुए अपनी सरकारी ड~यूटी पर थी। सड़क से कचरा हटा रही थी। इसी दौरान उसे दौड़ते हुए बूटों का स्वर सुनाई पड़ा। सामने देखा- एक युवक के पीछे कुछ लठैतों को दौड़ते हुए। वह कुछ समझ पाती तब तक वह लड़का एक घर के भीतर घुस गया, पर वह वहीं बाहर संकरी बाऊंडरी में फंसकर धिर चुका था। वे उसे निर्दयता से पीट रहे थे। वह उस जगह के लिए दौड़ी जहां ये हादसा हो रहा था। उसने उन्हें रोकते हुए ललकारा- ‘‘खबरदार जो किसी ने अब इस पर हाथ भी उठाया तो.......क्या मार डालोगे उसे?कमीनों · · ...... एक निहत्थे पर चार चार पिल रहे हो। शर्म नहीं आती तुम्हें.......दफा हो जाओ यहां से नहीं तो एक एक को टांग तोड़कर .....’’दहाड़ते हुए उसके हाथ में झाडू मजबूती से कुछ इस तरह ऊपर उठ आया मानो एक सशक्त हथियार हो। उसने हमलावरों में से एक का हाथ पकड़ कर धक्का दिया और घेरे को तोड़ती हुई भीतर घुस कर उसने अपना आंचल पीटने वाले पर फैलाकर ढ़कने की कोशिश में वह उससे लिपट गई। इसी बीच एक वार से खनखनाकर कांच की सारी चूड़िया झड़ गई।
अचानक हुए इस व्यवधान से हमलावर कुछ ठिठके। वह गुस्से में भरी हुई फिर बरसी- ‘‘कुछ तो शर्म करो। ओ मोहल्ले वालो क्या तुमको कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है ? आंख कान वाले
अंधों-बहरो.....जरा सुनो तो....क्या सबके सब नपुसंक होकर दुबके बैठे हो? खोलो, अपने दरवाजे खोलो......’’
समय की नजाकत को समझ हमलावर भाग खड़े हुए। अब वह उस भयभीत युवक को सहला रही थी। अपने आंचल से उसके बहते खून को पौंछते हुए उसने पुचकारा- ‘‘क्यों ये दुष्ट तेरी जान के पीछे पड़े थे...........कहां कहां चोट लगी तुझे......मुझे बता तो......’’
अब तक दबे बैठे, या तमाशा देखने वाले सभी लोग बाहर निकल आये थे। सभी के मुख से उसके गुणगान हो रहे थे। कोई कह रहा था.......जन्म देने वाली से भी बढ़कर, नवजीवन देने वाली मां’’, किसी ने कहा- ‘‘उसके जीवन की रक्षा कर सचमुच वह यशोदा मैया बन गई है।’’ यहां वे इस बात को सब नजरअंदाज कर चुके थे कि यहीं वो महिला है जिसने अभी-अभी मोहल्ले वालो को गाली गलौच दी थी। उन्हें बेशर्म और खुदगर्ज कहकर उनकी गैरत को ललकारा था।
आज का दिन शायद मानवीय सभ्यता के कलंक अछूत दर्शन का भी था। तभी तो- मुर्दा बस्ती के उन लोगों ने यह भी कहा था- हरिजन स्त्री है, इसे क्या मुंह लगाना यह तो हर रोज ही सड़क बुहारने आती है।
‘जल ही जीवन है’ जिसे वह घायल युवक मांग रहा था। वह युवक जो कि उनकी पिछली सड़क पर रहने वाले डगवाल सा. का बेटा था जिसे वे भलीभांति पहचानते थे। कोई भी उसे पानी नहीं दे रहा था क्योंकि वह उस हरिजन स्त्री की गोदी में गिरा पानी मांग रहा था। एक मेहतर ने इसे छू लिया है। अब कौन अपना धर्म भ्रष्ट करें?
मैया अपने आंचल से उस पर हवा कर रही थी। पर पानी...? पानी...वो कहां से लाती? तमाशाबीन लोग खामेश से इस बेबसी का अनोखा खेल देख रहे थे। उसने हाथ जोड़कर मोहल्ले वालो से प्रार्थना की। तब जाकर किसी एक का मन पसीजा और विकल्प के रूप एक आईडिया उसको क्लिक हुआ होगा तभी तो वह एक डिस्पोसेबल ग्लास में पानी भर कर दूर रख गया। उस मैया ने उसे सहारा देकर उठाना चाहा तो वह उठ नहीं पाया। उसका कंधा झूल गया। मैया ने चम्मच के लिये फिर याचक दृष्टि दौड़ाई। कोई समझकर प्लास्टिक का चम्मच लाता इससे पूर्व ही उस युवक की पत्नी दौड़ती हुई चली आई। उसके पीछे पीछे उसकी सगी मां भी थी। सचमुच यह एक संवेदनाशून्य दिवस होता अगर वे लोग नहीं आयी होती तो? उनके आने से सोये लोगों की संवेदनाएं अब जाग चुकी थी।
आज का दिन एक सुनियोजित अपराध का भी था। पूरणमल ठेकेदार बरसो से वर्मा स्टील कम्पनी में टेण्डर भरता आ रहा था। अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि टेण्डर उसे न मिला हो या किसी ने कोई मीनमेख भी निकाली हो। बरसो से वेस्ट का मलबा वही उठाता आ रहा है। इस बार देखो- ये नया नया लड़का क्या आया, अकल की गर्मजोशी दिखाने लगा। जोड़ बाकि की गणित तो पिछले भी सब जानते थे पर वे सब भरी पूरी उम्र के घर गृहस्थी वाले लोग थे। उनकी भी अपनी जरूरते थी। पैसे के बिना सब सून, सेटल था ऊपर से लेकर नीचे तक।
‘‘अब इसने आकर ऊपर बैठे अफसर को कौनसा पान चबवाया कि इस बार का टेण्डर उसके हाथ ही निकल गया। मेरा तो सारा धंधा ही चौपट कर दिया इस कल के लौंडे ने.......’’पिच्च करके पीक थूकते हुए पूरणमल ने इस छोरे को सबक सीखाने की ठान ली थी। किसी को कानों कान खबर न हो और काम हो जाय। ऐसा ही तरीका था पूरणमल का।
आज का दिन भंयकर असमंजस से गुथमगुत्था होने का दिन भी था शायद। किसने हमला करवाया? कौन थे हमलावर? क्या रंजिश थी? कुछ लूटकर तो नहीं ले गये?
सब यथावत था। जेब को हाथ तक नहीं लगाया गया, घड़ी, चेन, मोबाईल सब यथावत थे तो फिर क्यों जानलेवा हमला हुआ? किसलिए और किसने किया अपराध? जितने मुंह उतनी बाते। जितनी संवेदनाएं उतने दिमाग। खोज लाये दूर की कौड़ी पर-
किराये के अपराधी कहीं पकड़ में आते हैं क्या? आज का दिन अपराध का ही नहीं भ्रष्ट प्रशासनिक दर्शन का भी था। पिटाई करने वालो के खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज हुई। किसने हमला करवाया और कौन थे हमलावर, आखिर पता लग ही गया।
जब सब खोज खबर हो गई तो क्यों नहीं पकड़े गये अपराधी? प्रश्न सिक्के के एक पहलू की तरह सामने था तो उत्तर भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह पीछे दबा, छिपा झलक रहा था। सभी ने जान लिया था- पिटने वाले युवक ने भी, उसके घर वालों ने भी, तमाम रिश्तेदारों ने भी यहां तक कि मोहल्ले वालों ने भी। पुलिस रिपोर्ट का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कोई नहीं पकड़ा जायेगा क्योंकि उन गुण्डों में से दो पुलिस वालों के बेटे थे और बाकि बचे दो राजनैतिक संरक्षण पाये हुए शराबी कबाबी। जिनका वास्ता तत्कालीन विधायक से होता हुआ कुछ और ऊपर तक.....शायद भाई भतीजे थे।
तो आज का दिन.....................अभी भी बहुत कुछ शेष है, ये किस्सा अंतहीन है। कहां तक की बात मैं कहूं?