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Monday, October 19, 2009

रोशनी

रोशनी
यह एक बेहद ठण्डी सुबह थी। रात भर बरसात की धीमी तेज बौछार चलती रही। रह रहकर हवा के तेज थपेड़े खिड़की के शीशों से टकरा टकराकर उन्हे झंकृत करते रहे। सर्दी में हुए इस मावठ और शीतलहर की ठण्डी हवा ने पूरे वातावरण में ठिठुरन भर दी। आकाश अभी साफतौर से खुला नहीं था।
सिस्टर बेसीला जब अतुल के घर पहुंची तो घड़ी सुबह की सात बजा रही थी किंतु अभी भी धुंधलाका पसरा हुआ था। चारों ओर छितराये मकान और खाली पड़े प्लाटों के बीच कच्ची और उबड़-खाबड़ सड़क को पार करती हुई वह अतुल के मकान तक पहुंची। सन्नाटे को चीरते हुए आगे बढ़ते हुए थ्रीव्हिलर के रूकते ही उसकी भड़भड़ाहट खामोश हो चुकी थी। बेसीला ने नेमप्लेट पढ़ी - 7 च गोकुल विहार।
हां यही घर है। उसने गर्दन हिलाई और भाड़ा चुकाया। कॉलबेल दबाने से पूर्व उसने भरपूर नजर से घर को निहारा। तो यह है अतुल का नवनिर्मित घर। कितना बुला रहा था उसे। एक बार आ जाओ। हमारा नया मकान देख जाओ। और वो उसे हमेशा ठण्डे आश्वासन ही देती रही। हालांकि उसका मकान देखने की इच्छा मन में थी।
एक्च्युल में वह बेसीला नहीं थी। मांझल थी। बेसीला तो चर्च के पादरी का दिया हुआ नाम था। मांझल अतुल की पूर्व पड़ौसिन थी। तुतलाने के कारण वह बचपन में उसे मांझल की जगह माचिस कहा करता था। बाद में भी सही बोलने के बावजूद उसने अपनी आदत नहीं सुधारी। इस नाम से उसे पुकारने में उसे अनोखा आनंद आता था। उनके बीच न खून का रिश्ता था न मित्रता का। पड़ौसी होने की, एक साथ खेलकर बड़े होने का एक आत्मीयता भरा प्रगाढ़ स्नेह था। जो कि समय बदल जाने के बाद भी, सबकुछ बदल जाने के बाद भी आज भी उसी तरह कायम था।
आज भी अतुल की स्मृति में वह घर अंकित है जो कभी मांझल का हुआ करता था। जहां वे रेत के घरोंदे बनाया करते थे। फूल पत्ती रोपकर बगीचा बनाकर उसे छोटे-छोटे शंख सीपियों से अपने नाम को लिख मांझल सजा दिया करती थी। अपने से सुंदर उसका घरौंदा देख अतुल चिड़चिड़ा उठता। तब किसी हुनुरबंद शिल्पी की तरह मांझल बड़ी गंभीरता से कहती ‘‘मेरा घर तुम ले लो मैं दूसरा बना लूंगी।’’
‘‘सच्ची में’’ अपनी विस्फारित कंचे सी आंखे घूमता हुआ अतुल अंतरिम स्वीÑति चाहता और वह सचमुच वह घरौंदा अतुल के लिये छोड़ दूसरा बनाने में जुट जाती। होनी किसे मालूम थी, वो एक काल का दिन था - सड़क हादसा हुआ और सबकुछ निगल गया। केवल मांझल बची। दस-ग्यारह साल की घायल बच्ची। फिर कुछ लोग आये थे जिन्होंने उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया था। इसके बाद वह एक अच्छे स्कूल में पढ़ने चली गई। बाद में मांझल वहां की टीचर बन गई। कभी मां के साथ मिलने चला जाया करता था अतुल। मां कुछ न कुछ ले जाया करती थी उसके लिये। एक बार उसके जन्मदिन पर अतुल की मम्मी ने उसके लिये चाकलेट भिजवाई थी। पता चला चाकलेट वह खुद खा गया और उसे एक भालू वाला छल्ला दे आया। जिसे देख वह बहुत हंसी थी। पुरानी स्मृति के उभरते ही बेसीला के होठों पर मुस्कान उभर आयी। कॉलबेल दबाने से पूर्व ही घर का द्वार खुल चुका था।
‘‘मकान ढ़ूंढने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई? अभी नई-नई बस्ती बसी है।’’ उसके हाथ से सामान लेते हुए अतुल की पत्नी वृन्दा ने पूछा।
‘‘नहीं’’ चारों ओर नजरें घुमाकर वो मुस्कुरा उठी।
मां किससे बात कर रही है, कौन आया है? एक एककर वृन्दा के तीनों बच्चे यह देखने चले आये।
बड़ा बबलू- सांवले मुखड़े पर पसरी नाक और उछलते हुए कटोरी कट बाल वाला। सफेद स्कूल यूनीफार्म पहने हुए, छोटा छोटू - कच्छा बनियान पहने सर्दी से कांपता हुआ, अभी आधा तैयार और तीसरी बिट्टू - दुर्बल देह पर शमीज और उस पर हाफ कट स्वेटर धारे हुए, बिल्ली के कान जैसे सिर के दोनों ओर पोनीटेल - रबड़बेंड से बंधे हुए।
‘‘हैलो पूसी केट’’ आकर्षित हो बेसीला ने उसे छूना चाहा। उसके बोलते ही बिट्टू मां के गाऊन के घेरे को अपने चारों ओर लपेटते हुए घूम गई। जिससे मां के गाऊन का घेरा कस गया। उसमें छिपी बिट्टू ऐसी नजर आ रहा थी जैसे कंगारू की झोली में बच्चा। वृन्दा उसे खींचते हुए झुंझला उठी -
‘‘छोड़ न! मुझे गिरायेगी। फिर मेहमान की ओर उन्मुख होकर बोली -
‘‘बैठो बेसीला चाय लाती हूं। बहुत सर्दी है बाहर। रात भर के सफर की थकान भी होगी।’’ कहते हुए वृन्दा ने बैठक के दीवान पर रजाई लाकर डाल दी।
-मम्मी मेरी बेल्ट कहां है.....
-तुम्हारे टिफिन में क्या रखूं? परांठा आचार या सैण्डविच....
-मेरी विज्ञान की किताब नहीं मिल रही.....तीनों स्कूल जाने की जल्दी में थे।
‘‘जरा बच्चों को स्कूल भेज दूं फिर हम तसल्ली से बैठेंगे।’’
हां हां कोई जल्दी नहीं। तुम निपटा लो। वैसे भी उदघाटन सत्र ग्यारह बजे शुरू होगा और वह सुस्ताने लगी। बेसीला ने कसकर रजाई अपने चारों ओर लपेट ली। सिस्टर बेसीला यहां तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षु बनकर आयी थी। वैसे तो बाल कल्याण विभाग वालों ने ठहरने की सारी व्यवस्था की थी किंतु वह अतुल के यहां ठहरने की अनुमति फादर से लेकर आयी थी।
-ओह! मम्मी देखो न यहां कितने मकौड़े जमा हो गये है।
-देखूं कहां......उफ! यह कचरा अभी तक यहीं पड़ा हुआ है।
-बबलू! बबलू · ·, तुमने रात को कचरा बाहर नहीं डाला।
-रात मुझे नींद आ रही थी मैंने छोटू से कहा था डालने को।‘‘बताया हुआ काम नहीं करता।’’कहते हुए शायद उसने छोटू के कान उमेठ दिये थे।
छोटू चीखकर रो पड़ा। दोनों के बीच तड़ातड़ शुरू हो गई। रसोई से बाहर निकल मां ने दोनों को अलग किया।
-क्या बात है सुबह-सुबह किस बात से मारपीट कर रहे हो?
-मम्मी देखो यह बड़े भाई पर हाथ उठाता है। बबलू तत्परता से बोला।
-नहीं पहले दादा ने मेरा कान खींचा था......ये मेरा बताया काम नहीं करता.....मैंने इसको कचरा डालने के लिये कहा था......मम्मी मक्काड़े.......मकौड़े.......... ही मक्काड़े...... मकौड़े........ बाथरूम में मैं नहाने कैसे जाऊं.......रोज-रोज कचरा डालने का मेरा ही ठेका है क्या......मैं नहीं डालूंगा आप छोटू और बिट्टू को क्यूं नहीं कहती......
-चुप ··, वृन्दा चीखी। उसके सब्र का बांध टूट चुका था। इस चीख चिल्लाहट में अतुल भी जाग गया था।
- ये क्या हल्ला गुल्ला हो रहा है बबलू.....छोटू। पिता के जागते ही घर में शान्ति सी छा गई। बच्चे बेआवाज मशीन की तरह बिना खटपट किये निपटने लगे।
बाहर ओटो रूकने का स्वर उभरा। ‘‘बबलू तुम्हारा ओटो आ गया है।’’
दरवाजा खुलने की आवाज से रजाई छोड़ बेसीला उठ खड़ी हुई। स्कूल जाते बच्चों से बाय कर लूं। बाहर अभी पूरा उजाला नहीं हुआ था। बरसात की नमी ने मौसम को और सर्द बना दिया था। बादल अभी भी छाये हुए थे।
-बबलू कचरे की थैली लेते जाना।
-नहीं मैं नहीं ले जाउंगा। बैग पीठ पर लटकाए बबलू बाहर रपट लिया।
-प्लीज बेटा ......
-नहीं, मेरे दोस्त हंसते हैं। लगभग दौड़ते हुए उसने जवाब दिया।
-अरे इसमें हंसने की क्या बात हुई। बाहर सड़क पर ही तो फैंकनी है। रात भर कचरा पड़ा रहने से देखो कितनी गंदगी हो गई है। मां कहती ही रह गई। बबलू ऑटो में बैठ चुका था।
-अच्छा छोटू तुम लेते जाओ।
-नहीं मां मुझे शर्म लगती है।
-इसमें शर्म कैसी घर का काम है। मेरा राजा बेटा। मां ने उसे पुचकारा किंतु दादा की तरह वह भी बैग, बोतल व टिफिन उठाये टैम्पो में लद चुका था।
अस्त व्यस्त मौन घर तूफान गुजर जाने जैसा लग रहा था। अतुल भी निवृत हो अखबार लिये आ बैठा।
‘‘कैसी हो? घर ढ़ूंढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई। फोन कर देती, मैं लेने आ जाता........ वृन्दा चाय में कितनी देर है?’’
‘‘लाती ही होगी। बच्चे अभी ही स्कूल गये है। क्या तुम्हारे यहां हर रोज ‘सुबह’ ऐसी ही तूफानी होती है।’’ बेसीला ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘‘हां, ऐसी ही तीन सुबह और तुम्हें यहां गुजारनी है।’’ जवाब देते हुए अतुल भी मुस्कुरा उठा।
‘‘किसी को पागल करने के लिये बहुत है।’’ बेसीला ने कहां और खिलखिला पड़ी।
‘‘शाम को तुम मोबाइल कर देना मैं लेने आ जाऊंगा। कब तक फ्री हो जाओगी?’’
वृन्दा चाय ले आयी। वे पीने लगे।
‘‘यह तो वहां जाकर ही पता चलेगा कितना वर्क लोड है।’’
‘‘केवल खानापूर्ति होते है ऐसे प्रोग्राम होना जाना कुछ नहीं। सबकुछ जस का तस रहता है।’’
‘‘ऐसा तो नहीं है.......’’
‘‘नब्बे प्रतिशत ऐसा ही होता है’’ अतुल अपनी बात पर बल देते हुए आगे समीक्षा करने लगा - हां, पर करने पड़ते है ऐसे प्रोग्राम। ऊपर से प्रेशर रहता है। बजट पूरा करो...... काफी फंड रहता होगा.......?’’
‘‘हां, बाल कल्याण के नाम से काफी फंड आता है......विदेशों से भी।’’
‘‘कितने भी प्रोग्राम कर लो कोई फायदा नहीं। पर यहां प्रोग्राम होने से एक फायदा यह हो गया कि तुम्हारा यहां आना हो गया।’’ और वह हंस पड़ा। उसकी इस बात पर बेसीला भी मुस्कुरा उठी थी।
तभी डोर बेल बज उठी। डिंग · डांग · डिंग · डांग ·।
‘‘आ गई......’’ चिहकती हुई वृन्दा ने दरवाजा खोला।
-दीदी कचरा है क्या.....?
-तीन दिन से आई क्यूं नहीं कितना जमा हो गया है........
जमा तो उस पर भी हो गई थी मैल की कई गर्ते। गंदेले कपड़े, मुंह और हाथ पांव पर जमी मैल ने उसकी रंगत ही मटियाली कर दी थी। बिखरे उलझे शुष्क बाल तिस पर पीठ पर लटकता हुआ कचरे का झोला। घिन आने के लिये बहुत था। पर अब तक कुछ खिन्न उदिग्न सी बैठी वृन्दा के चेहरे पर उसे देख खुशी फूट आई।
तीन पोलीथीन बड़ी बड़ी कचरे से ठूंसी थैलिया उठा लाई वह और उसे पकड़ाते हुए अतुल से बोली - जरा दो रूपये देना और अतुल ने जेब से सिक्का निकाल वृन्दा की ओर उछाल दिया।
-कुछ और.....आशा से भरी हुई थी उसकी नजरें।
-हां देती हूं......थोड़ा ठहर अभी लाती हूं। वृन्दा भीतर से जब वापस बाहर आयी तो उसके हाथों में डिब्बा व कटोरा था।
-ले.......थैली निकाल......
उसने झोले में से मुड़ी तुड़ी थैली निकाल खोली व उसमें बासी भात, तरोई परमल और रायता मिली हुई सब्जी साथ में डेढ चपाती भी उसमें उलटती गई। कल बहुत बचा था तो नहीं आई सब कुत्तों को डालना पड़ा।
‘कुत्तों को’ कहते हुए रोष उभर आया था उसके स्वर में। ‘रोज आने की’ अधिकार भरी हिदायत उसे दे, दरवाजा बंद कर वह कुर्सी पर आ बैठी और ठण्डी हुई चाय का लम्बा घूंट भर खत्म कर दी- ठण्डी हो गई।
‘‘चाय तो पी लेती कम से कम। ऐसी भी क्या जल्दी थी। वो कहीं भागी तो नहीं जा रही थी?’’
‘‘तुम क्या जानो आज पूरे तीन दिन से आयी है मरी। पूरा घर सडांध मार रहा था। खाली कप ले वह वह उठ खड़ी हुई। वर्षा की बूंदाबांदी फिर शुरू हो गई। जो दिनभर चलती रही। खाली पड़े प्लोटों में यहां वहां पानी भर गया। खुला इलाका होने से हवा तीर सी सनसनाती लग रही थी। रात भर रिमझिम चलती रही। यह इतवार का दिन था। बच्चे सोये हुए थे। वृन्दा ने राहत की सांस ली। ‘‘अच्छा हुआ आज छुट्टी है वर्ना बच्चे बेचारे ठण्डे मर जाते।’’ बबलू की टांग बाहर निकली हुई थी और छोटू की पीठ। बिट्टू तो पूरी उघड़ी हुई। मां ने तीनों को रजाई से अच्छे से ओढ़ा दिया। ममता उसके चेहरे पर फूट पड़ी।
‘‘आज सर्दी बहुत बढ़ गई है’’ सुबह उठते पहला वाक्य वृन्दा के मुंह से यही निकला था।
तभी डोर बेल बज उठी। ‘वह आ गई दीखती है’ वृन्दा उठ खड़ी हुई और उसने दरवाजा खोला। दरवाजा क्या खुला ठण्डी बयार भीतर घुस आयी।
दीदी कचरा है क्या......? वहीं रोज का रटा रटाया वाक्य।
‘‘हां लाती हूं’’ कहकर वृन्दा पलटी। वापस लौटी तो उसके हाथ में कचरा भरी थैली थी। झटपट थैली और सिक्का दे दरवाजा बंद करने के लिये उसके ठिठुरे कदम पलटने वाले ही थे कि-
-दीदी कुछ पहनने को......
उसके कातर स्वर ने उसे रोक दिया। ‘‘देखती हूं।’’
कुछ देर बाद वह स्वेटर ले आयी थी नीले रंग का।
‘‘मम्मी यह मेरा स्वेटर है इसे नहीं दोगी।’’ रजाई से मुंह बाहर निकाल बबलू चीखकर उठ खड़ा हुआ। और एक ही झटके में मां के हाथ से स्वेटर खींच लिया। फिर कुछ देर बाद -
-तुम भी अजीब हो। देने को मेरा ही स्वेटर मिला। प्योर वूल का है। अन्दर पहन लूंगा।
वह ठिठुरती हुई दरवाजे के सहारे आस लगाये खड़ी थी। हमेशा की तरह झोला उसकी पीठ पर लदा हुआ था और चेहरे पर वही मैल की जाजम बिछी हुई थी। जिस पर आज करूणा नाच रही थी सिड़कती सांस की ताल पर। ठिठुरन और नाक से उठती हुई सड़-सूं की जुगलबंदी सुबह की नीरवता को चीर रहे थे। वृन्दा ने अपना पुराना शॉल देकर दरवाजा बंद कर दिया।
बेसीला को उठता देख वह चाय ले आयी। अतुल भी आ गया। तीनों चाय पीने लगे।
‘‘ये जो तुम दया दिखाती हो न ठीक नहीं। अकेला घर है न अड़ौस न पड़ौस, यही लोग ताक लगाये बैठे रहते हैं। फिर मौका देखकर घर साफ कर जाते हैं। और बातों ही बातों मैं पिछले दिनों में शहर में हुई कई चोरियों के किस्से बयान कर दिये अतुल ने, चाय के साथ। वृन्दा का मुंह कसैला हो चुका था अब तक। हर रोज की तरह वह बिना कुछ बोले कप समेट उठ खड़ी हुई।
‘‘वापस रात को ही आओगी?’’ बेसीला से पूछा था उसने।
‘‘हां’’ बदले में संक्षिप्त सा उत्तर मिला था उसे।
आज बेसीला चली जायेगी......यह आखिरी सुबह थी अतुल के घर की। बेसीला आज जल्दी उठ गई थी। उसे जल्दी जाना था। प्रशिक्षण का आखिरी दिन और समापन सत्र के साथ और भी बहुत से काम निपटाने थे उसे। फिर शाम 8 बजे की गाड़ी थी। निवृत हो उसने अपना सामान बांध लिया और अतुल ने अपनी गाड़ी निकाल ली थी, उसे छोड़ने के लिये।
‘‘वह आज नहीं आयी ?’’ जूड़े पर आखिरी पिन लगाते हुए बेसीला ने वृन्दा से पूछा।
- कौन ?
- वहीं कचरे वाली।
वृन्दा कुछ नहीं बोली, लापरवाही से उसने कंधे उचका दिये। मानो कह रही हो कचरे से भी कम महत्वपूर्ण छोटीमोटी बात का उसे क्या ख्याल? बेसीला चली गई अतुल के साथ और वृन्दा व्यस्त हो गई अपनी गृहस्थी में।
शाम आठ बजे वे लोग प्लेटफार्म पर थे। बेसीला को विदाई देने आये थे। समय अभी शेष था गाड़ी चलने में। बेसीला के बगल में बैठे सात-आठ बच्चों को देख वह चौंक उठे।
-ये लड़कियां और लड़के....... ये तो वही बच्चें है जो कचरा बीनते हैं। बिल्कुल साफ सुथरे और व्यवस्थित और उसकी ओर तो उसकी नजरें टिकी रह गई। वह पहचान गया - तुम.....यहां? वृन्दा ने उस मटमैली लड़की की ओर इंगित किया था परन्तु बदले में जवाब बेसीला ने दिया -
‘‘इन्हें मैं ले जा रही हूं। कुछ देर की दया दिखाने नहीं’’, फिर एक-एक शब्द चबाते हुए बोली बेसीला - ‘‘पूरा जीवन संवारने.......इंसान बनाने’’।
दोनो चौंक पड़े। ‘‘धर्म परिवर्तन कर मिशन का काम कराने......’’तीखेपन से अतुल ने कहा।
‘‘धर्म? धर्म किसे कहते है? ये अबोध जिन्हें दो जून की रोटी नसीब नहीं। जिन्हें कंपकंपाती ठण्ड में कपड़े भी मयस्सर नहीं। जिनके सिर पर है नंगा आकाश और पैरों तले उबड़-खाबड़ जमीन। स्वास्थ्य शिक्षा जैसी बुनयादी जरूरतों से भी वंचित हैं जो। वे क्या जानेगें धर्म को। इनका धर्म पेट की आग से जुड़ा है।
‘‘उसी का फायदा उठाकर तुम लोग इनका धर्म परिवर्तन.....’’
बात बीच में ही लपकते हुए बेसीला ने प्रत्युक्तर दिया। ‘‘इल्जाम लगाने से पूर्व अच्छी तरह सोच लो अतुल। जहां तक धर्म की बात है मेरी दृष्टि में मानव धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं। आज तुम्हें अपने बच्चों की कितनी फिक्र है परन्तु कभी इन बच्चों के बारे में सोचा कभी?’’
‘‘मैं.......?....... भला क्यों.......? बेसीला के सीधे सवाल से अचकचा उठा अतुल।
‘‘सोचने लगा’’ वाक्य पूरा किया बेसीला ने। कोई भी नहीं सोचता दूसरों के लिये। अपनों के लिये सभी सोचते है पर मुझ जैसे अनाथों, विपत्ती के मारो का क्या होगा? किसी को तो आगे आना ही होगा। जैसे उस समय फादर ने मेरी उचित देखभाल न की होती तो मेरा क्या होता? मैं किसी धर्म को नहीं मानती।
‘‘नहीं मानती तो.......ये क्या?’’
‘‘फादर का प्रेम से दिया नाम मैंने अपनाया जरूर है पर सन्यास मैंने अपनी मर्जी से लिया है।’’ बेहद संयत स्वर में बेसीला बोली।
उस दिन वह अपनी शादी का कार्ड देने गया था तब उसने सहज ही पूछा था -
‘‘तुम कब शादी कर रही हो माचिस?’’
‘‘नहीं मैं सन्यास ले रही हूं.’’
‘‘भला क्यों?.....यह भी कोई उम्र है सन्यास लेने की?’’ वास्तव में कुछ दिनों बाद उसने सन्यास ले लिया था। वह मांझल से सिस्टर बेसीला बन गई थी। एक सच्ची संत, मानवता की महान पुजारी उसके आंखों के सामने थी। गदगद हुए अतुल वृन्दा की आंखे भर आयी।
‘‘मुझे नहीं मालूम था नाम अपना असर छोड़ता है। जो जीवन में कहीं न कहीं अपनी छाप छोड़ता है। प्रत्येक सार्मथ्यवान व्यक्ति अगर एक अबोध बेसहारा का सहारा बन जाय तो इस देश का भविष्य ही कुछ ओर होगा।’’ अतुल बुदबुदा उठा।
‘‘मुझ जैसे बहुत है इस दुनिया में जिनका मैं सहारा बन सकती हूं। जिनके उपयोग में मेरा जीवन आ जाये तो मेरे एकमात्र परिवार में जिन्दा बचे रहने की सार्थकता होगी। मेरे भीतर जब तक अपने साथ गुजरी त्रासदी की आग दफन है मैं दूसरों के जीवनदीप जलाती रहूंगी।’’ इतना कहकर वह हंस दी।
‘‘बिल्कुल माचिस की तरह, खुद जलकर दूसरों को रोशन करती रहोगी।’’ उसकी ये निश्छल हंसी ही तो बहुत अच्छी लगती थी अतुल को।
गाड़ी धीरे धीरे पटरियों पे सिरकने लगी। वृन्दा अतुल ने अपनी नम आंखे पौंछी और कूपे से नीचे उतर आये। बच्चे, वृन्दा व अतुल आगे बढ़ती गाड़ी को हाथ हिलाहिला अलविदा कहते रहे जब तक खिड़की से झांकती उस संत की दिव्यता रफ्तार के साथ बिन्दु में बदल विलीन न हो गई।

Friday, October 9, 2009

रिंगटोन



बेटी का फोन था
‘मुझे बचा लो मां’ का रिंगटोन था
कल फिर उन्होंने
मुझे मारा और दुत्कारा
तुम औरत हो
तुम्हारी औकात है -
पैर की जूती
जूती ही बनी रहो
खबरदार!
जो सिर उठाने की कोशिश की
तो कुचल दूंगा
देखा नहीं क्या
तुमने कल का अखबार
कल का नहीं तो
परसों का ही देख लो
रोज छपती है
तुम जैसी कितनी ही
बेमौत मरती है
मेरा क्या कर लोगी?
यहां तो पुलिस भी बिकती है
जिसकी लाठी
भैंस उसी की ही होती है
जिसे समझती हो तुम
अपना खूबसूरत चेहरा
उसी को वो तेजाबी जलन दूंगा
कि फिर तुम ना कहने से पहले
सोचोगी दस बार,
सैकड़ों बार, हजारों बार
बेटी का फोन था
मुझे बचा लो मां का रिंगटोन था

Friday, October 2, 2009

बूढ़ा जाते है मां बाप


टूटता है जब मनोबल

तो घर देता है सम्बल
घर में -

मां है , बाबूजी है
जिनकी छाह तले
और भी किले है ।

नेह के धागों में
मन के मनके पिरोकर
छककर करता है अमृतपान
फिर बढ़ता है -दरखत मनोबल का
धीरे-धीरे
उन पर चढ़ने लगती है
स्वार्थों की फंफूद
बरगदसी बाहें फैलाये
आकाशीय जड़े महत्वकांक्षाओं की
तोड़ लेती है
सारे सरोकार, और
क्षणांश में
बूढ़ा जाते है मां बाप

Tuesday, September 22, 2009

आरोह - अवरोह
मेरी आंखों से झर झर आंसू झर रहे थे। मुझसे उनकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी। उन्हें सांस लेने में काफी तकलीफ हो रही थी। फिर उपर से ये खांसी का दौरा, खांसते-खांसते तो मानो प्राण ही निकल जायेंगे। वह बेदम सी हुई जा रही थी। ‘हे भगवान! इन्हें जल्दी ठीक कर दे’ मन ही मन मैं बार-बार यही गुहार लगाती हुई उनकी पसलियों पर विक्स की मालिश कर रही थी। मालिश के बाद मैंने उन्हें खांसी की दवा दी। आराम होने में कुछ समय लगा। उन्हें आराम मिला तो नींद भी आ गई।
मैंने झुककर देखा, क्या वह सो चुकी है? ‘हां ’शायद’ मैं उठने के लिए हिली तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया- ‘कहां जा रही हो?’ उनकी आंखों में ये प्रश्न चमक रहा था और साथ ही चेहरे पर खुदा हुआ आदेश भी- ‘यहीं रहो, मुझे छोड़कर मत जाओ’ और मैं उनके पास बैठकर फिर से उनकी छाती को सहलाने लगी।
सोयी हुई भी वह ममता की मूर्ति नजर आ रही थी। खुद तकलीफ देख लेती पर मुझे किसी प्रकार की तकलीफ हो यह उन्हे गंवारा न था। आगे बढ़कर गृहस्थी की चक्की में जुत जाती। भोर सवेरे से ही उठकर वह कई काम सलटा देती। मैं उठती तो सामने उनकी बनाई हुई गरमा-गरम चाय होती। मुझे चाय पिलाते समय एक सन्तुष्टि का भाव उनके चेहरे पर तैरता मिलता। मुझे भूख कब लगती है इसकी घड़ी भी उनके पास ही होती। सुबह नौ बजते ही दूध के लिए उनकी पुकार सुनाई पड़ जाती। एक बार की आवाज पर जब सुनवायी नहीं होती तो वह दूसरी बार बुलाती और तीसरी बार में तो वह खुद देने पहुंच जाती। तब बड़ा दुख होता, ‘‘आप क्यूं आयी, जीना चढ़कर ऊपर ? आपकी तबीयत ज्यादा खराब हो जायेगी तब ?
वह हंसकर कहती, ‘‘अब मर भी जाऊं तो कोई दुख नहीं, तुम आ गई हो न अब घर संभालने। अब मैं चैन से मर सकती हूं।’’
‘‘आप हमेशा मरने की बात क्यूं करती है ?’’ कहते हुए मेरी हथेली उनके मुंह को ढ़क देती। ‘‘कभी सोचा आपने, आपके जाने के बाद मेरा क्या होगा ? मैं तो आपके बिना एक पल जीने की सोच भी नहीं सकती।’’
‘‘पगली हो तुम!’’
‘‘नहीं मैं सच कह रही हूं। आपकी छाया सदैव मुझ पर बनी रहे।’’ मैं उनसे लिपट जाती और वो भावविभोर हो मेरी पीठ सहलाने लगती।
‘‘आप जल्दी अच्छी हो जाओगी।’’ और वाकई में ऐसा हुआ भी। मेरी शादी के बाद वह बहुत खुश रहने लगी थी और स्वस्थ भी। किन्तु जब कभी फिर पुरानी बिमारी उभर आती तो उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ता।
अब तो वह अस्पताल भी मेरे बिना नहीं जाती, कहती थी- ‘‘तुम आओगी मेरे साथ। तुम डॉक्टर को ठीक से बता पाओगी और उसकी कही बात को भी तुम्हें ही समझना है।’’ उनकी बात ठीक भी थी। 24 घंटे उनके साथ रहते हुए उनकी बिमारी को मैं काफी अच्छी तरह समझने लगी थी। उन्हें हर वो हिदायत देती व उस बात से दूर रखने का हर संभव प्रयत्न करती जो उनकी बिमारी का कारक बनता। दवाई के मामले में तो मैं बेहद गंभीर थी। एक खुराक भी भूले से नहीं चूकती ताकि पुरानी बिमारी दबी रहे, उभरने न पाये।
खुशहाल समय पंख लगाकर गुजरता जा रहा था। अब तो उनकी गोद में पोते-पोती खेलने लगे थे। वे बड़ी प्रसन्न थी। उन्हें तो उम्मीद नहीं थी कि वह इतना सबकुछ अपनी आंखों से देखेंगी। ‘ये सुख भी नसीब ने लिखा है’, अपनी आस से भी अधिक पाकर धीरे-धीरे वह अपनी बिमारी को भूलने लगी।
बच्चे उन्हीं के पास सोते उनकी अगल-बगल में लिपटे हुए। उनमें आपस की लड़ाई होती, ‘दादी के पास कौन सोयगा?’ दादी को तंग करते हमारी तरफ मुंह करके सोओ। वह जिधर मुंह करती पीठ की तरफ वाला बच्चा नाराज हो जाता और रोने लगता। मजबूरन उन्हें सीधा लेटना पड़ता। बच्चों का कब्जा ऐसा दादी पर की उन्हें नींद आने पर ही वह करवट ले पाती। कभी-कभी तो वह झिड़कते हुए सबको दूर करते हुए कहती, ‘‘मेरे मुंह के पास न आओ, कहीं मेरी बिमारी तुम्हें ना लग जाये।
बच्चे छोटे थे तो वह गोदी में उठाये उन्हें अपने साथ मंदिर ले जाती। घर से निकले बच्चे और उधमी हो जाते। इधर उधर दौड़ा-दाड़ी करते। कुछ नहीं तो शू-शू ही कर देते। ऐसे में बेचारी की बन आती और दूसरों को उन्हें नसीहत देने का अवसर मिल जाता। इस सबसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका वात्सल्य तो मानो गहरा समुद्र वह बच्चों को खुद से ऐसे चिपका लेती जैसे कोई उनसे उनके बच्चे पृथक कर रहा हो। बच्चे बड़े हुए तो उनके प्रेम का स्वरूप बदल गया। उनकी पसंद से टिफन बनाना, स्कूल तक टिफन पहुंचाना, उनके टीचर से निजी तौर पर मिलना, अनेक हिदायतो का देना इन सबके बीच नई पौध यौवन की दहलीज के पार पहुंच गयी।
वह समय भी आया जब उनकी पोती की सगाई हुई। पोती के दामाद को देखकर वह निहाल हो गई। नसीब में इतना सुख भी छिपा है अपनी दुर्दांत बिमारी के चलते ऐसा उन्होंने सोचा भी न था। खुश हुई वह अपने नये दामाद के आगे पीछे डोलने लगी। उनके पांवों में यौवन सी शक्ति आ गई। स्फूर्त हुई वह पेट के रास्ते दामाद पर अपना नेह लुटाने लगी। उनकी पाककला अपने चरम पर पहुंच गई।
पोती की शादी में मन का सारा उल्लास फूट पड़ा। सामथ्र्य से अधिक श्रम करके उन्होंने हर अवसर को संवारा। उनके पारंगत तरीके और अनुभव चरम पर जा पहुंचे। नतीजन जर्जर देह पर पुरानी बिमारी भारी पड़ने लगी। वह फिर बिस्तर के अधीन होकर रह गई।
उनकी तामीरदारी करने वालों की संख्या अब बढ़ गई थी। अच्छे से अच्छे डॉक्टर, अच्छी से अच्छी दवाई और भरपूर इलाज से कुछ दिन का सुधार तो हुआ पर अब उनका काम करना मुश्किल हो गया। शरीर की शक्ति चुक गई। बैठे रहना उन्हे रास नहीं आता। यह स्थिति उन्हें खिजाने लगी। ऊपर से रोटी के कौर उनके गले में फंसने लगे।
दिनों दिन हालत बदतर होती जा रही थी। एक रोटी खा पाना भी मुश्किल होता जा रहा था उनके लिए। रोटी सब्जी में चूरकर खाना, दलिया-खिचड़ी खाना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं रहा। पेट की श्रुधा का हल रोटी ही था जिसे वह खा नही पा रही थी। वह रोटी से नाराज होने लगी, क्रोधित होने लगी। कभी थाली को तो कभी रोटी को पटकने लगी- ‘‘यह रोटी मुझे दुश्मन की तरह लग रही है। ले जाओ इसे सामने से। ये सामने आती है तो मुझे चिढ़ आती है।’’ मन दुखी होता, हम सब बेबस और लाचार से उन्हें समझाने का प्रयास करते तो वह फूट-फूटकर रो पड़ती।
‘‘तुम क्या सोचते हो? मुझे खाने की इच्छा नहीं होती? पर मेरा कंठ देखो, सिकुड़ गया लगता है। पानी के साथ जबरन उतारते हुए बहुत तकलीफ होती है।’’
‘‘आप कुछ दलिया या....’’ बात अधूरी ही रह जाती। उस बूढ़े और बिमारी जिस्म में न जाने कहां से इतना तैश समा जाता कि वह इन सबका नाम लेने ही नहीं देती। फिर खुद ही फूट पड़ती- ‘‘मैं कहती हूं कि जिसकी रोटी छूटी उसका घर छूटा।’’
‘‘आप बेकार की बात न करा करें।’’ मेरी आंखे भीग उठती। अभी पिछली दफा ही डॉक्टर ने कहा था- ‘‘यह कुछ दिनों की मेहमान है। दोनों फैफड़े खत्म हो चुके है। लीवर और ह्रदय संक्रमित हो चुका है। आंतो में सूजन है अब इलाज लगना मुश्किल है। इनकी सेवा करो।’’
डॉक्टर की बात सुनकर मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। बरसो से इन्हें बिमार देख रही हूं। कुछ दिन बाद यह फिर ठीक हो जायेंगी। अभी इनको और जीना है हम सबके लिए। इनके बिना जीने की बात मेरी बर्दाश्त के बाहर थी। उनका इलाज चालू रहा। डॉक्टर बदल गये। दवाईयां बदल गई तो परिणाम भी सुखद निकला। एक बार फिर उनकी जीवन गाड़ी ढ़र्रे पर आ गई।
कुछ समय तो ठीक से गुजरा किन्तु थोड़े समय बाद वह फिर बिस्तर की होकर रह गई। फिर से उनका खाना-पीना मुहाल हो गया। एक एक अंग उनका साथ छोड़ने लगा था। वह धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रही थी। मैंने अपने आपको इतना असहाय कभी नहीं पाया। उन्हें एक पल भी छोड़ना और उनके लिये मौत की बात भी सोचना मेरे लिए असá था।किन्तु वह थी कि हिदायते देने लगी। मुझे समझाने लगी- ‘‘देखो, तुम गंगाजल व तुलसी मेरे मुंह में रखना, साथ में गंगामाटी भी। मुझे मोक्ष मिले। मेरी काया को गति मिले। मेरे मरने के बाद तुम्हें क्या-क्या करना होगा, तुम ध्यान से सुन लो। फिर तुम्हें कौन बतायेगा?’’
और मैं?..... हंसकर टाल जाती उनकी इन बातों को। ‘‘आप अच्छा-अच्छा सोचो। आप नहीं मरेंगी। आपको जीना होगा हमारे लिए। आप जल्दी ठीक होने की सोचो।’’ मैं उनका विश्वास बढ़ाने की सोचती और खुद भी विश्वस्त होने की कोशिश करती।
तीन दिन हो गये, अन्न का एक दाना भी उनके मुंह में नहीं गया। किसी तरह का जूस देकर उनकी खांसी को बढ़ाना था। सूप या मूंग की दाल का पानी उन्हें पसन्द नही। उनका पसंदीदा पेय चाय के बस घूंट दो घूंट, यहीं उनके हलक से उतर रहे थे।
आज गणगौर का त्यौहार था। उन्होंने हमें पूजा करने जाने का आंखों से ही आदेश दिया। वो अब इतनी नि:शक्त हो चुकी थी कि शब्दों को मुंह से ठेल भी नहीं पा रही थी। कुछ अस्फुट स्वर ही उनके मुंह से निकल रहे थे।
मैंने पूजा के लिए विशेषतौर से गोटा लगी चुनर पहनी। ‘मुझे इसमें सजी देखकर वह बहुत खुश होगी।’ ऐसा मेरा अनुभवभरा जीवन रहा है। पूजा करने जाने से पहले मैं उन्हें दिखाने गई, ‘‘देखो मां! तुम्हारी बहू कैसी लग रही है?’’ उनकी आंखे भावना शून्य थी। प्रेम रस से सरोबर आंखे आज सूनी सूनी थी। मुझे आश्चर्य हुआ मोह का सेतु कैसे टूट सकता है? ‘मोह रखने वाली ये आंखे आज इतनी निर्मोही कैसे हो गई?’
बाहर सड़क पर बहुत शोरगुल था। ढ़ोल नगारे बज रहे थे। गणगौर की सवारी अपने पूरे यौवन पर थी। इधर वह बेदम हुई जा रही थी। पास बैठी हुई मैं मन ही मन कामना कर रही थी कि ये एक बार, बस एक बार ठीक हो जाये। तभी उन्होंने इशारा किया। हाथ से गोलाई खींचते हुए हाथ मुंह की ओर ले गई। मैं तत्काल समझ गई। वह रोटी मांग रही है। मैं उठी और एक गरम, घी से चुपड़ी नरम रोटी ले आयी। ताकि वे खा सके। मैंने कौर तोड़कर उनके मुंह में डाला। उन्होंने कौर को मुंह में घुमाया, चबाया पर वो निगल नहीं सकी। कौर गले में ही अटक गया। वो उलझ गई। खांसी का दौर उठा तो रोटी का कौर बाहर था। वह खांसते-खांसते बेदम होकर लुढ़क गई।
अनायास ही मेरे हाथ उपर की ओर उठ गये, ‘‘ हे भगवान! अब इन्हें मुक्ति दे। इनकी ये हालत मुझसे नहीं देखी जा रही।’’ उसी क्षण कहीं भीतर कुछ चटका। मेरी अरदास थी या मोह के सेतु का टूटना। पंछी पिंजरा छोड़कर उड़ गया। मेरे हाथों से उनकी नब्ज खिसकती चली गई और आंखें फटी की फटी रह गई। जिन्हें बंद करते हुए मैं अपराधबोध से बोझिल हुई जा रही थी-
‘ये मुझे क्या हो गया था? मैं क्यों बदल गई? हमेशा ईश्वर से मैंने इनके लिए जीवन मांगा आज मौत कैसे मांग ली। ये क्या हो गया था मुझे? मैं ऐसे कैसे बदल गई? क्या मैं बड़ी हो गई?

Saturday, September 19, 2009

दिव्यलोक


दिव्यलोक
मेरे पति को ब्रेन ट्यूमर हो गया था। खबर सुन मैं सकते में आ गई। मेरा तो रो रोकर बुरा हाल हो गया। खाना पीना छूटने के साथ हर वक्त की दुश्चिंताओं ने मुझे चिड़चिड़ा बना दिया। ब्रेन ट्यूमर अर्थात सिर के भीतर गांठ। रिपोर्ट देख डॉक्टर बोले- ‘‘इसका तुरंत इलाज कराना होगा। वर्ना यह जानलेवा हो सकता है।’’ गांठ की भी जांच होगी और यदि गांठ कैंसर की हुई तो.....सोचकर ही मेरा रोंया-रोंया कांप उठा।
अभी समय ही कितना हुआ है हमारे विवाह को - मात्र तीन साल। सोनल, एक साल की बेटी है हमारी। आलोक का था अपना स्टूडियो। खूब मेहनत करते, दिन-रात काम में जुटे रहते। शादी के सीजन में तो फोटोग्राफी के लिये रात-रात जागकर काम करते। दूर दराज के इलाकों में भी जाते। उत्सवों में तो उन्हें भोजन के लिये भी वक्त नहीं मिलता। हर महत्वपूर्ण क्षण को फोटो में कैद करने से नहीं चूकते। तस्वीरे भी इतनी शानदार और जानदार बनती कि लोग इनके खींचे फोटुओं की प्रशंसा करते नहीं अघाते। एडवांस बुकिंग कराते। कुल मिलाकर आलोक का बहुत अच्छा काम और नाम था। लिहाजा आमदनी भी अच्छी होती थी। हम बहुत खुश थे। जीवन अच्छा बीत रहा था पर अचानक यह बीमारी हम पर बिजली बनकर गिरी।
हमारी सुखी जिन्दगी क्या सबकुछ तो बिखर गया। बीमारी बढ़ जाने की हालत यह हुई कि एक दिन स्टूडियो पर ताला लग गया। रोज-रोज अस्पतालों के चक्कर, मंहगी जांच-दवाइयां। इलाज पर पैसा पानी की तरह खर्च होने लगा और पैसे की आवक खत्म हो जाने से हमारा हाथ तंग होने लगा। ऐसे में कौन मदद करता? किससे कहूं? कैसे कहूं ? कोई आय नहीं। फलस्वरूप मेरे गहने एक-एक कर बिकने लगे। हालत की गम्भीरता को देखते हुए ऑपरेशन तो कराना ही था।
बम्बई के बड़े अस्पताल में आलोक का ऑपरेशन हुआ और गांठ निकाली गई। खर्चा तो बहुत हुआ पर इलाज सफल हुआ और यह ठीक होकर घर आ गये। परीक्षा की घड़ी गुजर चुकी है यह सोच मैंने राहत की सांस ली। परन्तु राहत कहां? मेरे जीवन की मुख्य परीक्षा तो अब थी- इनकी देखरेख के साथ मंहगी दवाओं का खर्च सामने था। फिर हर थोड़े समय बाद डॉक्टरी चैकअप जांच इन सबके लिये भी तो पैसा चाहिये। इतने पैसे कहां से लाऊं? हर समय यहीं उधेड़बुन मुझे खाये जाती। वह उठने बैठने जरूर लगे थे पर काम तो नहीं कर सकते थे। जिससे दो पैसे की आय होती। सिगरेट पीने की लत तो उन्हें शुरू से थी ही। अब फालतू समय गुजारने के लिये वह फिर हावी हो गई। अब तो बैठे ठाले गुटखे की जुगाली करने लगे जो और नुकसानदेह थी। कुछ भी हो पर मुझे उनकी सेहत का ध्यान रखना जरूरी था। मैं गुटखे के पाऊच छिपा देती या फेंक देती। सोचती यह जल्दी स्वस्थ हो जाय तो काम करना शुरू करें और घर आर्थिक तंगी से उबर पाये। परन्तु कहां, इनकी तबीयत तो दिनपर दिन गिरती जा रही थी। अब तो मेरा धैर्य भी चुकने लगा। मेरी भी हिम्मत जवाब दे रही थी। इनके न सिर्फ हाथ पैर कमजोर हो गये थे बल्कि अब तो दिखाई भी कम देने लगा था। लोग दबे छिपे स्वर में कहने लगे थे अब तो यह नहीं बचेगा। यह सुन मैं तो बिल्कुल पस्त, निढ़ाल हो जाती। मुझे अपनी और नन्ही बेटी सुरभि की चिंता सताने लगती- मेरा क्या होगा? मेरी बेटी का क्या होगा? अब तो मैं सारे वक्त यहीं सोचने लगी थी।
मैंने बहुत सोचने के बाद निर्णय लिया कि अब कमाई के लिये मुझे ही कुछ करना होगा। कहीं न कहीं कोई नौकरी ही मिल जाय। पर कोई सम्मानजनक नौकरी भी तो पूरी पढ़ाई के बाद मिलती है। मेरी पढ़ाई पूरी कहां से होती? उन्नीस वर्ष की आयु में ही विवाह हो गया था। पिता का घर छूटा तो पढ़ाई भी छूट गई। नये जीवन में प्रवेश के बाद न इन्होंने और न मैंने कभी अधूरी छूटी पढ़ाई पूरी करने की सोची। जीवन में पूरी खुशहाली थी। कभी बुरे दिन भी आयेंगे और आड़े वक्त पढ़ाई ही स्वावलम्बन में हमारा सहारा बनेगी तब ऐसा कहां सोचा। आज आधी अधूरी पढ़ाई के दम पर कोई काम मिलेगा? बहुत कम आशा थी। मैंने फैसला लिया- मैं अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करूंगी। पढ़लिख जाने से ही कोई नौकरी मिल पायेगी। इस बारे में मैंने अपने श्वसुर जी से बात की। बाबूजी तो कुछ न बोले पर आलोक ने प्रश्न किया-
‘‘पढ़ाई का खर्चा कहां से आयेगा?’’
पर बाबूजी ने कहा- ‘‘बहू पढ़ना चाहती है तो पढ़े। मुझे कोई आपत्ति नहीं किंतु आजकल पढ़ लिख कर भी नौकरी नहीं मिलती। कहीं छोटी मोटी प्राईवेट नौकरी तो अभी भी की जा सकती है। मैं किसी विद्यालय या संस्था में बात कर सकता हूं। काम करते हुए भी यह अपनी पढ़ाई पूरी कर सकती है।
‘‘पर बाबूजी एक बार तो पैसे चाहिये। फीस, फार्म, किताबों के पैसे कहां से जुटाएंगे। एक धेला तो हैं नहीं हाथ में। वो तो आपकी पेंशन न आती हो तो खाने के लाले पड़ जाये। मेरा कमाया हुआ तो सारा फुंक चुका है इलाज में।’’
‘‘तुम चिंता मत करो। मैं खर्च करूंगा।’’ बाबूजी ने हिम्मत बढ़ाई तो मैं पढ़ने लगी। कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू किया। घर बाहर का काम, छोटी बच्ची, और फिर ट्यूशन पढ़ाना। इन सब में मैं इतनी खप जाती थी कि पढ़ती थी तो कुछ याद ही नहीं होता। समझ में नहीं आता था। दिन भर के परिश्रम के बाद रात को किताब सामने आते ही नींद के झोंके आने लगते। आलोक को भी अब पहले जितना समय नहीं दे पाती। कभी दवा लाना भूल जाती तो कभी उधड़े कपड़े सीना। उन्हें लगता कि अब मैं उनकी जानबूझ कर उपेक्षा कर रही हूं। समय न दे पाने के कारण मैं भी हर समय अपराधबोध से घिरी रहती। वे मुझ पर गुस्सा करने लगते। मैं भी दबी-दबी सहने लगी। कभी किसी बात में कोई कसर रह जाती तो वह गाली देने लगते और हाथ उठा देते। चिल्लाते कहते कि अब वह कमाऊ नहीं रहे, उसे बोझ लगने लगे हैं। मैं वाक्य तीरों से घायल हुई अपना पढ़ा हुआ सब भूल जाती और सुबकने लगती। अपनी स्थिति किससे कहूं? क्या कहूं।
एक दिन उषाजी हमारे यहां आयी। उषाजी हमारे पास सामने वाली लाइन में ही रहती है। बहुत अच्छी महिला है। उस दिन इनके थप्पड़ से मन बहुत क्षुब्ध था। उन्होंने दो शब्द सांत्वना के बोले तो मैं रो पड़ी। आंखों में तो मानो सैलाब ही फूट आया था अपनी बेचारगी का। मुझे मां की तरह वह पुचकारने लगी- ‘‘रोती क्यों है? रोने से क्या होगा? सब समय एकसा नहीं होता। बुरा वक्त भी गुजर जायेगा। तुम्हारे अच्छे दिन भी लौटेंगे।’’
‘‘पर कब और कैसे?’’ मैं फिर सुबक उठी।
‘‘अरे पगली! चुप हो। औरत के अंदर बहुत ताकत होती है। वह चाहे तो सबकुछ बदल सकती हैं। सबकुछ संभाल सकती हैं। तुम अपनी ताकत को पहचानो। बहुत कुछ कर सकती हो।’’ मुझे लगा जैसे मेरी दिवंगत मां बोल रही हो। उनके दुलार की उष्णता से मैं पिघली जा रही थी। फिर सिसकते हुए पूछने लगी-
‘‘पर कैसे? क्या मैं कुछ काम नहीं कर रही हूं? क्या कमी रखी है मैंने? अब और कितना कर सकती हूं भला। रोज तिल तिल कर जी नहीं बल्कि मर रही हूं।’’
वे काफी देर तक मुझे समझाती रही। दिलासा देती रही। बहते आंसू पौंछती रही। उनके जाने के बाद मैंने अपने आपको बहुत हल्का महसूस किया। लम्बे समय बाद मैं बहुत हल्का महसूस कर रही थी। मां जैसा ममत्व पाकर मैंने मन ही मन प्रण किया अब मैं कभी नहीं रोऊंगी। अपनी, बेटी की और पति की ताकत बनूंगी।
वह दिन बहुत अच्छा सुहावना था। रिमझिम बारिश हो रही थी। ट्यूशन के लिये बच्चे नहीं आ पायेंगे। सोचा आलोक के कपड़ों की अलमारी ही जमा दूं। काफी समय से संभाल नहीं पा रही थी। मैंने आलोक के कपड़े निकालने के लिये अलमारी खोली। कपड़े निकालने लगी। देखा, एक कोने में उनका कैमरा पड़ा है। मैंने उसे छुआ ‘मेरे पति का अनमोल साथी’ फिर उठाकर बाहर निकाल चूम लिया। देखा उस पर धूल जमी हुई है। यह देख मेरा मन भर आया। मैं आंचल से उसे पौंछने लगी। मेरी अंगुलिया कैमरे को सहला रही थी। बहुत साथ दिया इसने आलोक का। इसके साथ से हमारा जीवन कितना सुखमय था पर अब यह निकम्मा हो गया है। पर इसे निकम्मा क्यों कह रही हूं तत्क्षण ही विपरीत ख्याल आया। बेकार तो इसका मालिक हुआ है यह तो अभी भी पूरी मुस्तैदी से अपना कमाल दिखा सकता हैं। चाहो तो अभी आजमा लो। चमकता हुआ कैमरा मुस्करा पड़ा- क्या सोच रही हो दिव्या ? मैं सच कह रहा हूं। तुम चाहो तो मैं आज भी तुम्हारा साथ निभा सकता हूं।’ दमकते कैमरे की इस अपील से एकाएक मेरे हाथों में स्पन्दन सा महसूस हुआ। एक नवीन विचार मेरे मन में कौंधा। तत्काल ही मैं कैमरा लेकर आलोक के पास पहुंची। हुलसती हुई बोली- ‘‘इससे कैसे तस्वीर खींचते है, मुझे बताओ।’’
लम्बे समय बाद अपना कैमरा देख आलोक भी बिस्तर पर उठ बैठे। उन्होंने कैमरे को पकड़ा। आंख के पास ले जाते हुए उनके उठे हाथ धूजने लगे। मैंने आलोक को संभाला। ‘‘मुझे बताओ क्या करना है?’’ पर वह चुप पड़े रहे और उन्होंने अपनी आंखे मूंद ली। बंद आंखों की कोर से दो मोती ढुलक पड़े जिसे मैंने नीचे नहीं गिरने दिया और बीच में ही उन्हें अपने आंचल में झेल लिया। उस दिन मैंने तय कर लिया पढ़ाई के साथ फोटो खींचना भी सीखूंगी।
ट्यूशन के पहले रूपये मिले- एक सौ पचास रूपये। मेरी पहली कमाई। गाढ़ी कमाई। मेरी नजरों में अनमोल राशि। मन में खुशी के कई कुसुम खिल पड़े। मैंने आंखे मूंद ली। मन सुरभित हो उठा। पांवों में अनोखी दृढ़ता का संचार होने लगा। मन का विश्वास कुलांचे भरने लगा। कई इन्द्रधनुषी सपने आंखों में लहराने लगे-
‘बहुत कुछ किया जा सकता है। सिर्फ थोड़ासा हौंसला चाहिये।’ ताकत बटोर मैंने आंखे खोली। हथेली में पड़ा सौ और पचास का नोट गडिडयों का आकार लेने लगा। मैंने कसकर नोट मुट्ठी में बंद कर लिये। लगभग पांच मिनिट बाद मुझे ध्यान आया कि ये पुकार रहे है। जाकर देखा ये बाथरूम में भीगे खड़े तौलिये के लिये पुकार रहे है। सिर के बालों से पानी की बूंदे टपटप चूं रही थी। किसी बालक की तरह वे आंखे झपझपा रहे थे। उनकी दुर्बल देह सिकुड़ी हुई ठिठुर रही थी। आलोक का ये हाल देख मुझे जाने क्या हुआ कि मैं जाकर तरू लता सी उनके वक्ष से लिपट गई और किसी पुष्पित बेलसी उनसे लिपटी हुई उनके हाथों में अपनी पहली कमाई धर दी।
‘‘यह क्या देवू?’’ वह चौंके।
‘‘ट्यूशन वाला बच्चा दे गया।’’ उनके वक्ष पर अपना सिर टिकाकर मैंने कहां।
‘‘अच्छा तो तुम्हारी पहली कमाई है।’’ कहकर इन्होंने मेरे गालों को थपथपा दिया। ‘‘इसके लिये बहुत मेहनत की है तुमने। लो संभालों इन्हें, रूपये भीग जायेंगे।’’ इनकी सराहना, आदर, प्रेम क्या कुछ नहीं था उनके शब्दों और हावभाव में। मैं तो खिल उठी अपनी इस जीत पर। दृढ़ हो शाम को उषाजी से मिली, ‘‘मैं फोटो खींचना सीखना चाहती हूं।’’
‘‘ये तो तुम्हें आलोक से भला अच्छी तरह और कौन सिखा सकता है।’’ उन्होंने सहजता से कहा। ‘‘आलोक का तो बड़ा नाम रहा है इस क्षेत्र में।’’
‘हां, वो तो है।’ मैंने मन ही मन कहा और गर्दन झुका ली। मैं उठने को हुई तो उषाजी ने अपनी बेटी को पुकारा- ‘‘कुसुम जरा आना तो बेटी। भाभी को जरा कैमरे और तस्वीर के बारे में बता दे।’’उषाजी की बीस वर्षीय मेरी हम उम्र बेटी कुसुम आ खड़ी हुई। उसका परिचय कराते हुये उषाजी बोली- ‘‘ अभी यह जर्नलिज्म की पढ़ाई कर रही है। थोड़ी बहुत फोटोग्राफी के बारे में जानती हैं।’’ फिर कुसुम की ओर मुखातिब हो आदेश दिया- ‘‘जा, भाभी को छत पर ले जा और वहीं उन्हें फोटोग्राफी सिखाना।’’
उनकी बेटी कुसुम ने मुझे कैमरे की प्राथमिक जानकारी देते हुए इस कला की कई बारीक बाते भी समझायी। मैंने उसके कहे अनुसार इधर उधर के फोटो खींचे। पहली रील धुली। परिणाम सामने था। कुछ आधे अधूरे तो कुछ हल्की, धुंधली या फिर गहरी तस्वीरें आयी। उनसे सबक ले मैं आगे का सबक सीखने में जुट गई। काम सीखने की ललक रंग लायी। मैंने आलोक को इस बारे में अभी तक कुछ नहीं बताया था। मैं आलोक का स्टूडियो दुबारा खोलना चाहती थी और इसके लिये पहली स्वीकृति मुझे बाबूजी की चाहिये थी। मैंने बाबूजी से बात की- ‘‘मैं आलोक के स्टूडियो को खोलना चाहती हूं। उनका काम फिर से शुरू करना चाहती हूं। घर की हालत तो आप जानते ही हैं। स्टूडियो का फिर से खुलना बहुत जरूरी है।’’ मैंने जोर देकर अपनी बात कही।
‘‘पर बेटी आलोक तो अब कुछ कर नहीं सकता। स्टूडियो पर काम कौन करेगा?’’
‘‘मैं करूंगी।’’
‘‘तुम?’’
‘‘हां मैंने कुछ-कुछ फोटोग्राफी सीख ली है और कुछ काम करते करते सीख जाऊंगी।’’ क्षणभर तक वह मेरे आत्मविश्वास को तोलते रहे। फिर बोले - बहू यह छोटी जगह है। तुम काम करोगी तो लोग क्या कहेंगे?’’
मैंने उन्हें विश्वास दिलाया- ‘‘बाबूजी आप मुझे एक बार मौका दें। मैं शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी।’’
बाबूजी से इजाजत लेकर मैंने पति का स्टूडियो खोल तो लिया पर दिनभर फालतू बैठी रहती। एक भी ग्राहक नहीं आता। लोगों को मुझपर विश्वास जो नहीं था। मेरा विश्वास डगमगाने लगा लेकिन मैं हारना नहीं चाहती थी। मुझे विश्वास था एक दिन जरूर स्थिति में परिवर्तन होगा। महिला होने के नाते लोग मुझे इस पेशे में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। पर मुझे दिखाना है कि मैं भी अच्छे फोटो खींच सकती हूं। आखिर एक दिन एक दसवीं का छात्र मेरे स्टूडियो में आया। उसे परीक्षा फार्म में फोटो लगाना था। दूसरी जगह भीड़ लगी हुई थी। उसे काम जल्दी चाहिये था। मेरा पहला ग्राहक था अत: मैंने उसकी एक नहीं दो तस्वीरे खींचकर दे दी। वह खुश हो गया। प्रफ्फुलित हुआ वह अपने अन्य साथियों को भी ले आया। मैंने सबको दो दो फोटो खींचकर दे दी। इस तरह मैंने बिना कमाये पहली बार अपने पैसे लगाकर काम शुरू किया।
धीरे-धीरे आसपास गांव के लोग मेरे स्टूडियो आने लगे। कुछ तो स्टूडियो खुला देख आलोक के पुराने ग्राहक भी चले आते पर स्टूडियो में मुझे बैठा देख सकुचा जाते। ऐसे में मेरा व्यवहार बहुत संतुलित होता। मैं उन्हें एक बार मौका देने का आग्रह कर पैसा देने या बाद में देने की बात कहती। लोग फोटो खिंचवाने लगे। महिलाओं का तो मैं कुछ प्रसाधन भी कर देती। प्रसाधन से निखरे उनके फोटो सुन्दर तो आते ही फिर मेरे से उनकी झिझक भी कम होती। कुल मिलाकर काम ठीक ठाक चलने लगा था। घर की स्थिति में कमाई से सुधार आने लगा और लोग भी पुन: इस स्टूडियो को जानने लगेगें। अपने इस दोहरे लाभ से मेरा विश्वास बढ़ने लगा तो अब काम बढ़ाने की ललक भी मन में जागने लगी। मैं स्टूडियो में नये सेट लगवाना चाहती थी। अच्छी ग्राहकी के लिये आकर्षण के लटके झटके तो चाहिये ही और नवीन सज्जा इस पेशे की मांग भी थी। इस चीज को मैं भलीभांति समझ रही थी। मैंने पहले बाबूजी से बात की तो उन्होंने भी खुशी खुशी अपनी इजाजत देते हुए मुझे कहा- ‘बहू तुम जैसा उचित समझो करो। मैं तो अब बूढ़ा हो चला। मेरा भविष्य भी तुम्हारे ही कंधे पर टिका है। उनका अपने प्रति इस विश्वास और आस्था को देख मैं गदगद हो उठी। अब मैंने आलोक से कहा-
‘‘नये सेट लगवाने में मुझे आपकी मदद चाहिये।’’
‘‘देवू मैं क्या मदद कर सकता हूं। मैं तो एक कमजोर और अपाहिज ठहरा जो खुद तुम्हारे पर आश्रित हूं।’’ कहते कहते उनकी आंखे भर आयी और अपनी कमजोरी छिपाने के लिये एक ओर मुंह फेर लिया। यह देख मैंने उन्हें संभाला-
‘‘ऐसा नहीं है। मैंने आपकी कला देखी है। पुराने ग्राहक आपकी बहुत प्रशंसा करते है। आपके रंगों का संयोजन बहुत मोहक है। आपके सेट जीवंत लगते हैं।’’
‘‘अब मैं ठीक से देख भी नहीं सकता। मेरे हाथ, देखो मेरी टांगे कांपती है......अब मैं कुछ काम का नहीं रहा.......तुम जानती हो फिर भी....?’’ आलोक की आंखे बरबस छलछला उठी।
‘‘ऐसा मत कहो। आप मेरी आंखों से देखेगें। आप केवल बतायेंगे और प्रयोग मैं करूंगी। आपको तो केवल मुझे राह दिखानी है। हम साथ-साथ नये प्रयोग करेंगे।’’ उनके दोनों हाथ थामकर मैंने कहा। ये क्षण बहुत भावुक और मेरी परीक्षा के थे। मैंने उन्हें अपने भविष्य और बेटी का वास्ता दिया। उनका हौंसला वापस लौटे अब तो हर पल मेरी यही कोशिश थी। वे ना नुकुर करते रहे। किंतु मैंने ठान ही लिया और एक दिन उन्हें तैयार कर स्टूडियो ले आयी। लम्बे समय बाद अपनी पेढ़ी पर चढ़ते हुए आलोक भावविभोर हुए जा रहे थे।‘‘ अपनी नम आंखों को झपझपाते हुए कहने लगे-
‘‘देवू मैंने कभी नहीं सोचा था कि दुबारा.....मैं तो इसे बीमारी की दुनिया में भूला ही चुका था।’’ अन्दर आकर लहराते सेट को छूकर आलोक ने गद~गद कंठ से कहा। इसके बाद तो समय के मानो पंख लग गये थे। कैसे वक्त तेजी से गुजर रहा था। दिन महीने में बदलते जा रहे थे। आलोक का दवा नियमित लेना, व्यायाम करना और तम्बाकु सिगरेट का छोड़ना उनकी सेहत में सुधार लाने लगा। आंखों की ज्योति भी बढ़ रही थी। सबकुछ अच्छा होने लगा था अब। उनका हंसना बोलना मेरे जीवन में अमृत के समान था। वे फिर काम करने लगे तो मैं निश्चिंत हुई। उस दिन मैं कुछ देर से ही स्टूडियो पहुंची थी। दीपावली का त्यौहार जो आने वाला था। स्टूडियो पहुंच देखा तो आलोक स्टूडियो के नाम का पुराना बोर्ड हटवा रहे थे और नया बोर्ड लगवा रहे थे।
‘‘यह क्या?’’ मैंने पूछा।
उन्होंने हंस कर कहा- ‘‘अपने स्टूडियो को नया नाम दिया है मैंने - ‘‘दिव्यलोक’’ अपनी दिव्या का नया आलोक।

Monday, September 7, 2009

Friday, September 5, 2008

किलर

ट्रेन धीरे धीरे रफ्तार पकड़ने लगी. प्लेटफार्म पीछे छूटने लगा. मैं जो अब तक अपनी सीट पर मुड़ी हुई खिड़की से बाहर झांक रही थी तो घूमकर सीधी हुई. जैसे ही मैं सीधी हुई तो मेरी नजरे सामने बैठे व्यक्ति पर गिरी और मेरी उपर की सांस उपर और नीचे की सांस नीचे रह गई. मानो चलना ही भूल गई हो.
मेरे सामने की बर्थ पर जो व्यक्ति बैठा था उसे देखकर मेरी घिग्घी बंध गई. बिल्कुल हू-ब-हू जासूसी सीरियलों वाला किल्लर. मेरी हालत बिल्कुल ऐसी थी जैसे चूहिया का सामना किसी बागड़ बिल्ले से हो जाय. एकदम हट्टा कट्टा लम्बा तगड़ा किल्लर जैसा आदमी ठीक मेरे सामने बिराजमान था. उसने सिर पर अंगजों के जमाने की काली हेट ओढ़ रखी थी और आंखों पर काला चश्मा लगा रखा था. चेहरे पर घनेरी दाढ़ी और लहराते हुए गर्दन के पीछे तक झूलते लम्बे बाल, गले में लटकी बड़े-बड़े मनकों की माला और क्रॉस लिपटी आठों अंगुलियों में भांति भांति की अंगूठिया चमक रही थी तिस पर धारण किये हुए उसके काले वस्त्र खौफ पैदा करने के लिये काफी था. जिन्हें देखकर मेरे शरीर में सरसरी सी हो आयी. अब मेरी नजरों ने उपरी बर्थ को टटोला. उपर की दोनों बर्थ खाली थी. यानि वो किल्लर और मैं दोनों आमने सामने अकेले थे. वह कहां देख रहा है यह भी नहीं कहा जा सकता था क्योंकि उसने आंखों को काले चश्में से जो ढ़क रखा था.
बड़ी विचित्र और भयानक स्थिति थी. ऐसे तो मैंने उदयपुर से जयपुर और जयपुर से उदयपुर तक की रात्री जर्नी ट्रेन में अकेले कई बार की थी पर यह पहला ऐसा अवसर था. अपने सामने ऐसे व्यक्ति को बैठे देख चाहे कितनी भी साहसी या प्रौढ़ा महिला हो, झुरझुरी हो आना स्वाभाविक थी.
मुझे कुछ नार्मल होने में यहीं कोई पांच-आठ मिनिट लगे. अब यात्रा तो करनी ही थी मैंने पैरों को समेटा. पांव में चप्पल चुभती सी लगी तो चप्पल उतार दी. और कोई चारा भी नहीं था.
शायद अगले स्टेशन पर कुछ और लोग चढ़ जाय कूपे में और यह उपर की दोनों बर्थ भर जाय. मैं मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी. सच! उस समय के हरि स्मरण ने मेरा मनोबल बढ़ा दिया. क्या कर लेगा अगर उसे सोना जेवरात चाहिये तो क्या है मेरे पास? मन की नजर घूमने लगी तन पर - गले में पहना मंगलसूत्र दो ढ़ाई तोले का, हाथ के पहने सोने के कड़े तीन तोले के, अंगूठी और कान के टॉप्स बस यही तो है शरीर पर धारण किये हुए कुल मिलाकर छ: सात तोला सोना. और पर्स में हजार दो हजार से अधिक नहीं था. ए.टी.एम. जो रखती हूं मैं. ले ले भई! यह सब और जान बख्श दे. मानो इसे रूपया पैसा या जेवरात नहीं चाहिये तो?
यह कोई किल्लर हुआ तो? मुझे क्यूं मारेगा कोई? मेरी किसी से क्या दुश्मनी. फिर मुझे मारकर उसे क्या मिलेगा? जो भी हो अब हिम्मत और चतुराई से काम लेना पड़ेगा. कहते हैं न कि अकल बड़ी कि भैंस. मन की इस जुगाली के चलते मैंने इत्मीनान से पहलू बदला. खुद के इस इत्मीनान पर खुद मुझे भी आश्चर्य हुआ. सामने मौत बैठी और मैं इत्ती बैखौफ?
गाड़ी से भी तेज रफ्तार पर धड़धड़ा रही थी सोच की गाड़ी. ‘आखिर बुरा से बुरा क्या हो सकता है मेरे साथ?’ केवल इतना सोचते ही मन की सनसनाहट कानों तक को कंपकंपाने लगी. स्त्री का शरीर जिसे प्रकृति ने कमजोर बनाया है. यह भी तो सब अनर्थो की जड़ है. पर तुम तो अब उस आयु को पार कर चुकी हो. पूरी प्रौढ़ा दिखती हो. अब डर कैसा? जब तुम तो भरी जवानी में भी ऐसे अकेली सफर करने की आदी थी. याद आया प्रीतमपुरा का वह हॉस्टल. दसवीं के बाद से बाहर निकल गई थी. पहले पढ़ाई के लिये फिर नौकरी के लिये. कितनी बोल्ड? डर किस चिड़िया का नाम है यह तो तुम जानती ही नहीं थी फिर इस पड़ाव पर आकर डर रही हो स्त्री होने के कारण. इतिहास गवाह है स्त्रियां कितनी सबल हुआ करती थी. जरा सोचो तो. मुझे लगने लगा कि मैं अपनी सांस सुन पा रही हूं. गाड़ी की इस गड़गड़ाहट के इस शोर के बावजूद.
गाड़ी धीमी होने लगी थी मेरी नजरे जो अब तक खिड़की से बाहर देख रही थी सामने की बर्थ की ओर घूम गई. बर्थ खाली थी. ‘यानि वो गया’. नजरे उसे कूपे में इधर उधर तलाशने लगी. वह कहीं नजर नहीं आया. एक लम्बी सांस अपने आप खींचकर भीतर भर गई. मैंने राहत महसूस की. गाड़ी रूकी नहीं थी धीरे चल रही थी. यहां कोई स्टेशन भी नजर नहीं आ रहा. मैंने खिड़की से बाहर इधर उधर नजरे दौड़ाई. शायद गाड़ी को सिगनल नहीं मिल रहा दिखता है इसलिये धीमी हो गई. छक-पक-छक-पक-छक-पक. गाड़ी हिचकौले खा रही थी. मैंने अपने चप्पलविहिन पांव में फिर चप्पल डाल ली. सामान संभालने लगी जबकि सामान पहले से ही यथावत अच्छी तरह जमा हुआ था. सूटकेस अपनी जगह था. बेग भी था और पर्स भी. मन हुआ कुछ पढ़ा जाय और बैग की जीप खोल मैंने एक पत्रिका निकाल ली. कल ही आयी थी नई नई. मैं पत्ते उलटने पुलटने लगी. गाड़ी ने फिर रफ्तार पकड़ ली. वह अपने काले बूटों से ठक ठक करता आया और फिर मेरे सामने की बर्थ पर पसर कर बैठ गया.
‘ओह! तो यह यहीं है, गया नहीं.’ कुछ देर पहले जो बेफिक्री और निश्चिंतता मेरे उपर छायी थी वहां फिर हवाईयां उड़ने लगी. मैं सहज होने के प्रयास के साथ पत्रिका के पन्नों में आंखें गड़ाने लगी. काले-काले गोल-गोल सारे गड़बड़झाला होते अक्षरों को पकड़ने के लिये मैं लाईन-इर-लाईन पढ़ती जा रही थी पर कुछ समझ नहीं आ रहा था. इतने में सामने की बर्थ पर हरकत हुई. मैं चौकन्नी हो कनखियों से देखने लगी - वह उठा था और अपना छोटासा बैग खिड़की के किनारे रखा. शायद उसमें से उसने कुछ निकालकर मुंह में डाला था. सुपारी, जर्दा या पान मसाला क्या पता क्या था. मैं तो बस वैसे ही जड़ बनी बैठी रही.
धुंधलाका पसरने लगा था. साथ ही ठण्डी हवा के झोंके भी. मन हुआ खिड़की का शीशा उतार लूं. नवंबर माह की इस शुरूआती ठंड ने अगर जकड़ लिया तो पूरी सर्दी नाक सूं सूं सूड़कती जायेगी. पर मैंने ठंडी हवा को आने दिया. उस सामने बैठे व्यäि से अधिक खूंखार नहीं थी ये ठंडी हवा. वो चुपचाप वैसा ही निर्विकार भाव धरे बैठा हुआ था. मन ने कहा इससे बात करनी चाहिये.
पर क्यों? तुम्हें क्या काम है इससे? क्या कुछ समय चुप नहीं बैठा जा सकता? अपरिचितांे से क्यों बोलना पड़ रहा है? मन ने ही घुड़का था मुझे.
पर बोलने से अजनबीपन टूटता है. अगले की थाह ली जा सकती है. क्या बुराई है बोलने में. अच्छे-अच्छे दादा टाईप लड़कों से कई बार निपट चुकी हूं मैं. मन ने फिर हौंसला दिया. मैं बात शुरू करने का बहाना ढूंढ़ने लगी क्योंकि मैंने उससे बात करने का मन बना लिया था. अब मुझे उससे डर कम लग रहा था बल्कि उसमें मेरी उसमें रूची बढ़ने लगी थी. कि वह कौन है? कहां जाना चाहता है? क्या करता है? इत्यादि इत्यादि. क्योंकि हरेक आदमी का एक अतीत होता है और अपना एक रचना संसार. और उसमें बसती कई किस्सागोई जिनमें मेरी रूची बसती है. अंधेरा छाने लगा था और मुझे बहाना मिल गया था उससे बतियाने का -
‘‘लाईट जला दूं.’’ आगे चलकर मैंने पूछा था. और उसने कुछ भी प्रत्युäर नहीं दिया. क्षणांश बाद मैंने लाईट जला दी और दोनों हथेलियों को जोड़ आदतानुसार बोली ‘‘जय श्री कृष्ण’’ वह भी कुछ बुदबुदाया था. फिर चुप्पी छा गई .
‘‘कहां जायेंगे आप?’’ मैं पूछने ही वाली थी कि टी.टी. आ गया. चलो अभी पता चल जायेगा कि ये कहां तक चलेगा. पर यह क्या? वह तो उठकर खड़ा हो गया और चलता बना. टी.टी. ने मेरा टिकिट चैक किया. सामने उसे न पा मैंने टी.टी. से आखिर पूछ ही लिया ‘‘क्या उपर की बर्थ खाली हैं?’’
‘‘यस मैडम. अभी तो खाली ही हैं.’’
मेरा मुंह ‘फक्क’ हो गया.
मैं नीचे झुक पैरों से अपनी चप्पले टटोलने लगी. वह यथावत थी. वह फिर सामने आकर बैठ गया. उसकी अंगुलियों में पहनी अंगूठियां बल्ब की रोशनी में चमकने लगी.
‘‘ये जो आपने बिल्ली की आंख जैसी लहसुनिया पहन रखा है उसे इस सर्प की अंगूठी के साथ नहीं पहनना चाहिये.’’ मैंने यूं ही झूठमूठ ज्योतिष बघारी.
मेरे कहने पर वह थोड़ा सकपकाया और हिला डुला. उसने अंगुलियों में पहनी अंगुठियों को नजर भर देखा पर बोला कुछ नहीं. मेरा यह प्रयास भी विफल गया.
‘‘आप ज्योतिष में बहुत विश्वास करते हैं?’’ मैं भी हार मानने वाली नहीं थी. उपेक्षित भाव से उसने अपने कंधे कुछ उचका दिये थे बस. फिर वही चुप्पी.
‘‘ठंड कुछ बढ़ गई है.’’ मैंने विषय बदला.
इस पर वह उठा और उसने खिड़की के शीशे नीचे गिरा दिये. कुछ तसल्ली हुई. ‘पाषाण कुछ पिघला तो सही.’
मेरे हाथ बैग टटोल रहे थे. खाने के डिब्बे निकाल मैंने बर्थ पर फैला दिये.
‘‘खाना खाओ भैया’’ स्वर की सहजता व मिठास पर मैं खुद आश्चर्य चकित थी.
‘‘नहीं, आप खाईये.’’ पहली बार उसने मुख खोला था.
‘‘लीजिये न’’ मैंने मनुहार की. ‘‘दरअसल मेरे पास दो टिफिन आ गये है खाने के. बच्ची भी ले आयी और भाई भी ले आया. भाभी ने भेज दिया था. इसमें शायद आलू के परांठे हैं. आप लीजिये ना. गोभी के आचार के साथ तो यह बहुत स्वादिष्ट लगते है.’’
अपने इस बेतल्लुफ व्यवहार पर मैं खुद आश्चर्यचकित थी. एक पेपर प्लेट में परांठा आचार नमकीन और एक बर्फी का टुकड़ा रख मैंने प्लेट उसके आगे बढ़ा दी. कुछ उलझन के बाद उसने ले लिया. हम खाने लगे और बातों का सिलसिला चल पड़ा. कहां के हो भैया? क्या करते हो भैया? घर में कौन कौन हें? कितने भाई बहन हो? कितने बेमानी और कितने प्राईवेट प्रश्न मैं यूं ही पूछे जा रही थी जैसे उससे मुझे कोई रिश्ता नाता जोड़ना हो और वो हर बात का अब बड़े आराम से जवाब दे रहा था.
खाना खत्म होने के साथ ही गाड़ी रूक गई. वह गाड़ी से उतरा. प्लेटफार्म से पानी भर लाया. ‘‘दीदी पानी पीओगी?’’
‘‘नहीं, बोतल है मेरे पास.’’
‘‘चाय कॉफी कुछ लाऊं?’’ वह पूछ रहा था.
‘ना बाबा रे! ना. मैंने उसी क्षण मना कर दिया. बहुत किस्से हो चुके है नशीली चाय कॉफी से मुसाफिरों के लूटने के.’ प्रत्यक्ष में मैं सहजता से बोली -
‘‘नहीं भैया चाय कॉफी मैं नहीं पीती. डायबिटीज है.’’ मैंने जानबूझकर झूठ बोला. शायद वह मेरे खाने का ऋण उतारना चाह रहा हो. मैं क्यों नाहक उस पर शक कर रही हूं. दूसरे ही क्षण मन ने मुझे लताड़ा - ‘हर गमले में फूल नहीं लगे होते विम्मो रानी, कुछ गमलों में केक्टस भी उगते हैं.’ खाने के बाद हल्की सी ठंड चढ़ आयी थी पर चाय की इच्छा को मन ही मन दबाना पड़ा.
गाड़ी चल चुकी थी. और वह सामने बर्थ पर बैठ गया था पूर्ववत. ‘किल्लर’ मन ने उसे संबोधित किया. पर मैं अब काफी नार्मल हो चुकी थी. पर मेरी सर्तकता में कहीं कोई कमी नहीं आई थी.
‘‘आजकल कहां काम कर रहे हो भैया?’’ मैंने उसे यूं ही बतियाया.
- स्टेट रोडवेज में ड्राईवर हूं.
- कबसे?
- इससे पहले क्या करते थे भैया?
- ट्रके चलाता था ट्रांसपोर्ट की.
- अच्छा ट्रके चलाते थे. बताओ तो जरा तुम्हारी उन ट्रकों के पीछे कुछ लिखा होता था कि नहीं. जैसाकि सबके पीछे कुछ न कुछ लिखा होता है. मैं बेतकल्लुफ होकर उससे ऐसे बात करने लगी जैसे वो मेरा सगा भाई हो. ‘‘हां, उसके पीछे लिखा हुआ था.’’ वह सुनाने लगा -
ये इश्क नहीं आसां,
बस इतना समझ लीजे।
इक आग का दरिया है
और डूब के जाना है।
मैं हो हो कर हंस पड़ी. वो भी हंसने लगा. उसने फिर सुनाया -
ऐसा कोई जहान मिले
चेहरों पर मूस्कान मिले
काश मिले मंदिर में अल्लाह
मस्जिद में भगवान मिले
- मेरे दोस्त की ट्रक पर लिखा हुआ था.
- कितना सच है इसमें मुझे बहुत अच्छा लगता है ट्रकों के पीछे लिखा पढ़ने में. मेरी बहुत दिलचस्पी है इसमें और वह सुनाने लगा और भी कई फिकरे जो लिखे हुए थे उन ट्रको के पीछे जो उसके अपनों की थी. जिनमें जिन्दगी के कई फलसफे बिखरे हुए थे.
बात करते करते कब नींद लग गई. सुबह जब नींद खुली तो जैसे ही ख्याल आया कि में ट्रेन में सफर कर रही हूं तो घबरा कर हाथ गले में पड़े मंगलसूत्र पर गया. अयं! मंगलसूत्र हाथ में नहीं आया. मैं फटाक से उठ बैठी और गला टटोलने लगी. साड़ी की तहों में लिपटा मंगलसूत्र गले में यथावत था. तभी मुझे उसका ख्याल आया तो मैंने इधर उधर आसपास देखा. वह किल्लर कहीं नहीं था. यानि किल्लर जा चुका है?
‘पर किल्लर कैसे कह रही हो तुम उसे बारबार?’ मन ने टोहका. ‘बहुत गलत बात है किसी का पहनावा या हुलिया उसका परिचय नहीं होता है.’
‘हूं डराया तो बहुत था उसने.’ दोनों हाथ जोड़कर मैंने ईश्वर को नमन किया और उठ बैठी. पांव में चप्पल डाली और टाफयलेट की तरफ चल दी.
निपटकर जब वापस आकर मैंने बर्थ पर फैले चादर तकिये समेटने शुरू किये तो तकिये के नीचे से फिसलता हुआ एक कागज का टुकड़ा नीचे पांव के पास आ गिरा.
‘यह क्या हैं?’ मैंने उसे उठाया और बंद तह को खोलकर देखा. सुन्दर सी हेंडराईटिंग में कुछ लिखा हुआ था -
मुझे भाई कहकर तुमने अपने आपको बचा लिया. मैं वो नहीं हूं जो तुम समझ रही थी. तुम्हारा मंगलसूत्र चूड़िया छीनने के लिये मैं तुम्हारे साथ गाड़ी में चढ़ा था. जालोरी गेट से ही तुम्हारे साथ हो लिया था. आइन्दा इतना जेवर पहनकर यात्रा मत करा करो. मेरे भी एक बहन थी जिसे दहेज के लोभियों ने जला दिया. मैंने उनको मारकर बहन के खून का बदला ले लिया. पर अब गुजारा तो करना ही पड़ता है. कल तुममें मैंने मीनू को पा लिया था.
बर्फ से भी ठंडे हुए मेरे हाथ पांव सन्न सन्न करने लगे. शिराओं में तो खून मानो जम ही गया था.