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Tuesday, December 20, 2011

आज का दिन



आज का दिन

आज का दिन खूनी था शायद, तभी तो- अभी वह घर से निकलकर पचास कदम आगे बढ़ भी नहीं पाया था कि........
बस! एक मोड़ ही मुड़ा था। सीधी और चाौड़ी सड़क थी। सुबह के सात बजे वह निकला था, तब हल्का धुंधलाका था पर अब सात बजकर पांच मिनिट होने को हैं, चारों ओर पूरा उजियाला पसर चुका है। स्ट्रीट लाईट बंद हो चुकी है। वीरान सी सड़कों पर कुछ इक्के दुक्के लोगों के होने का एहसास भर हुआ था उसे।
वे लोग- उनके चेहरे कपड़े से लिपटे हुए थे। उसे लगा वे सफाई कर्मचारी है, आज शायद सड़क पर कोई विशेष सफाई अभियान हो। पर वह गलत था। वह सफाई करने वाले नहीं थे, बल्कि हमलावर थे। यकायक उन्होंने आकर उसे घेर लिया और प्रहार के लिए जैसे उनके डण्डे उठे, वह भागा। उसने न इधर देखा न उधर बस पांव जिधर उठ गये वो सरपट दौड़ पड़ा। उसने बेतहाशा दौड़ बढ़ाई। वे पीछे थे, कुल गिनती में चार लोग।
वह दौड़ रहा था और दौड़ते-दौड़ते ही उसने निर्णय किया- कहीं पनाह लेनी होगी। एक घर सामने था- मिश्राजी का।
वह उन्हें अच्छी तरह जानता था। घर की फाटक खोल भीतर घुसने में वह सफल हो गया। दरवाजे तक पहुंच पाता इससे पूर्व ही उन हमलावारों में से एक के लठ्ठ का प्रहार उसके पांव पर गिरा। पिंडली पर लगी भंयकर चोट के कारण वह थोड़ा लड़खड़ाया इतने में दूसरा प्रहार उसके कंधे को तोड़ गया। वह संभल नहीं पाया। वहीं अपने सिर को दोनों हाथों से बचाते हुए उकड़ू बैठ कर सहायता के लिए पुकारने लगा। अब तो वे चारों उस पर पिल पड़े। वे उसे इस तरह पीट रहे थे मानो रूई धुन रहे हो। तड़ातड तड़ातड़, प्रहार पर प्रहार। उसकी भयानक चीखे और डण्डे बरसने की आवाजे दोनों घुलमिलकर खौफनाक रिदम बन गई थी।
जानलेवा हमला हो रहा था उस पर। डण्डों के अगले मुहाने पर लगभग 6 इंच तक कीले ठुकी हुई थी। जो पिटाई के साथ साथ उसकी चमड़ी भी उधेड़े जा रही थी। धड़ाधड़
धड़ाधड़........
आज का दिन ममता भरा दिन था शायद, तभी तो- सड़क बुहारते हुए उसकी नजर इस हमले पर गिरी। वह झाडू हाथ में लिए हुए अपनी सरकारी ड्यूटी पर थी। सड़क से कचरा हटा रही थी। इसी दौरान उसे दौड़ते हुए बूटों का स्वर सुनाई पड़ा। सामने देखा- एक युवक के पीछे कुछ लठैतों को दौड़ते हुए। वह कुछ समझ पाती तब तक वह लड़का एक घर के भीतर घुस गया, पर वह वहीं बाहर संकरी बाऊंडरी में फंसकर धिर चुका था। वे उसे निर्दयता से पीट रहे थे। वह उस जगह के लिए दौड़ी जहां ये हादसा हो रहा था। उसने उन्हें रोकते हुए ललकारा- ‘‘खबरदार जो किसी ने अब इस पर हाथ भी उठाया तो.......क्या मार डालोगे उसे?कमीनों ऽ ऽ ...... एक निहत्थे पर चार चार पिल रहे हो। शर्म नहीं आती तुम्हें.......दफा हो जाओ यहां से नहीं तो एक एक को टांग तोड़कर .....’’दहाड़ते हुए उसके हाथ में झाडू मजबूती से कुछ इस तरह ऊपर उठ आया मानो एक सशक्त हथियार हो। उसने हमलावरों में से एक का हाथ पकड़ कर धक्का दिया और घेरे को तोड़ती हुई भीतर घुस कर उसने अपना आंचल पीटने वाले पर फैलाकर ढ़कने की कोशिश में वह उससे लिपट गई। इसी बीच एक वार से खनखनाकर कांच की सारी चूडि़या झड़ गई।
अचानक हुए इस व्यवधान से हमलावर कुछ ठिठके। वह गुस्से में भरी हुई फिर बरसी- ‘‘कुछ तो शर्म करो। ओ मोहल्ले वालो क्या तुमकोे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है ? आंख कान वाले
अंधों-बहरो.....जरा सुनो तो....क्या सबके सब नपुसंक होकर दुबके बैठे हो? खोलो, अपने दरवाजे खोलो......’’
समय की नजाकत को समझ हमलावर भाग खड़े हुए। अब वह उस भयभीत युवक को सहला रही थी। अपने आंचल से उसके बहते खून को पौंछते हुए उसने पुचकारा- ‘‘क्यों ये दुष्ट तेरी जान के पीछे पड़े थे...........कहां कहां चोट लगी तुझे......मुझे बता तो......’’
अब तक दबे बैठे, या तमाशा देखने वाले सभी लोग बाहर निकल आये थे। सभी के मुख से उसके गुणगान हो रहे थे। कोई कह रहा था.......जन्म देने वाली से भी बढ़कर, नवजीवन देने वाली मां’’, किसी ने कहा- ‘‘उसके जीवन की रक्षा कर सचमुच वह यशोदा मैया बन गई है।’’ यहां वे इस बात को सब नजरअंदाज कर चुके थे कि यहीं वो महिला है जिसने अभी-अभी मोहल्ले वालो को गाली गलौच दी थी। उन्हें बेशर्म और खुदगर्ज कहकर उनकी गैरत को ललकारा था।
आज का दिन शायद मानवीय सभ्यता के कलंक अछूत दर्शन का भी था। तभी तो- मुर्दा बस्ती के उन लोगों ने यह भी कहा था- हरिजन स्त्री है, इसे क्या मुंह लगाना यह तो हर रोज ही सड़क बुहारने आती है।
‘जल ही जीवन है’ जिसे वह घायल युवक मांग रहा था। वह युवक जो कि उनकी पिछली सड़क पर रहने वाले डगवाल सा. का बेटा था जिसे वे भलीभांति पहचानते थे। कोई भी उसे पानी नहीं दे रहा था क्योंकि वह उस हरिजन स्त्री की गोदी में गिरा पानी मांग रहा था। एक मेहतर ने इसे छू लिया है। अब कौन अपना धर्म भ्रष्ट करें?
मैया अपने आंचल से उस पर हवा कर रही थी। पर पानी...? पानी...वो कहां से लाती? तमाशाबीन लोग खामेश से इस बेबसी का अनोखा खेल देख रहे थे। उसने हाथ जोड़कर मोहल्ले वालो से प्रार्थना की। तब जाकर किसी एक का मन पसीजा और विकल्प के रूप एक आईडिया उसको क्लिक हुआ होगा तभी तो वह एक डिस्पोसेबल ग्लास में पानी भर कर दूर रख गया। उस मैया ने उसे सहारा देकर उठाना चाहा तो वह उठ नहीं पाया। उसका कंधा झूल गया। मैया ने चम्मच के लिये फिर याचक दृष्टि दौड़ाई। कोई समझकर प्लास्टिक का चम्मच लाता इससे पूर्व ही उस युवक की पत्नी दौड़ती हुई चली आई। उसके पीछे पीछे उसकी सगी मां भी थी। सचमुच यह एक संवेदनाशून्य दिवस होता अगर वे लोग नहीं आयी होती तो? उनके आने से सोये लोगों की संवेदनाएं अब जाग चुकी थी।
आज का दिन एक सुनियोजित अपराध का भी था। पूरणमल ठेकेदार बरसो से वर्मा स्टील कम्पनी में टेण्डर भरता आ रहा था। अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि टेण्डर उसे न मिला हो या किसी ने कोई मीनमेख भी निकाली हो। बरसो से वेस्ट का मलबा वही उठाता आ रहा है। इस बार देखो- ये नया नया लड़का क्या आया, अकल की गर्मजोशी दिखाने लगा। जोड़ बाकि की गणित तो पिछले भी सब जानते थे पर वे सब भरी पूरी उम्र के घर गृहस्थी वाले लोग थे। उनकी भी अपनी जरूरते थी। पैसे के बिना सब सून, सेटल था ऊपर से लेकर नीचे तक।
‘‘अब इसने आकर ऊपर बैठे अफसर को कौनसा पान चबवाया कि इस बार का टेण्डर उसके हाथ ही निकल गया। मेरा तो सारा धंधा ही चैपट कर दिया इस कल के लौंडे ने.......’’पिच्च करके पीक थूकते हुए पूरणमल ने इस छोरे को सबक सीखाने की ठान ली थी। किसी को कानों कान खबर न हो और काम हो जाय। ऐसा ही तरीका था पूरणमल का।
आज का दिन भंयकर असमंजस से गुथमगुत्था होने का दिन भी था शायद। किसने हमला करवाया? कौन थे हमलावर? क्या रंजिश थी? कुछ लूटकर तो नहीं ले गये?
सब यथावत था। जेब को हाथ तक नहीं लगाया गया, घड़ी, चेन, मोबाईल सब यथावत थे तो फिर क्यों जानलेवा हमला हुआ? किसलिए और किसने किया अपराध? जितने मुंह उतनी बाते। जितनी संवेदनाएं उतने दिमाग। खोज लाये दूर की कौड़ी पर-
किराये के अपराधी कहीं पकड़ में आते हैं क्या? आज का दिन अपराध का ही नहीं भ्रष्ट प्रशासनिक दर्शन का भी था। पिटाई करने वालो के खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज हुई। किसने हमला करवाया और कौन थे हमलावर, आखिर पता लग ही गया।
जब सब खोज खबर हो गई तो क्यों नहीं पकड़े गये अपराधी? प्रश्न सिक्के के एक पहलू की तरह सामने था तो उत्तर भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह पीछे दबा, छिपा झलक रहा था। सभी ने जान लिया था- पिटने वाले युवक ने भी, उसके घर वालों ने भी, तमाम रिश्तेदारों ने भी यहां तक कि मोहल्ले वालों ने भी। पुलिस रिपोर्ट का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कोई नहीं पकड़ा जायेगा क्योंकि उन गुण्डों में से दो पुलिस वालों के बेटे थे और बाकि बचे दो राजनैतिक संरक्षण पाये हुए शराबी कबाबी। जिनका वास्ता तत्कालीन विधायक से होता हुआ कुछ और ऊपर तक.....शायद भाई भतीजे थे।
तो आज का दिन.....................अभी भी बहुत कुछ शेष है, ये किस्सा अंतहीन है। कहां तक की बात मैं कहूं?

Saturday, November 26, 2011

आदमी का अहसास


जिन्दगी की किताब पर
रोज होते है
हास परिहास
नित नये रूप में
छपते है
संवाद
चाय के पानी की तरह
खौलते है गैैस पर
फ्र्रिज में रखे
दूध का ठण्डापन
जमने न देता
डिब्बे में बंद
चीनी की मिठास
जागता है फिर गर्म अहसास
मुंह के सामने
लगी प्याली की तरह
गर्म धुंए से
लौटता है फिर
आदमी का विश्वास

Thursday, November 24, 2011

तेरे रूप कितने



तेरे रूप कितने


आज मैं फिर इस शहर के करीब पहुंच चुकी हूं। दूर से ही पहाड़ी पर शान से इठलाता हुआ प्राचीन दुर्ग मुझे शहर के पास पहुंचने का संदेश दे रहा है। सांध्यवेला की समाप्ति पर धुंधले
अंधेरे में किसी तिलिस्म की भांति खड़ा है यह दुर्ग। झिलमिल प्रकाश और स्पाॅट लाईट में महल, स्तम्भ, प्राचीन मंदिरों के शिखर, प्राचीर सबकुछ जीवन्त हो अपना जादू बिखेर रहे है। भक्ति और शक्ति के लिए विख्यात यह नगर अब मेरे लिए अनजाना नहीं रहा। पन्ना, पद्मिनी, कर्मावती और मीरा जैसी ललनाओं ने इसे इतिहास में अपनी अनूठी पहचान अर्पित की थी।
‘क्या इस मिट्टी में स्त्री महिमा के कण आज भी मौजूद है?’ यह विचार मन में आते ही मैंने अपनी आंखे मूंद ली, सिर स्वतः ही सीट के सहारे टिक गया। एक चेहरा बंद आंखों में घूम गया - तुम्हें किस नाम से पुकारूं ‘काकीसा’ हां यही ठीक रहेगा। तुम्हारा अदब कायदा देखकर तुम्हें नाम से बुलाना अच्छा नहीं लगेगा मुझे। हालांकि उम्र में तुम मुझसे चार-पांच साल मुश्किल से बड़ी होगी। तुम भी मुझे मम्मीजी कहकर बुलाती थी। कितना अजीब था रिश्तों का संबोधन। मैं तुम्हें काकीसा और तुम मुझे मम्मीजी, रिश्तों का ये संबोधन हमारी सामाजिक स्थिति को रेखाकिंत करते हुए अपनी-अपनी मर्यादाओं में बंधा हुआ था।
-पता है आज मैं तुम पर लिखने की सोच रही हूं।
-मुझ पर? काली रंगत पर सफेद दंत पंक्ति चमकाती तुम सामने होती तो हंस पड़ती, ‘‘देखो रे! कालकी की किस्मत चमकी। ’’ हर बात पर तुम यही तो कहती थी। एक बार जब तुमने कहा था- ‘‘देखो कालकी के दिन पलटे, मजे से गाड़ी में घूमती फिरती है।’’ जब तुमने खुद का उपहास उड़ाया। मुझे अच्छा नहीं लगा।
-ऐसा क्यों कहती हो?
-मैं नहीं मम्मीजी, वो कहेंगे।
-वो कौन?
- क्या बताऊं मम्मीजी सब मुझसे जलने लगे है। इस कान्हा के भाग्य से मुझे मिली ए.सी. की ठंडक उन पर कहर बरपा रही है। कान्हे के साथ मुझे कार में घूमते देख उनके सीने पर सांप लौटने लगता है। रामेश्वर की बहू सब कह देती है मुझे।
-कौन रामेश्वर?
-ओ ऽ मम्मीजी आपके आर्शीवाद से......और उसने हंसी रोकते हुए साड़ी का फोहा बनाकर मुंह में ठूंस लिया।
मतलब? मतलब यह था कि रामेश्वर उसका बेटा है। जिसकी पत्नी उसे सुनाती है- कान्हा पाकर तुम तो निहाल हो गई माई। ‘‘कान्हा’’ मेरे दोहत्र को तुम इसी नाम से पुकारती हो।
सचमुच रूद्र के कारण काकीसा के दिन पलट गये थे। दरअसल काकीसा मेरे दोहित्र की आया थी। पक्के वर्ण की साधारण शक्ल वाली दुबली और लम्बे कद वाली महिला एक ऐसा गरिमामयी व्यक्तित्व - जिसे मैं कभी नाम से नहीं पुकार पायी।
बेटी चाहती थी कि एक बार मैं उसे देख परख लूं। सवा माह के शिशु को लेकर वह चली गई थी मेरे पास से। जब रूद्र दो माह का हो चुका तो वह अपनी प्रेक्टिस की दुनिया मैं लौटना चाहती थी। अतः उसने अपने नन्हे मुन्ने के लिए काकीसा रूपी दादी का बंदोवस्त कर लिया।
दादी इसलिए की वह खुद को रूद्र की दादी के रूप में प्रस्तुत करने लगी। बेटी ने मुझसे पूछा- ‘‘कैसी लगी आपको काकीसा?’’
हाॅल में रूद्र को उसे झूला झुलाते तुम्हें देख, मैं हंसकर बोली- ‘‘डेढ़ हजार की दादी।’’ मेरे इस उत्तर पर वह भी मुस्कुरा उठी। सचमुच रूद्र को डेढ़ हजार रूपये प्रति माह में दादी मिल गई थी।
तुम उठी और अबोध शिशु को शू-शू करा लायी। अब तुम तन्मयता से उसकी नैप्पी बांध रही थी। मैंने बेटी की ओर देखा और बेटी ने मेरी ओर मैंने आंखों ही आंखों में इशारा किया और ‘हांमी’ भर दी। मेरी हांमी देख उसे तस्सली हुई।
दोपहरी का समय था। छोटी बेटी की शादी की वीडियो सी.डी. चल रही थी। तुम भी वहीं फर्श पर बैठी सी.डी. देख रही थी। पीठी का दृश्य था तुम आनंदित हुई पीठी के गीत गाने लगी। दृश्य परिवर्तन हुआ तो तुम झट से बोली- ‘‘यह तो मायरा हो रहा है’’और प्रफुल्लित हुई वह ‘वीरे’ गाने लगी। तभी झूले में सोया रूद्र कुनमुनाया। तुम उठी और झूला देती लोरी गाने लगी। मुझे अच्छा लगा और विश्वास भी हुआ कि मेरे दोहित्र की पालना तुम अच्छे से कर लोगी। यह सब करते हुए कितनी प्रसन्न मुद्रा में रहती थी तुम। जब हम तुम्हें साथ लेकर मंदसौर दर्शन करने गये थे, पूरे रास्ते तुम्हारे भजन चलते रहे जिसने सफर को यात्रामय कर दिया था। तुम हर जगह अपने को जोड़ देती थी।
मुझे लिखता देखकर तुम चाय बना लायी थी।
-अपनी भी बनाई?
-ओ मम्मीजी मेरे तो दूसरे के घर का पानी नहीं ओजता।
-क्या?
-हां, मेरे आखड़ी है।
-मतलब?
मतलब यह था कि काकीसा ने अपने स्वर्गीय पति को लेकर बाधा ले रखी थी। जब तक वह उनके नाम का रातीजगा नहीं दे देगी तब तक किसी घर का पानी तक नहीं पीयेगी। उसके अनुसार उसका पति मृत्यु बाद देवता बनकर प्रकट हुआ है और अब बहू के शरीर में आता है। उन्होंने ही रात्रि जागरण मांगा है। वह उनको वचन दे चुकी है और जब तक वचन पूरा न हो जाए वह किसी के यहां का पानी तक नहीं पीयेगी। वह यह बाधा(आखड़ी) ले चुकी है। सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। पति से इतना गहरा अनुराग, उसकी मृत्यु के बाद भी........
कुछ भी हो तुम अपने कायदे की बहुत पक्की थी। हमारे घर में खाने के लिए क्या कुछ नहीं था पर तुम....हर चीज के आग्रह पर तुम्हारा एक ही जवाब होता- ‘‘मेरे काम नहीं आता।’’ तुम कुछ भी नहीं खाती थी। तुम्हारा यह त्याग देखकर मैं सहज ही यह अनुमान लगा बैठी थी कि तुम्हें अपने पति से असीम प्रेम मिला होगा। किन्तु तुम्हारी बातों ने तो मेरे अनुमान की परखच्चियां उड़ा दी। तुम अब तक की सारी उम्र में अपने पति के साथ केवल पांच-सात साल ही रही बस!
-हो मम्मीजी क्या करती जब मैंने अपनी आंखों से उसे सौत के साथ सोते देख लिया तो फिर उसके बिस्तर पर चढ़ूं तो भाई के बिस्तर पर चढ़ूं इतना दोष लगे मुझे।
-क्या मतलब?
-सच्ची में मम्मीजी, मैं अपने तीनो बच्चों को लेकर निकल आयी। बड़ा रामेश्वर तो फिर भी तीन बरस का था पर उदयलाल तो दूध चूखता था।
-फिर अपने पीहर में रही?
-थोड़े दिन। फिर मजदूरी करते हुए अलग रहने लगी।
-मजदूरी से काम चलता था तुम्हारा?
चलता....कभी कभी कोई पेटियों रख जाता। लोग सीधा आटा दाल दे जाते...चलता रहा...बगत निकल गी। यह कहकर एक सुखभरी सांस खींची थी तुमने। अपनी शर्तो पर जिन्दगी जीने के सुख की। तुम अपने पति के पास वापस कभी नहीं गई। जबकि वह एक अच्छी सरकारी नौकरी में था। तुम समय परिस्थिति से समझौता कर चलती तो एक अच्छी जिन्दगी जीती। पर इसका तुम्हें कोई मलाल ही नहीं, बल्कि तुम मुझे पल पल पर चैंका देती। तुम्हीं ने बताया था कि उसमें कहीं थोड़ी सद्बुद्धि थी जो पेंशन में मेरा नाम लिखवा दिया था उसने। आज भी तुम्हें वह पेंशन मिल रही है। ‘‘तुम्हें उससे लगाव तो रहा होगा तभी......?’’
-लगाव कठा’रो। देवता बण’र आया पछे तो करणो पड़ै। हूं तो सात फेरा री परणी। हूं तो पतिवरता नार। म्हारो धरम कई है....आप ही बतावौ?
मुंह की बात पूरी भी नहीं होने दी थी तुमने और तमक उठी थी तुम अपने पक्ष में दलील देते हुए। तुम कितनी खुद्दार हो। जवानी में पति को पथ भ्रष्ट देखा तो अलग हो ली। जिन बच्चों को तुमने इतनी तकलीफ से पाला उनके साथ भी तुम नहीं रहती?
- क्या करूं मम्मीजी, बहू थोड़ी गरम है। मुझे लेकर दोनों में घमासान होवै तो मैं अलग ही भली।
बेटी के पास जितने दिन भी रही तुम्हारी बाते, तुम्हारे आदर्श और तुम्हारे व्याख्याएं समस्त स्त्री जाति के गौरव को रूपायित करती, महिमा को परिभाषित करती और कई जगह खुद मुझे झकझोरने वाली थी। पर पन्ना-पद्मिनी-मीरा की इस धरती पर आज भी भारतीय स्त्री के उस स्वाभिमान भरी महिमा का कहीं अस्तीत्व हैं ? यह मुझे दस माह बाद महसूस हुआ।
बेटी का फोन था- ‘‘मां, कल काकीसा. ने रातीजगा दिया था। बहू के शरीर में देवता आये थे। देवता ने आदेश दिया कि वह कहीं काम न करें... और काकीसा ने देव आज्ञा मान काम छोड़ दिया है।’’
‘‘क्यों? तुमने उन्हें जाने क्यों दिया...रोक क्यों नहीं लिया...वापस बुला लो उन्हें?’’
‘‘मां बहुत मुश्किल है। उन्हें कोई नहीं डिगा सकता। मुझे तो लगता है कि काकीसा की बहू बहुत चालाक है। देवता का नाटक कर काकीसा का काम करना छुड़वा दिया। ताकि वह अपने घर का काम करवा सकें। एक दिन मैंने खुद घर जाकर देखा था। घर में काम के मारे काकीसा का बुरा हाल था।
अपने ही अन्धविश्वासों में जकड़ी तुमने आराम की नौकरी को तिलांजली दे दी थी। तुम्हारी यह विभिषिका कोई पहली कहानी नहीं है। भारतीय स्त्री की सदियों सदियों की कहीं अनकहीं यही कहानी है।


Wednesday, May 11, 2011

गीत


हे परोपकारी भगवन
तू रीते घट भर दे
सूखे ताल तलैया भर दे

पथिको को छैया दे
हे परोपकारी ईश्वर....
सावन को हरियाली दे दे

भादो को रिमझीम दे

पर्वतों को खोये जंगल दे

उजड़ो को बसेरे दे

हे परोपकारी भगवन...

पंछी को अमराईया दे दे

गैया के थन भर दे

रातदिन हेण्डपम्प की

खट पट कम कर दे

हे परोपकारी ईश्वर...

भैया को चबेना को दे दे
तू मैया को घर दे
तिनका तिनका लौटा दे

तू सब पीड़ा हर ले
हे परापकारी भगवन....

Sunday, April 3, 2011



लुक छिप लुक छिप खेली


मेरे संग ओ मेरी साथिन


ओ मेरी सहेली


अब तुम बड़ी हो गई हो


काव्य मधुरिमा


और उषा की चहेती हो गई हो


सलौने शब्दों में गूंथी


मनको की माला सी हो गई हो


कुहके अम्बुए की डाल


मेरे लिए तुम अब पहेली हो गई हो


खिले सुमन सी


अब तुम बासन्ती पल हो गई हो


विचरे रीते मेघ


रूई के फाहे सी धवल हो गई हो


पवन हिंडोले संग


डोलती माझी की नैया हो गई हो


अब तुम बड़ी हो गई हो


विमला भंडारी

Thursday, December 9, 2010

घर, धर्मशाला हो गए

सुबह जब
निन्नी ने आंखें खोली
नौकरी के पाश में बंधी
मां चढ़ चुकी थी किसी द्रुतगामिनी में
पापा की गोद
डस चुकी है उनकी पदौन्नती
अब वह नहीं रहते यहां
शनिवार इतवार के है वे मेहमां
दादी, फूफी सभी
तो मुसाफिर हैं यहां
टेबिल पर सजे
बस्ता, टिफिन और वॉटर बोतल की तरह
रैन बसेरा लेकर
चल पड़ते है सुबह
तभी टेम्पो का भोंपू
चौकस करता है निन्नी को
बॉय-बॉय करती है निन्नी
बेजान दीवारों को
उसके बाद
दिनभर ऊंघता है घर
शाम फिर
मां आती है / रसोई जाग जाती है
निन्नी आती है / आंगन चहक उठता है
भैया आता है / टी.वी. मुस्कुराता है
हर शनिवार इतवार
मुसाफिरखाना बना घर
फिर घर हो जाता है
जो दो दिन बाद
सन्नाटे में खो जाता है
मां चली जाती है
पापा चले जाते है
दादी-फूफी-भैया
सभी चले जाते है
फिर निन्नी को भी
जाना होता है

Tuesday, October 12, 2010

थोड़ी सी जगह



थोड़ी सी जगह
ठीक पौने बारह बस का समय था और वह बज चुकी थी। बस, बसस्टॉप छोड़ चुकी थी और श्रुति बस अड्डे के बाहर ही बस रूकवा कर अंदर चढ़ गई।
नॉन स्टॉप बस में ठसाठस सवारियां भरी हुई थी। कहीं तिल धरने को जगह नहीं थी। ‘उफ! कपासन तक का लम्बा सफर क्या खड़े खड़े तय करना पड़ेगा ?’ यह ख्याल आते ही श्रुति को झुरझुरी फूट आयी। किसी तरह थोड़ा इधर उधर खिसक कर बस की दोनों सीढ़ी ही चढ़ पायी।
‘‘अरे भैया प्लीज यह सामान ऊपर बर्थ पर रख दो.......आप जरा सा पांव हटाइये ये बैग सीट के नीचे आ जायेगा......हां हां ठीक है.....कोई बात नहीं।’’ अपना सामान व्यवस्थित करवा कर श्रुति ने राहत की सांस ली। ‘समय से पहुंचने की मजबूरी नहीं होती तो क्या मैं इस भीड़ में घुसती?’ मन में उठी कोफ्त पर मजबूरी ने अपनी विवशता जमाई। उसने एक पांव पर वजन डालते हुए दूसरे पांव को थोड़ा रिलेक्स किया। रिलेक्स होने के बाद उसकी निगाहें उस भीड़ भरी बस में बैठने की जगह तलाशने लगी। शायद इस उम्मीद में कि कोई उठकर कहें- ‘आइये आप बैठ जाइये।’ हर चेहरा हर निगाह उसे बेगाना लग रहे था। बैठी सवारियां भीड़ की ओर से बेफिक्र हुई अपने में तल्लीन थी। कोई कागज में लिपटे व्यंजन का आनंद ले रहा था। तो कोई आपस में बतिया रहा था। तो कोई आंखे बंद किये ऊंघने में तल्लीन। काश! वह भी बैठे हुए लोगों की श्रेणी में होती। आंख मूंदती और बेफिक्री का सफर करती।
थककर उसने दूसरे पांव पर वजन डाल पहले को रिलेक्स किया। ‘बड़ी भाग्यशाली हो तुम। चाहे कितनी भी भीड़ हो तुम्हें जगह मिल ही जाती है।’ पति द्वारा की गई उक्त टिप्पणी उसे याद हो आयी। ‘हूं!’ उसने दीर्घ नि:श्वास छोड़ते हुए फिर जगह तलाशनी शुरू कर दी। किन्तु आज पति महोदय की ये टिप्पणी सार्थक होती नजर नहीं आ रही थी। तभी श्रुति की नजर दो की सीट पर बैठे दुर्बल देह वाले वृद्ध स्त्री पुरूष पर गिरी। ‘क्या इनसे जगह मिल सकती है?.....शायद। यदि थोड़ा सा खिसक जाय तो......बस थोड़ासा’ मन में पति की टिप्पणी फिर गूंज उठी। वह उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करने लगी। साफ लग रहा था कि वह श्रुति के किसी अनुनय विनय को नहीं मानने वाले। इनसे जगह मिलनी मुश्किल है। अब...? तभी वृद्धा से श्रुति की निगाहें मिली। मन में एक उपाय कौंधा।
‘‘आप कहां से आ रही है?’’ ऐसे अवसर पर स्वर के मिठास के क्या कहने। निराला ही होता है, सो श्रुति भी सफल हुई। ‘‘चावण्ड से’’ संक्षिप्त ही सही। वृद्धा का प्रत्युत्तर पा श्रुति का मन इस भाव से तरंगति हो उठा कि ये अपने ही गांव की है।
‘‘अच्छा, आप वहां कहां रहती है?’’ श्रुति ने आश्चर्य प्रकट किया। मधुरता बकरार रखते हुए उसने वार्तालाप का सूत्र आगे बढ़ाया- ‘‘क्या, मुझे जानती है आप?’’
उसने इन्कार में गर्दन हिलाते हुए कहा- ‘‘नहीं, मेरा वहां पीहर है और बारह बरस की थी जब ही मेरा ब्याह हो गया था।’’ ओह! निराशा से फिर श्रुति का मन बुझ गया। वृद्ध की खीज भरी कसमसाहट से प्रकट हो रहा था कि वृद्धा के साथ हुई वार्तालाप को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। श्रुति के मन ने तेवर बदला। ‘मुझे वृद्ध से बात करनी चाहिये।’
‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’
‘‘कपासन’’ उसने लापरवाही भरी घोर उपेक्षा से कहा। इसके बाद संवाद क्रम टूट गया। थोड़ी चुप्पी के बाद श्रुति ने दूसरे पांव को विश्राम देते हुए पहले पर फिर शरीर का वजन लाद दिया।
हिम्मत बटोर श्रुति ने वृद्ध से थोड़ा खिसकने का अनुरोध -‘‘अगर आपको तकलीफ न हो तो जरासा खिसक जाय। थोड़ी सी मेरे लिये भी जगह निकल आयेगी।’’ उसकी आवाज बड़ी मुलायम थी। उसका असर भी हुआ। वृद्ध थोड़ा आगे पीछे हुआ। पर जगह बहुत ही कम निकाली। हार कर श्रुति ने भी वहीं बैठने का फैसला कर लिया। बहुत मुश्किल से अपना आधा वजन मुड़े घुटनों व एड़ी पर डाल वह आड़ी बैठ पायी।
‘‘क्या आप चावण्ड से आ रहे हैं?’’
वृद्ध निरंतर उसकी उपेक्षा बरते हुए था। शायद उसे, उसके इसी आगzह का डर था। उसके प्रश्न पर प्रश्न पूछने पर वह शुष्कता से बोला- ‘‘हां, वहां मेरी ससुराल है।’’
‘‘अच्छा तो आप हमारे गांव के दामाद है।’’ ढ़िठाई से श्रुति ने कुछ अदा से मुस्कुरा कर मस्का मारा- ‘‘किनके यहां है आपकी ससुराल?’’
‘‘अनवर खां के यहां।’’
‘‘अच्छा-अच्छा वहीं न जो मिस्त्री हैं......जिसका एक लड़का दुर्घटना में....उसने यूं ही अंधेरे में तीर फेंका। परन्तु निशाना सही लगा।
‘‘हां वहीं बदनसीब अनवर खां।’’ बूढ़े की आंखें नम हो आई। इधर वृद्धा भी कुछ हिली।
‘‘अच्छा तो आप ये बताये आप करते क्या हैं?’’ उसने बातचीत का रूख पलटा।
‘‘मैं रोडवेज में ड्राईवर रहा बेटी.....ये देखो मेरा पास।’’ उसने स्नेहयुक्त स्वर में कहा और अपना पास निकाल कर श्रुति को बताया। ‘‘इस नौकरी से पहले मैं दरबार के यहां ड्राईवर रहा।’’ और वृद्धा ने वृद्ध को इशारा किया। दोनों कसमसाए तो श्रुति के लिये ठीक जगह निकल आयी। वह थोड़ा ठीक होते बोली- ‘‘ओह! खूब।’’
उसकी सराहना पाकर वृद्ध का व्यवहार शिष्ट व स्नेहिल हो आया- ‘‘आराम से बैठो बेटी।’’
‘‘पूरी उम्र ड्राईवर की सीट पर मजे से बैठने के बाद अब इस तरह भीड़ में धक्के खाते हुए आपको कैसा लगता है? अपने कुछ संस्मरण सुनाइये न!’’ वाणी में मनुहार भरकर बड़ी अदब से उसने आ़ग्रह किया। तो वृद्ध के झुरियों भरे चेहरे पर पूनम की लुनाई फूट आयी। एकाएक वह महत्वपूर्ण हो उठा था, खुद अपनी ही नजरों में। वह इतिहास के पृष्ठों को पलटते हुए पढ़ने लगा। वृद्ध की और श्रुति की बातों से लोगों में भी दिलचस्पी जाग उठी थी। सहयात्री भी जिज्ञासा से सुनने में तल्लीन हो गये। श्रुति अपने मकसद में सफल हो चुकी थी। बूढ़ा चांद खां अर्थात~ वृद्ध अब तक काफी सिमट चुका था और वृद्धा भी सिकुड़ गई थी। श्रुति बेहतर बैठी हुई थी।
वृद्ध उसके शिष्ट अंदाज और सम्मान से सम्मोहित हो चुका था। वृद्ध कह रहा था- ‘‘बेटी, मैंने दोनों जमाने देखें है। ये भी और वो भी। दोनों का नमक खाया है, गलत नहीं कहूंगा......’’ उसके पोपले मुंह से निरंतर उफनता थूंक......टच्च!....सीं.....’’उसके छींटे लगातार श्रुति तक पहुंच रहे थे और वह लगातार थूक के सूक्ष्म कणों को रूमाल से पौंछ रही थी।
इस स्थिति में श्रुति के मन के एक कोने ने उसे धिक्कारा पर उसने सुनी की अनसुनी कर दी। इधर वृद्ध संस्मरण सुना रहा था - और उधर मन अपनी ही उधेड़बुन में लगा था। सुख भोगने का आदी शरीर जब तकलीफ में होता है तो ऐसे में मन की कौन सुनता है। पर मन तो मन है। मन के कोनों में तीखी चोंचे उभर आयी और चंहु ओर से वे तन पर गिद्ध प्रहार करने लगी।
इधर श्रुति के मन में अन्तद्र्वंद मचा हुआ था और उधर वृद्ध अपनी दरबारी नौकरी के संस्मरण सुनाने में तल्लीन था। मानो उसे मन चाही मुराद मिल गई हो। तभी मन ने कुतर्क किया, ‘अरे, बूढ़े से बतियाता ही कौन है? और फिर तुम जैसी पढ़ीलिखी, मॉडर्न.....इसका इतना मान दे रही हो। वह इसकी इज्जत अफजाई नहीं तो और क्या है? फिर आज के युग में तसल्ली से सुनने वाला श्रोता इसे मिलेगा ही कहां?’ मन ने व्यंग्य का तीर खींचा। बूढ़ांे से बात करना, उनका अतीत सुनना अब इतना धैर्य व दिलचस्पी किसे है? कई नये आकर्षणों से जमाना भरा पड़ा है। आजादी की सुकून भरी स्वतंत्रता युक्त सांस लेते कौन भला इस पुराने गुलामी के इतिहास को सुनना पसंद करेगा?’
मन ने फिर कचौटा, ‘अगर बैठने की विवशता नहीं होती तो क्या तुम इस तरह यह सब सहन करती?’ मन के इस प्रश्न के आगे वह निरूत्तर हो उठी। उसने पहलू बदला और अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया। चूंकि उसके लिये बैठना महत्वपूर्ण था और इसके लिये वृद्ध का लगातार बातों में उलझे रहना नितांत आवश्यक। एक पल वह रूका नहीं कि फिर पीछे खिसक आयेगा और वह मुश्किल में..........
उधर मुंह किये ही उसने उसे फिर कुरेदा, ‘‘अच्छा! ये बताये आपने ड्राइवरी सीखी कहां से?’’ लोग कौतूहल से अब श्रुति को देख रहे थे। वे अपने मन में अब तक यह भ्रम पाल चुके थे कि वह किसी अखबार से रिश्ता रखती हैं। उसका वृद्ध से साक्षात्कार लेने का ढ़ंग दूसरों की नजरों में उसे महत्वपूर्ण बना रहा था। तभी भावुक हुआ एक युवा लड़का उठ खड़ा हुआ, श्रुति के लिये-
‘‘आप यहां बैठिये मेडम।’’ वह बिना अचकचाए, सहजता से उसकी खाली हुई सीट पर काबिज हो गई।
इधर वृद्ध अपना साक्षात्कार बड़ी संजीदगी से दिये जा रहा था जिसे बीच में ही अद्र्धविराम देते हुए उक्त युवक ने श्रुति से प्रश्न किया- ‘‘मेम आप किस अखबार या प्रेस से.....?’’ श्रुति मुस्कुरा दी. क्या बोले? पर चुप भी तो नहीं रहा जा सकता था। ऐसे में एक उपाय उसके जेहन में कौंधा - उसे भी प्रश्न में उलझाने का।
‘‘हां, एक कार्यक्रम की कवरेज करने.......’’आधा सच और आधा झूठ बोलते हुए श्रुति ने उससे भी प्रश्नांे की शुरूआत कर डाली।
‘‘अच्छा इन्टरव्यू लेती हूं मैं?’’ बदले में वह युवक मुस्कुरा दिया। ‘‘क्या करते हो तुम?’’ युवक उसे संजीदगी से बताने लगा- अभी उसने एम.ए. किया है इतिहास में। जॉब ढूंढ़ रहा है। थोड़ा बहुत कम्प्यूटर भी जानता है। छ: माह का डिप्लोमा कर रखा है उसने। घर में अब उसका कमाना बहुत जरूरी हो गया है। अगर श्रुति कोई मदद कर सके तो वह कुछ भी काम कर सकता है।
‘‘अब कपासन कितना दूर है?’’ बात गम्भीर मोड़ लेने लगी थी। अब श्रुति ने बात का रूख बदला।
‘‘बस अब आने ही वाला है बेटी। कुछ देर का और सफर है।’’ जवाब चांद खां ने दिया। श्रुति ने अपना मुख उधर घुमा लिया। इस पर अपनी जिन्दगी का सफरनामा फिर जारी कर दिया-
‘‘एक बार की बात है बेटी जब एक अंग्रेज अफसर दरबार के यहां मेहमान बनकर आया था और मैं गाड़ी चला रहा था। तब हम मुंह
अंधेरे ही शिकार के लिये निकल पडे़ थे। ये अंग्रेज भी....हुआ क्या? कहते हुए उसके बूढ़े मुंह से हंसी गुदगुदा उठी। साथ ही थूक के कई बड़े बगुले हवा में उछल पड़े।
छि: ! श्रुति घिन से खिड़की से बाहर देखने लगी। अब वह आराम से बैठी हुई थी। पूरी जगह में पसर कर। इस आराम के मिलने के बाद बेख्याली जो हावी हुई तो बाहर के भागते प्रक्रति के नजारे उसे मोहक दिखने लगे।
उसकी दृष्टि सूर्य पर केन्द्रित हो गई। वह अस्ताचल की ओर जा रहा था। निरंतर एकटक देखते रहने से वह हरा नजर आने लगा था। बस आसमां में थोड़ी सी जगह के लिये निरंतर घूर्णन करता हुआ।
इधर चांद खा अपने में तल्लीन अब भी अपनी बात जारी रखे हुआ था। उसे लग रहा था जैसे श्रुति अब भी उसकी बात सुन रही हैं।
श्रुति का मुकाम करीब आने लगा था। उधर वह युवा लड़का उसका कोई सम्पर्क सूत्र पाने के लिये अधीर हुआ बोला-
‘‘मेम आपका फोन नंबर....पता....वगैरह...’’और वह जेब में पेन खोजने लगा। तभी एक झटका सा लगा। बस मोड़ घूम रही थी। खड़ी सवारिया संभलने की कवायद करने लगी। अंत में एक धक्का और पीछे देती हुई बस अपने गतंव्य पर जाकर रूक गई। युवक संभलते ही शीघ्रता से बोला- ‘‘शायद पेन कहीं गिर गया है।’’
श्रुति ने उतरते हुए कहा- ‘‘हां.... हां ..... मैं तुम्हें अपना कार्ड भेज दूंगी।’’