Sunhare Pal

Wednesday, October 29, 2014

चुहल


मैं देख रहा हूं मोहन काॅलोनी की गली न. 11 में मकान नं. 115 जिस पर लिखा है - ‘शान्तिकुंज’ । जिस पर कल शाम से ही मेहमानों की आवाजाही शुरू हो गई है। सबसे पहले पम्मी आ गई। अपने पति, बेटा बहू, बेटी दामाद और पोते दोहते के साथ। पम्मी का लगाव अपनी भाभी से सदैव ही रहा। फिर भला इस मौके पर वह पीछे कैसे रहती? भाभी की सेवानिवृति का अवसर जो है।
विभा सबकी चहेती है। आॅफीस स्टाॅफ हमेशा उससे खुश रहा और अब उसकी सेवानिवृति को यादगार बनाने के लिए बलाॅक ‘ए’ स्टाॅफ, बी.बी. हेड आॅफीस और सिटी जोन सबने मिलकर पहले विदाई समारोह और फिर दावत का आयोजन रखा है। उसी में सम्मिलित होने के लिए सभी सगे सम्बन्धी, नाते रिश्तेदार, मित्र दूर दराज का सफर तय कर एकत्रित हो रहे है। सभी के लिए खाने ठहरने के सारे इंतजामात हो चुके है। सूचिया तैयार है फिर भी कई काम है जो ऐन मौके पर ही होने है। उल्लासमय वातावरण से पूरा घर गमक रहा है। फिर पम्मी का पूरे परिवार के साथ आना मानो घर में जान ही आ गई। जबसे पम्मी आई है विभा क्या सभी उसके आगे पीछे डोल रहे है। नन्द के दोहते पोते की बालसुलभ अठखेलियों से विभा बावली हुई जा रही है।
‘‘रात के ग्यारह बज रहे है, अब सो भी जाओ।’’ दिवाकर ने जम्हाई लेते विभा की ओर देखकर कहा- कल का ही दिन बचा है। बहुत कुछ तैयारी अभी बाकी है।
‘‘हो जायेगा। क्यों चिंता कर रहे हो भैया? अब तो मैं आ गई हूं। तुमहारी मदद को ये तीनो पुरूष हैं ही और बाकी रसोई में हम सब इतनी महिलाएं है ही। वैशाली बाजार का काम निब्टा देगी.....’’अपने परिवार की ओर इशारा करती पम्मी ने कहा।
‘‘वो तो सब करोगे ही पर इनका काम तो इन्हें ही निबटाना होगा न। वो तो हम करने से रहे। तुम्हारे पुराने साथियों में, स्कूल के मित्रों में कार्ड बंट गये?’’ दिवाकर ने विभा की ओर मुखातिब होकर पूछा।
‘‘छौड़ो भैया, भाभी के काम बहुत प्राॅन्ट है। सबकुछ पेपर पर कर लिया होगा। हमारी तरह दिमाग में बोझा लेकर नहीं घूमती वह। हां तो भाभी.....पम्मी विभा की ओर मुढ़कर कहने लगी- ‘‘सेवानिवृति के समय आप कौनसी साड़ी पहन रही है? जरा दिखाओ तो सही।’’
नन्द के कहते ही विभा ने अलमारी खोल साड़ी के पैकेट निकालने लगी।
मैं देख रहा हूं करीने से साड़ी कवर में न केवल साड़ी बल्कि उसकी मैचिंग के सभी चीजें उसमें व्यवस्थित रखी हुई है। जिन्हें देखते ही पम्मी ने कहा- ‘‘आहा! देखा न भैया, मैं न कहती थी भाभी के काम का जवाब नहीं। वाह! मैंगो राईप कलर। साड़ी को हाथ लगाते हुए पम्मी आगे बोली- ‘‘प्योर काॅटन है। इस पर ब्लेक थ्रेड की एम्ब्रायडी बहुत खिल रही है।’’
‘‘कैसी लगी?’’ विभा ने पूछाा।
‘‘खूब खिलेगी आप पर। वैसे आप कोई भी रंग पहने, सब जंचते है आप पर..... पर ये मैंगो राईप कलर ही क्यूं चुना आपने.... जरूर कोई कारण रहा होगा... ?.....क्यूं भैया ?
‘‘ओह! पम्मी....... एक तो इसमें फोटो अच्छे आयेंगी और दूसरा इस पर दाग नहीं लगेंगे। तुम तो जानती ही हो कि सेवानिवृति के समय अक्सर लोग...... माला गुलाल....’’ पीछे शब्द फुसफुसाकर कहती हुई विभा शर्मा गई। विभा की स्थिति देख सब हंसने लगे।
‘‘हूं तो ये बात है।’’ कहते हुए पम्मी ने विभा के कंधों पर साड़ी फैला दी। ‘‘बहुत खूबसूरत लग रही है आप।’’
‘‘हश!’’ पम्मी की इस टिप्पणी पर विभा फिर शरमा गई। पम्मी ने झूठ नहीं कहा साठा की उम्र में भी विभा वाकई में अभी बहुत आर्कषक लगती है। सरकार चाहे उसे रिटार्यड कर दे पर अभी उसके शरीर में बिजली जैसी चपलता और ऊर्जा है। मैंने देखे है उसके नौकरी के 38 बरस। सरकारी नौकरी करके उसने दिवाकर की पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में पूर साथ दिया। जीवन के अड़तीस बरस किसी कामकाजी महिला के लिए कम नहीं होते सो लगातार संघर्षाे की धूपछांव से गुजरते विभा को आराम कम और काम का बोझ ज्यादा ही ढ़ोना पड़ा।
पर ये जरूर कहूंगा कि निरंतर कार्य करते रहने के कारण उसके व्यक्त्वि में एक अनूठी आभा समाहित हो गई। जिससे शारीरिक सौष्ठव भी बकरार रहा। चहुं ओर भूरि भूरि प्रशंसा के उठते स्वर उसमें ऊर्जा भरते रहे। क्या कुछ पीछे छूट गया है शिकायतों के स्वर मंद होते गये। इसका आकलन उसने क्या किसी ने नहीं किया। कब गर्म तवे से हाथ चिपके, कब स्कूटी से पैर फिसला और हड़बड़ी में एक के बदले कब वो दो दो चश्मे सिर ओर आंखों पर चढ़ाए वह दफ्तर पहुंच गई। ये भला अब कोई क्यूं याद करेगा। महीने के शुरूआत में मिली पगार में कितना इन्तजार भरा मिठास है अब यह चरचा यहीं विराम ले रही है क्योंकि आने वाली सुबह अब हमेशा जैसी सुबह नहीं होगी। कल के सूरज का आगमन विश्राम की सुप्तपड़ी कलियों को चटका देगा और फिर जीवन को विश्रान्ति मोड में ले जाकर हमेशा के लिए टिका देगा।
मैं देख रहा हूं आॅफीस जाने के लिए तैयार होती विभा की तस्सली और ठण्डापन को। घर से चली तब भी चिरपरिचित सहकर्मियों के बीच कार्यकाल का अंतिम गुजरते दिन पर मन की सर्द छाया उसके मुखमंडल को घेरे हुए थी। काम की गति को शाम 5 बजे रजिस्टर पर अंतिम हस्ताक्षर अंकित करते समय प्रत्येक उपस्थित व्यक्ति खुशी व गम के रीमिक्स वातावरण में तैर रहा था। विभा ने साईन कर हौले पेन बंद किया। मैंगो राईप साड़ी का बसंती रंग, डायमण्ड रूबी की ज्वेलरी, होठों पर लगी लिपिस्टिक का नूरानीपन इस ठण्डेपन को दूर करने में असफल हो रहा था। एकाएक विभा की आंखें छलछला आयी। पर्स खोल रूमाल निकाल उसमें उन बूंदों को मानो सहेज लिया। उसके गले में एक माला आ गिरी। उसकी नजरे उठी। उसकी जगह कार्य संभालने वाला उसका अधिनस्थ था। फिर तो एक के बाद एक करके मालाएं उसके गले में आती रही। गला पूरा मालाओं से लद गया।
आॅफीस बिल्डिंग के खुले लाॅन से सटे बरामदे में कुर्सिया लगी थी। निके आगे टेबल कुर्सिया लगाकर मंच बना दिया था। एक ओर माईक रखा था। वहीं किनारे की टेबिल पर ढ़ेर सारी फूलमालाएं व चमकती पिन्नियों में बंद उपहार के पैकेट सजे हुए थे। सुशान्त ने माईक संभाला विदाई समारोह का संचालन करने के लिए। ये सुशान्त ही है जो है स्टनोग्राफर पर उसे मंच संचालन का बहुत शौक है। अपने इस हुनूर को दिखाने के अवसर आॅफीस में यदा कदा ही ऐसे अवसर आते है। सुशान्त अनिकेत का मित्र है ओर अनिकेत विशाल का और विशाल देवदत्त का।
‘‘विभा इनसे मिलो ये है देवदत्तजी।’’
‘‘हां हां पहचानती हूं इन्हें।’’
‘‘बताओ तो कौन है?’’
‘‘बचपन से ही इन्हें जानती हूं। ये देवदत्तजी है। इनके पिता मेरे पिता के मित्र रहे। इसलिए इनका हमारे घर आना जाना था।’’
‘‘ठीक पहचाना तुमने’’ दिवाकर ने कहा।
‘‘लीजिये यह मिठाई लीजिये।’’ विभा ने देवदत्त से कहा।
‘‘नहीं मिठाई मैं नहीं खाता, डायबिटीज है।’’ विभा ने खमण की प्लेट आगे कर दी। देवदत्त ने एक टुकड़ा खमण का उठा लिया। ‘आती हूं’ कहकर इसके बाद विभा आगे बढ़ गई। हंसी खुशी में मगन विभा को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है।
समय पंख लगाकर उड़ गया। आज विभा कितना थक गई होगी। रात बिस्तर पर गिरते ही  पहली बात विभा ने यहीं कही ‘‘बहुत थक गई हूं।’’
‘‘तुम क नहीं थकती, यह तो तुम्हारा तकिया कलाम है। दिवाकर का कुछ ओर ही मूड था उसने विभा से चुहल की तो वह चिढ़ गई।
‘‘तुम्हें तो मशीन लगती हूं मैं। दो दिन से लगातार चल रही हूं क्या थकूंगी नहीं।’’
‘‘कम से कम आज तो मूड खराब मत करो।’’ देवदत ने अपनी बाहें पसारी।
‘‘आप बात ही ऐसी करते है।’’ विभा कुछ ढ़ीली हुई।
‘‘अच्छा ये बताओ तुमको देवदत्त से बात करते हुए कैसा लग रहा था?’’
‘‘क्या मतलब? कैसा क्य?
‘‘नहीं नहीं मैं वैसे ही पूछ रहा था। वो तुम्हारे यहां आता जाता था न! दिवाकर के कहने का अर्थ विभा समझ गई। ‘'उससे क्या? जिस रास्ते जाना ही नहीं मैं उधर देखती ही नहीं।’’ विभा ने कहा और करवट बदलकर मुंह फेर लिया।
सही तो कह रही है विभा। विभा का छोटा भाई इस मौके पर नहीं आया। सब आये पर वो नहीं आया। विभा ने उसे बुलाया ही नहीं। उससे सारे नाते तोड़ लिए। दिवाकर ने मना किया तो कहने लगी- जिस रास्ते जाना ही नहीं उधर क्यूं देखना? 
विभा के खर्राटों का कठघरा दिवाकर को जकड़ने लगा। खामोश विभा की हर श्वास चीख रही है- ‘खून के रिश्ते से नाता तोड़ लेने वाली विभा के बारे में देवदत्त को लेकर ये विष कीड़ा दिवाकर तुम्हारे मन में क्यों पनपा?’ 
मैं देख रहा हूं विभा सो चुकी है गहरी निद्रा में लीन और दिवाकर जाग रहा है कचैटते मन में क्षणभर पहले आये विषैले ख्याल के फन को कुचलते हुए- ‘‘विभा के बिना रह सकते हो तुम? बेशक देवदत्त बचपन में विभा के घर आता जाता रहा। विभा के पिता ने देवदत्त से उसके विवाह की बात भी चलाई...पर बात आगे बढ़ी नहीं। खत्म हो गई..... तो फिर ये मन कौन सा बिना छोर सिरा ढूंढ लाया। विभा से विवाह हुए 40 वर्ष गुजर चुके। आज भी दीवाना हूं उसका। आज ीाी वह मुझे लुभाती है। उसके बिना जीने की कल्पना नहीं। उम्र के इस पड़ाव पर आखिर ये क्षुद्र विचार मन में आया कहां से? विभा ने पूरी निष्ठा से अपना जीवन, तन और मन मुझे समर्पित कर दिया फिर ये शक का कीड़ा....क्यों कर कुलबुलाया। बिन बरीश बरसाती मच्छर ने डंक मार दिया हो.‘‘....आक! थूं’’ मुंह में कसैलापन भर गया था। उठकर उसने बेसिन में कुल्लाकर पानी पीया। मुंह का जायका बल चुका था। विभा ने करवट बदली खिड़की से आती निर्मल चांदनी में उसका मुंह कांतिमान होता दिवाकर के सामने था। दिवाकर उस चेहरे की सौम्यता पर झुकने ही वाला था कि गर्म सांस उससे टकराती कह गई- ‘तुम मर्द कितना जल्दी अपना संतुलन खो बैठते हो....।’

Saturday, June 23, 2012

हस्ती इनकी

बीच रास्ते में चलते
कई बार आ घेरती है रेवड़

रेवड़, जिसकी भेड़चाल 
देखकर मन विमोहित सा 
हो उठता है
सिर झुका कर 
एक के पीछे एक लग 
अनुसरण करते जाना
क्या यही हैं 
इनकी करूण गाथा ?

रेवड़, जो लिए चलती है
एक कुत्ता, अपने संग
जो चैकसी करता है
रखवाली भी कभी कभी
मार्गदर्शन लेना
वो भी एक कूकर से
क्या नहीं है 
भीरूता इनकी?

रेवड़, जो धरती पर
भूचाल बन बढ़ती जाती
तनिक टूटी या बिखरी तो
फिर आ जुड़ती
चुम्बक जैसी खींच कर 
फिर सट जाती झुंड में
हां, यही है
विराट हस्ती इनकी

रेवड़ कह लो इनको या झुंड
झुंड में रहना, जीना, खाना
झुंड के पीछे झुंड
दसियों बीसियों नहीं
सैंकड़ो की तादाद में होते हुए
रोक दे जो बहते रास्ते
क्यों कहते हो उसे तुम 
एक निरीह भेड़

एक सूखा गुलाब

छूट गया हूं मैं
पिछली कक्षा में पढ़ी
किताब की तरह
कर लिए गये 
जिसके सारे सवाल हल
और पाठों का भी
दोहरान हो चुका
कई बार
परीक्षाओं के उपले
थेप चुका हूं बार-बार
फेल और पास की
किश्ती खै चुका हूं
जाने कितनी बार
हो चुके है सब बेमानी
इम्तहान और परिणाम
की घोषणा के साथ 
बदल गया है साल
पीले पड़े गये कागज तमाम
किताब हुई पुरानी
जिस पर लगें है आज भी
निशान, अर्थो और महत्वपूर्ण 
टिप्पणियों के साथ
पहले जैसे अब नहीं भरती
पुरानी किताब 
फरफराहट का दंभ
आ गई है नई किताब 
जो सहेज दी गई 
भूरे कवर के साथ
नई किताब की चमक में
छिप गया 
पिछले साल का कलेण्डर
जिसपर आया था कभी
वेलेन्टाईन एक बार
कह रहा है आज भी
भीतर रखा
एक सूखा गुलाब

Tuesday, December 20, 2011

आज का दिन



आज का दिन

आज का दिन खूनी था शायद, तभी तो- अभी वह घर से निकलकर पचास कदम आगे बढ़ भी नहीं पाया था कि........
बस! एक मोड़ ही मुड़ा था। सीधी और चाौड़ी सड़क थी। सुबह के सात बजे वह निकला था, तब हल्का धुंधलाका था पर अब सात बजकर पांच मिनिट होने को हैं, चारों ओर पूरा उजियाला पसर चुका है। स्ट्रीट लाईट बंद हो चुकी है। वीरान सी सड़कों पर कुछ इक्के दुक्के लोगों के होने का एहसास भर हुआ था उसे।
वे लोग- उनके चेहरे कपड़े से लिपटे हुए थे। उसे लगा वे सफाई कर्मचारी है, आज शायद सड़क पर कोई विशेष सफाई अभियान हो। पर वह गलत था। वह सफाई करने वाले नहीं थे, बल्कि हमलावर थे। यकायक उन्होंने आकर उसे घेर लिया और प्रहार के लिए जैसे उनके डण्डे उठे, वह भागा। उसने न इधर देखा न उधर बस पांव जिधर उठ गये वो सरपट दौड़ पड़ा। उसने बेतहाशा दौड़ बढ़ाई। वे पीछे थे, कुल गिनती में चार लोग।
वह दौड़ रहा था और दौड़ते-दौड़ते ही उसने निर्णय किया- कहीं पनाह लेनी होगी। एक घर सामने था- मिश्राजी का।
वह उन्हें अच्छी तरह जानता था। घर की फाटक खोल भीतर घुसने में वह सफल हो गया। दरवाजे तक पहुंच पाता इससे पूर्व ही उन हमलावारों में से एक के लठ्ठ का प्रहार उसके पांव पर गिरा। पिंडली पर लगी भंयकर चोट के कारण वह थोड़ा लड़खड़ाया इतने में दूसरा प्रहार उसके कंधे को तोड़ गया। वह संभल नहीं पाया। वहीं अपने सिर को दोनों हाथों से बचाते हुए उकड़ू बैठ कर सहायता के लिए पुकारने लगा। अब तो वे चारों उस पर पिल पड़े। वे उसे इस तरह पीट रहे थे मानो रूई धुन रहे हो। तड़ातड तड़ातड़, प्रहार पर प्रहार। उसकी भयानक चीखे और डण्डे बरसने की आवाजे दोनों घुलमिलकर खौफनाक रिदम बन गई थी।
जानलेवा हमला हो रहा था उस पर। डण्डों के अगले मुहाने पर लगभग 6 इंच तक कीले ठुकी हुई थी। जो पिटाई के साथ साथ उसकी चमड़ी भी उधेड़े जा रही थी। धड़ाधड़
धड़ाधड़........
आज का दिन ममता भरा दिन था शायद, तभी तो- सड़क बुहारते हुए उसकी नजर इस हमले पर गिरी। वह झाडू हाथ में लिए हुए अपनी सरकारी ड्यूटी पर थी। सड़क से कचरा हटा रही थी। इसी दौरान उसे दौड़ते हुए बूटों का स्वर सुनाई पड़ा। सामने देखा- एक युवक के पीछे कुछ लठैतों को दौड़ते हुए। वह कुछ समझ पाती तब तक वह लड़का एक घर के भीतर घुस गया, पर वह वहीं बाहर संकरी बाऊंडरी में फंसकर धिर चुका था। वे उसे निर्दयता से पीट रहे थे। वह उस जगह के लिए दौड़ी जहां ये हादसा हो रहा था। उसने उन्हें रोकते हुए ललकारा- ‘‘खबरदार जो किसी ने अब इस पर हाथ भी उठाया तो.......क्या मार डालोगे उसे?कमीनों ऽ ऽ ...... एक निहत्थे पर चार चार पिल रहे हो। शर्म नहीं आती तुम्हें.......दफा हो जाओ यहां से नहीं तो एक एक को टांग तोड़कर .....’’दहाड़ते हुए उसके हाथ में झाडू मजबूती से कुछ इस तरह ऊपर उठ आया मानो एक सशक्त हथियार हो। उसने हमलावरों में से एक का हाथ पकड़ कर धक्का दिया और घेरे को तोड़ती हुई भीतर घुस कर उसने अपना आंचल पीटने वाले पर फैलाकर ढ़कने की कोशिश में वह उससे लिपट गई। इसी बीच एक वार से खनखनाकर कांच की सारी चूडि़या झड़ गई।
अचानक हुए इस व्यवधान से हमलावर कुछ ठिठके। वह गुस्से में भरी हुई फिर बरसी- ‘‘कुछ तो शर्म करो। ओ मोहल्ले वालो क्या तुमकोे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है ? आंख कान वाले
अंधों-बहरो.....जरा सुनो तो....क्या सबके सब नपुसंक होकर दुबके बैठे हो? खोलो, अपने दरवाजे खोलो......’’
समय की नजाकत को समझ हमलावर भाग खड़े हुए। अब वह उस भयभीत युवक को सहला रही थी। अपने आंचल से उसके बहते खून को पौंछते हुए उसने पुचकारा- ‘‘क्यों ये दुष्ट तेरी जान के पीछे पड़े थे...........कहां कहां चोट लगी तुझे......मुझे बता तो......’’
अब तक दबे बैठे, या तमाशा देखने वाले सभी लोग बाहर निकल आये थे। सभी के मुख से उसके गुणगान हो रहे थे। कोई कह रहा था.......जन्म देने वाली से भी बढ़कर, नवजीवन देने वाली मां’’, किसी ने कहा- ‘‘उसके जीवन की रक्षा कर सचमुच वह यशोदा मैया बन गई है।’’ यहां वे इस बात को सब नजरअंदाज कर चुके थे कि यहीं वो महिला है जिसने अभी-अभी मोहल्ले वालो को गाली गलौच दी थी। उन्हें बेशर्म और खुदगर्ज कहकर उनकी गैरत को ललकारा था।
आज का दिन शायद मानवीय सभ्यता के कलंक अछूत दर्शन का भी था। तभी तो- मुर्दा बस्ती के उन लोगों ने यह भी कहा था- हरिजन स्त्री है, इसे क्या मुंह लगाना यह तो हर रोज ही सड़क बुहारने आती है।
‘जल ही जीवन है’ जिसे वह घायल युवक मांग रहा था। वह युवक जो कि उनकी पिछली सड़क पर रहने वाले डगवाल सा. का बेटा था जिसे वे भलीभांति पहचानते थे। कोई भी उसे पानी नहीं दे रहा था क्योंकि वह उस हरिजन स्त्री की गोदी में गिरा पानी मांग रहा था। एक मेहतर ने इसे छू लिया है। अब कौन अपना धर्म भ्रष्ट करें?
मैया अपने आंचल से उस पर हवा कर रही थी। पर पानी...? पानी...वो कहां से लाती? तमाशाबीन लोग खामेश से इस बेबसी का अनोखा खेल देख रहे थे। उसने हाथ जोड़कर मोहल्ले वालो से प्रार्थना की। तब जाकर किसी एक का मन पसीजा और विकल्प के रूप एक आईडिया उसको क्लिक हुआ होगा तभी तो वह एक डिस्पोसेबल ग्लास में पानी भर कर दूर रख गया। उस मैया ने उसे सहारा देकर उठाना चाहा तो वह उठ नहीं पाया। उसका कंधा झूल गया। मैया ने चम्मच के लिये फिर याचक दृष्टि दौड़ाई। कोई समझकर प्लास्टिक का चम्मच लाता इससे पूर्व ही उस युवक की पत्नी दौड़ती हुई चली आई। उसके पीछे पीछे उसकी सगी मां भी थी। सचमुच यह एक संवेदनाशून्य दिवस होता अगर वे लोग नहीं आयी होती तो? उनके आने से सोये लोगों की संवेदनाएं अब जाग चुकी थी।
आज का दिन एक सुनियोजित अपराध का भी था। पूरणमल ठेकेदार बरसो से वर्मा स्टील कम्पनी में टेण्डर भरता आ रहा था। अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि टेण्डर उसे न मिला हो या किसी ने कोई मीनमेख भी निकाली हो। बरसो से वेस्ट का मलबा वही उठाता आ रहा है। इस बार देखो- ये नया नया लड़का क्या आया, अकल की गर्मजोशी दिखाने लगा। जोड़ बाकि की गणित तो पिछले भी सब जानते थे पर वे सब भरी पूरी उम्र के घर गृहस्थी वाले लोग थे। उनकी भी अपनी जरूरते थी। पैसे के बिना सब सून, सेटल था ऊपर से लेकर नीचे तक।
‘‘अब इसने आकर ऊपर बैठे अफसर को कौनसा पान चबवाया कि इस बार का टेण्डर उसके हाथ ही निकल गया। मेरा तो सारा धंधा ही चैपट कर दिया इस कल के लौंडे ने.......’’पिच्च करके पीक थूकते हुए पूरणमल ने इस छोरे को सबक सीखाने की ठान ली थी। किसी को कानों कान खबर न हो और काम हो जाय। ऐसा ही तरीका था पूरणमल का।
आज का दिन भंयकर असमंजस से गुथमगुत्था होने का दिन भी था शायद। किसने हमला करवाया? कौन थे हमलावर? क्या रंजिश थी? कुछ लूटकर तो नहीं ले गये?
सब यथावत था। जेब को हाथ तक नहीं लगाया गया, घड़ी, चेन, मोबाईल सब यथावत थे तो फिर क्यों जानलेवा हमला हुआ? किसलिए और किसने किया अपराध? जितने मुंह उतनी बाते। जितनी संवेदनाएं उतने दिमाग। खोज लाये दूर की कौड़ी पर-
किराये के अपराधी कहीं पकड़ में आते हैं क्या? आज का दिन अपराध का ही नहीं भ्रष्ट प्रशासनिक दर्शन का भी था। पिटाई करने वालो के खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज हुई। किसने हमला करवाया और कौन थे हमलावर, आखिर पता लग ही गया।
जब सब खोज खबर हो गई तो क्यों नहीं पकड़े गये अपराधी? प्रश्न सिक्के के एक पहलू की तरह सामने था तो उत्तर भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह पीछे दबा, छिपा झलक रहा था। सभी ने जान लिया था- पिटने वाले युवक ने भी, उसके घर वालों ने भी, तमाम रिश्तेदारों ने भी यहां तक कि मोहल्ले वालों ने भी। पुलिस रिपोर्ट का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कोई नहीं पकड़ा जायेगा क्योंकि उन गुण्डों में से दो पुलिस वालों के बेटे थे और बाकि बचे दो राजनैतिक संरक्षण पाये हुए शराबी कबाबी। जिनका वास्ता तत्कालीन विधायक से होता हुआ कुछ और ऊपर तक.....शायद भाई भतीजे थे।
तो आज का दिन.....................अभी भी बहुत कुछ शेष है, ये किस्सा अंतहीन है। कहां तक की बात मैं कहूं?

Saturday, November 26, 2011

आदमी का अहसास


जिन्दगी की किताब पर
रोज होते है
हास परिहास
नित नये रूप में
छपते है
संवाद
चाय के पानी की तरह
खौलते है गैैस पर
फ्र्रिज में रखे
दूध का ठण्डापन
जमने न देता
डिब्बे में बंद
चीनी की मिठास
जागता है फिर गर्म अहसास
मुंह के सामने
लगी प्याली की तरह
गर्म धुंए से
लौटता है फिर
आदमी का विश्वास

Thursday, November 24, 2011

तेरे रूप कितने



तेरे रूप कितने


आज मैं फिर इस शहर के करीब पहुंच चुकी हूं। दूर से ही पहाड़ी पर शान से इठलाता हुआ प्राचीन दुर्ग मुझे शहर के पास पहुंचने का संदेश दे रहा है। सांध्यवेला की समाप्ति पर धुंधले
अंधेरे में किसी तिलिस्म की भांति खड़ा है यह दुर्ग। झिलमिल प्रकाश और स्पाॅट लाईट में महल, स्तम्भ, प्राचीन मंदिरों के शिखर, प्राचीर सबकुछ जीवन्त हो अपना जादू बिखेर रहे है। भक्ति और शक्ति के लिए विख्यात यह नगर अब मेरे लिए अनजाना नहीं रहा। पन्ना, पद्मिनी, कर्मावती और मीरा जैसी ललनाओं ने इसे इतिहास में अपनी अनूठी पहचान अर्पित की थी।
‘क्या इस मिट्टी में स्त्री महिमा के कण आज भी मौजूद है?’ यह विचार मन में आते ही मैंने अपनी आंखे मूंद ली, सिर स्वतः ही सीट के सहारे टिक गया। एक चेहरा बंद आंखों में घूम गया - तुम्हें किस नाम से पुकारूं ‘काकीसा’ हां यही ठीक रहेगा। तुम्हारा अदब कायदा देखकर तुम्हें नाम से बुलाना अच्छा नहीं लगेगा मुझे। हालांकि उम्र में तुम मुझसे चार-पांच साल मुश्किल से बड़ी होगी। तुम भी मुझे मम्मीजी कहकर बुलाती थी। कितना अजीब था रिश्तों का संबोधन। मैं तुम्हें काकीसा और तुम मुझे मम्मीजी, रिश्तों का ये संबोधन हमारी सामाजिक स्थिति को रेखाकिंत करते हुए अपनी-अपनी मर्यादाओं में बंधा हुआ था।
-पता है आज मैं तुम पर लिखने की सोच रही हूं।
-मुझ पर? काली रंगत पर सफेद दंत पंक्ति चमकाती तुम सामने होती तो हंस पड़ती, ‘‘देखो रे! कालकी की किस्मत चमकी। ’’ हर बात पर तुम यही तो कहती थी। एक बार जब तुमने कहा था- ‘‘देखो कालकी के दिन पलटे, मजे से गाड़ी में घूमती फिरती है।’’ जब तुमने खुद का उपहास उड़ाया। मुझे अच्छा नहीं लगा।
-ऐसा क्यों कहती हो?
-मैं नहीं मम्मीजी, वो कहेंगे।
-वो कौन?
- क्या बताऊं मम्मीजी सब मुझसे जलने लगे है। इस कान्हा के भाग्य से मुझे मिली ए.सी. की ठंडक उन पर कहर बरपा रही है। कान्हे के साथ मुझे कार में घूमते देख उनके सीने पर सांप लौटने लगता है। रामेश्वर की बहू सब कह देती है मुझे।
-कौन रामेश्वर?
-ओ ऽ मम्मीजी आपके आर्शीवाद से......और उसने हंसी रोकते हुए साड़ी का फोहा बनाकर मुंह में ठूंस लिया।
मतलब? मतलब यह था कि रामेश्वर उसका बेटा है। जिसकी पत्नी उसे सुनाती है- कान्हा पाकर तुम तो निहाल हो गई माई। ‘‘कान्हा’’ मेरे दोहत्र को तुम इसी नाम से पुकारती हो।
सचमुच रूद्र के कारण काकीसा के दिन पलट गये थे। दरअसल काकीसा मेरे दोहित्र की आया थी। पक्के वर्ण की साधारण शक्ल वाली दुबली और लम्बे कद वाली महिला एक ऐसा गरिमामयी व्यक्तित्व - जिसे मैं कभी नाम से नहीं पुकार पायी।
बेटी चाहती थी कि एक बार मैं उसे देख परख लूं। सवा माह के शिशु को लेकर वह चली गई थी मेरे पास से। जब रूद्र दो माह का हो चुका तो वह अपनी प्रेक्टिस की दुनिया मैं लौटना चाहती थी। अतः उसने अपने नन्हे मुन्ने के लिए काकीसा रूपी दादी का बंदोवस्त कर लिया।
दादी इसलिए की वह खुद को रूद्र की दादी के रूप में प्रस्तुत करने लगी। बेटी ने मुझसे पूछा- ‘‘कैसी लगी आपको काकीसा?’’
हाॅल में रूद्र को उसे झूला झुलाते तुम्हें देख, मैं हंसकर बोली- ‘‘डेढ़ हजार की दादी।’’ मेरे इस उत्तर पर वह भी मुस्कुरा उठी। सचमुच रूद्र को डेढ़ हजार रूपये प्रति माह में दादी मिल गई थी।
तुम उठी और अबोध शिशु को शू-शू करा लायी। अब तुम तन्मयता से उसकी नैप्पी बांध रही थी। मैंने बेटी की ओर देखा और बेटी ने मेरी ओर मैंने आंखों ही आंखों में इशारा किया और ‘हांमी’ भर दी। मेरी हांमी देख उसे तस्सली हुई।
दोपहरी का समय था। छोटी बेटी की शादी की वीडियो सी.डी. चल रही थी। तुम भी वहीं फर्श पर बैठी सी.डी. देख रही थी। पीठी का दृश्य था तुम आनंदित हुई पीठी के गीत गाने लगी। दृश्य परिवर्तन हुआ तो तुम झट से बोली- ‘‘यह तो मायरा हो रहा है’’और प्रफुल्लित हुई वह ‘वीरे’ गाने लगी। तभी झूले में सोया रूद्र कुनमुनाया। तुम उठी और झूला देती लोरी गाने लगी। मुझे अच्छा लगा और विश्वास भी हुआ कि मेरे दोहित्र की पालना तुम अच्छे से कर लोगी। यह सब करते हुए कितनी प्रसन्न मुद्रा में रहती थी तुम। जब हम तुम्हें साथ लेकर मंदसौर दर्शन करने गये थे, पूरे रास्ते तुम्हारे भजन चलते रहे जिसने सफर को यात्रामय कर दिया था। तुम हर जगह अपने को जोड़ देती थी।
मुझे लिखता देखकर तुम चाय बना लायी थी।
-अपनी भी बनाई?
-ओ मम्मीजी मेरे तो दूसरे के घर का पानी नहीं ओजता।
-क्या?
-हां, मेरे आखड़ी है।
-मतलब?
मतलब यह था कि काकीसा ने अपने स्वर्गीय पति को लेकर बाधा ले रखी थी। जब तक वह उनके नाम का रातीजगा नहीं दे देगी तब तक किसी घर का पानी तक नहीं पीयेगी। उसके अनुसार उसका पति मृत्यु बाद देवता बनकर प्रकट हुआ है और अब बहू के शरीर में आता है। उन्होंने ही रात्रि जागरण मांगा है। वह उनको वचन दे चुकी है और जब तक वचन पूरा न हो जाए वह किसी के यहां का पानी तक नहीं पीयेगी। वह यह बाधा(आखड़ी) ले चुकी है। सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। पति से इतना गहरा अनुराग, उसकी मृत्यु के बाद भी........
कुछ भी हो तुम अपने कायदे की बहुत पक्की थी। हमारे घर में खाने के लिए क्या कुछ नहीं था पर तुम....हर चीज के आग्रह पर तुम्हारा एक ही जवाब होता- ‘‘मेरे काम नहीं आता।’’ तुम कुछ भी नहीं खाती थी। तुम्हारा यह त्याग देखकर मैं सहज ही यह अनुमान लगा बैठी थी कि तुम्हें अपने पति से असीम प्रेम मिला होगा। किन्तु तुम्हारी बातों ने तो मेरे अनुमान की परखच्चियां उड़ा दी। तुम अब तक की सारी उम्र में अपने पति के साथ केवल पांच-सात साल ही रही बस!
-हो मम्मीजी क्या करती जब मैंने अपनी आंखों से उसे सौत के साथ सोते देख लिया तो फिर उसके बिस्तर पर चढ़ूं तो भाई के बिस्तर पर चढ़ूं इतना दोष लगे मुझे।
-क्या मतलब?
-सच्ची में मम्मीजी, मैं अपने तीनो बच्चों को लेकर निकल आयी। बड़ा रामेश्वर तो फिर भी तीन बरस का था पर उदयलाल तो दूध चूखता था।
-फिर अपने पीहर में रही?
-थोड़े दिन। फिर मजदूरी करते हुए अलग रहने लगी।
-मजदूरी से काम चलता था तुम्हारा?
चलता....कभी कभी कोई पेटियों रख जाता। लोग सीधा आटा दाल दे जाते...चलता रहा...बगत निकल गी। यह कहकर एक सुखभरी सांस खींची थी तुमने। अपनी शर्तो पर जिन्दगी जीने के सुख की। तुम अपने पति के पास वापस कभी नहीं गई। जबकि वह एक अच्छी सरकारी नौकरी में था। तुम समय परिस्थिति से समझौता कर चलती तो एक अच्छी जिन्दगी जीती। पर इसका तुम्हें कोई मलाल ही नहीं, बल्कि तुम मुझे पल पल पर चैंका देती। तुम्हीं ने बताया था कि उसमें कहीं थोड़ी सद्बुद्धि थी जो पेंशन में मेरा नाम लिखवा दिया था उसने। आज भी तुम्हें वह पेंशन मिल रही है। ‘‘तुम्हें उससे लगाव तो रहा होगा तभी......?’’
-लगाव कठा’रो। देवता बण’र आया पछे तो करणो पड़ै। हूं तो सात फेरा री परणी। हूं तो पतिवरता नार। म्हारो धरम कई है....आप ही बतावौ?
मुंह की बात पूरी भी नहीं होने दी थी तुमने और तमक उठी थी तुम अपने पक्ष में दलील देते हुए। तुम कितनी खुद्दार हो। जवानी में पति को पथ भ्रष्ट देखा तो अलग हो ली। जिन बच्चों को तुमने इतनी तकलीफ से पाला उनके साथ भी तुम नहीं रहती?
- क्या करूं मम्मीजी, बहू थोड़ी गरम है। मुझे लेकर दोनों में घमासान होवै तो मैं अलग ही भली।
बेटी के पास जितने दिन भी रही तुम्हारी बाते, तुम्हारे आदर्श और तुम्हारे व्याख्याएं समस्त स्त्री जाति के गौरव को रूपायित करती, महिमा को परिभाषित करती और कई जगह खुद मुझे झकझोरने वाली थी। पर पन्ना-पद्मिनी-मीरा की इस धरती पर आज भी भारतीय स्त्री के उस स्वाभिमान भरी महिमा का कहीं अस्तीत्व हैं ? यह मुझे दस माह बाद महसूस हुआ।
बेटी का फोन था- ‘‘मां, कल काकीसा. ने रातीजगा दिया था। बहू के शरीर में देवता आये थे। देवता ने आदेश दिया कि वह कहीं काम न करें... और काकीसा ने देव आज्ञा मान काम छोड़ दिया है।’’
‘‘क्यों? तुमने उन्हें जाने क्यों दिया...रोक क्यों नहीं लिया...वापस बुला लो उन्हें?’’
‘‘मां बहुत मुश्किल है। उन्हें कोई नहीं डिगा सकता। मुझे तो लगता है कि काकीसा की बहू बहुत चालाक है। देवता का नाटक कर काकीसा का काम करना छुड़वा दिया। ताकि वह अपने घर का काम करवा सकें। एक दिन मैंने खुद घर जाकर देखा था। घर में काम के मारे काकीसा का बुरा हाल था।
अपने ही अन्धविश्वासों में जकड़ी तुमने आराम की नौकरी को तिलांजली दे दी थी। तुम्हारी यह विभिषिका कोई पहली कहानी नहीं है। भारतीय स्त्री की सदियों सदियों की कहीं अनकहीं यही कहानी है।


Wednesday, May 11, 2011

गीत


हे परोपकारी भगवन
तू रीते घट भर दे
सूखे ताल तलैया भर दे

पथिको को छैया दे
हे परोपकारी ईश्वर....
सावन को हरियाली दे दे

भादो को रिमझीम दे

पर्वतों को खोये जंगल दे

उजड़ो को बसेरे दे

हे परोपकारी भगवन...

पंछी को अमराईया दे दे

गैया के थन भर दे

रातदिन हेण्डपम्प की

खट पट कम कर दे

हे परोपकारी ईश्वर...

भैया को चबेना को दे दे
तू मैया को घर दे
तिनका तिनका लौटा दे

तू सब पीड़ा हर ले
हे परापकारी भगवन....

Sunday, April 3, 2011



लुक छिप लुक छिप खेली


मेरे संग ओ मेरी साथिन


ओ मेरी सहेली


अब तुम बड़ी हो गई हो


काव्य मधुरिमा


और उषा की चहेती हो गई हो


सलौने शब्दों में गूंथी


मनको की माला सी हो गई हो


कुहके अम्बुए की डाल


मेरे लिए तुम अब पहेली हो गई हो


खिले सुमन सी


अब तुम बासन्ती पल हो गई हो


विचरे रीते मेघ


रूई के फाहे सी धवल हो गई हो


पवन हिंडोले संग


डोलती माझी की नैया हो गई हो


अब तुम बड़ी हो गई हो


विमला भंडारी

Thursday, December 9, 2010

घर, धर्मशाला हो गए

सुबह जब
निन्नी ने आंखें खोली
नौकरी के पाश में बंधी
मां चढ़ चुकी थी किसी द्रुतगामिनी में
पापा की गोद
डस चुकी है उनकी पदौन्नती
अब वह नहीं रहते यहां
शनिवार इतवार के है वे मेहमां
दादी, फूफी सभी
तो मुसाफिर हैं यहां
टेबिल पर सजे
बस्ता, टिफिन और वॉटर बोतल की तरह
रैन बसेरा लेकर
चल पड़ते है सुबह
तभी टेम्पो का भोंपू
चौकस करता है निन्नी को
बॉय-बॉय करती है निन्नी
बेजान दीवारों को
उसके बाद
दिनभर ऊंघता है घर
शाम फिर
मां आती है / रसोई जाग जाती है
निन्नी आती है / आंगन चहक उठता है
भैया आता है / टी.वी. मुस्कुराता है
हर शनिवार इतवार
मुसाफिरखाना बना घर
फिर घर हो जाता है
जो दो दिन बाद
सन्नाटे में खो जाता है
मां चली जाती है
पापा चले जाते है
दादी-फूफी-भैया
सभी चले जाते है
फिर निन्नी को भी
जाना होता है

Tuesday, October 12, 2010

थोड़ी सी जगह



थोड़ी सी जगह
ठीक पौने बारह बस का समय था और वह बज चुकी थी। बस, बसस्टॉप छोड़ चुकी थी और श्रुति बस अड्डे के बाहर ही बस रूकवा कर अंदर चढ़ गई।
नॉन स्टॉप बस में ठसाठस सवारियां भरी हुई थी। कहीं तिल धरने को जगह नहीं थी। ‘उफ! कपासन तक का लम्बा सफर क्या खड़े खड़े तय करना पड़ेगा ?’ यह ख्याल आते ही श्रुति को झुरझुरी फूट आयी। किसी तरह थोड़ा इधर उधर खिसक कर बस की दोनों सीढ़ी ही चढ़ पायी।
‘‘अरे भैया प्लीज यह सामान ऊपर बर्थ पर रख दो.......आप जरा सा पांव हटाइये ये बैग सीट के नीचे आ जायेगा......हां हां ठीक है.....कोई बात नहीं।’’ अपना सामान व्यवस्थित करवा कर श्रुति ने राहत की सांस ली। ‘समय से पहुंचने की मजबूरी नहीं होती तो क्या मैं इस भीड़ में घुसती?’ मन में उठी कोफ्त पर मजबूरी ने अपनी विवशता जमाई। उसने एक पांव पर वजन डालते हुए दूसरे पांव को थोड़ा रिलेक्स किया। रिलेक्स होने के बाद उसकी निगाहें उस भीड़ भरी बस में बैठने की जगह तलाशने लगी। शायद इस उम्मीद में कि कोई उठकर कहें- ‘आइये आप बैठ जाइये।’ हर चेहरा हर निगाह उसे बेगाना लग रहे था। बैठी सवारियां भीड़ की ओर से बेफिक्र हुई अपने में तल्लीन थी। कोई कागज में लिपटे व्यंजन का आनंद ले रहा था। तो कोई आपस में बतिया रहा था। तो कोई आंखे बंद किये ऊंघने में तल्लीन। काश! वह भी बैठे हुए लोगों की श्रेणी में होती। आंख मूंदती और बेफिक्री का सफर करती।
थककर उसने दूसरे पांव पर वजन डाल पहले को रिलेक्स किया। ‘बड़ी भाग्यशाली हो तुम। चाहे कितनी भी भीड़ हो तुम्हें जगह मिल ही जाती है।’ पति द्वारा की गई उक्त टिप्पणी उसे याद हो आयी। ‘हूं!’ उसने दीर्घ नि:श्वास छोड़ते हुए फिर जगह तलाशनी शुरू कर दी। किन्तु आज पति महोदय की ये टिप्पणी सार्थक होती नजर नहीं आ रही थी। तभी श्रुति की नजर दो की सीट पर बैठे दुर्बल देह वाले वृद्ध स्त्री पुरूष पर गिरी। ‘क्या इनसे जगह मिल सकती है?.....शायद। यदि थोड़ा सा खिसक जाय तो......बस थोड़ासा’ मन में पति की टिप्पणी फिर गूंज उठी। वह उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करने लगी। साफ लग रहा था कि वह श्रुति के किसी अनुनय विनय को नहीं मानने वाले। इनसे जगह मिलनी मुश्किल है। अब...? तभी वृद्धा से श्रुति की निगाहें मिली। मन में एक उपाय कौंधा।
‘‘आप कहां से आ रही है?’’ ऐसे अवसर पर स्वर के मिठास के क्या कहने। निराला ही होता है, सो श्रुति भी सफल हुई। ‘‘चावण्ड से’’ संक्षिप्त ही सही। वृद्धा का प्रत्युत्तर पा श्रुति का मन इस भाव से तरंगति हो उठा कि ये अपने ही गांव की है।
‘‘अच्छा, आप वहां कहां रहती है?’’ श्रुति ने आश्चर्य प्रकट किया। मधुरता बकरार रखते हुए उसने वार्तालाप का सूत्र आगे बढ़ाया- ‘‘क्या, मुझे जानती है आप?’’
उसने इन्कार में गर्दन हिलाते हुए कहा- ‘‘नहीं, मेरा वहां पीहर है और बारह बरस की थी जब ही मेरा ब्याह हो गया था।’’ ओह! निराशा से फिर श्रुति का मन बुझ गया। वृद्ध की खीज भरी कसमसाहट से प्रकट हो रहा था कि वृद्धा के साथ हुई वार्तालाप को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। श्रुति के मन ने तेवर बदला। ‘मुझे वृद्ध से बात करनी चाहिये।’
‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’
‘‘कपासन’’ उसने लापरवाही भरी घोर उपेक्षा से कहा। इसके बाद संवाद क्रम टूट गया। थोड़ी चुप्पी के बाद श्रुति ने दूसरे पांव को विश्राम देते हुए पहले पर फिर शरीर का वजन लाद दिया।
हिम्मत बटोर श्रुति ने वृद्ध से थोड़ा खिसकने का अनुरोध -‘‘अगर आपको तकलीफ न हो तो जरासा खिसक जाय। थोड़ी सी मेरे लिये भी जगह निकल आयेगी।’’ उसकी आवाज बड़ी मुलायम थी। उसका असर भी हुआ। वृद्ध थोड़ा आगे पीछे हुआ। पर जगह बहुत ही कम निकाली। हार कर श्रुति ने भी वहीं बैठने का फैसला कर लिया। बहुत मुश्किल से अपना आधा वजन मुड़े घुटनों व एड़ी पर डाल वह आड़ी बैठ पायी।
‘‘क्या आप चावण्ड से आ रहे हैं?’’
वृद्ध निरंतर उसकी उपेक्षा बरते हुए था। शायद उसे, उसके इसी आगzह का डर था। उसके प्रश्न पर प्रश्न पूछने पर वह शुष्कता से बोला- ‘‘हां, वहां मेरी ससुराल है।’’
‘‘अच्छा तो आप हमारे गांव के दामाद है।’’ ढ़िठाई से श्रुति ने कुछ अदा से मुस्कुरा कर मस्का मारा- ‘‘किनके यहां है आपकी ससुराल?’’
‘‘अनवर खां के यहां।’’
‘‘अच्छा-अच्छा वहीं न जो मिस्त्री हैं......जिसका एक लड़का दुर्घटना में....उसने यूं ही अंधेरे में तीर फेंका। परन्तु निशाना सही लगा।
‘‘हां वहीं बदनसीब अनवर खां।’’ बूढ़े की आंखें नम हो आई। इधर वृद्धा भी कुछ हिली।
‘‘अच्छा तो आप ये बताये आप करते क्या हैं?’’ उसने बातचीत का रूख पलटा।
‘‘मैं रोडवेज में ड्राईवर रहा बेटी.....ये देखो मेरा पास।’’ उसने स्नेहयुक्त स्वर में कहा और अपना पास निकाल कर श्रुति को बताया। ‘‘इस नौकरी से पहले मैं दरबार के यहां ड्राईवर रहा।’’ और वृद्धा ने वृद्ध को इशारा किया। दोनों कसमसाए तो श्रुति के लिये ठीक जगह निकल आयी। वह थोड़ा ठीक होते बोली- ‘‘ओह! खूब।’’
उसकी सराहना पाकर वृद्ध का व्यवहार शिष्ट व स्नेहिल हो आया- ‘‘आराम से बैठो बेटी।’’
‘‘पूरी उम्र ड्राईवर की सीट पर मजे से बैठने के बाद अब इस तरह भीड़ में धक्के खाते हुए आपको कैसा लगता है? अपने कुछ संस्मरण सुनाइये न!’’ वाणी में मनुहार भरकर बड़ी अदब से उसने आ़ग्रह किया। तो वृद्ध के झुरियों भरे चेहरे पर पूनम की लुनाई फूट आयी। एकाएक वह महत्वपूर्ण हो उठा था, खुद अपनी ही नजरों में। वह इतिहास के पृष्ठों को पलटते हुए पढ़ने लगा। वृद्ध की और श्रुति की बातों से लोगों में भी दिलचस्पी जाग उठी थी। सहयात्री भी जिज्ञासा से सुनने में तल्लीन हो गये। श्रुति अपने मकसद में सफल हो चुकी थी। बूढ़ा चांद खां अर्थात~ वृद्ध अब तक काफी सिमट चुका था और वृद्धा भी सिकुड़ गई थी। श्रुति बेहतर बैठी हुई थी।
वृद्ध उसके शिष्ट अंदाज और सम्मान से सम्मोहित हो चुका था। वृद्ध कह रहा था- ‘‘बेटी, मैंने दोनों जमाने देखें है। ये भी और वो भी। दोनों का नमक खाया है, गलत नहीं कहूंगा......’’ उसके पोपले मुंह से निरंतर उफनता थूंक......टच्च!....सीं.....’’उसके छींटे लगातार श्रुति तक पहुंच रहे थे और वह लगातार थूक के सूक्ष्म कणों को रूमाल से पौंछ रही थी।
इस स्थिति में श्रुति के मन के एक कोने ने उसे धिक्कारा पर उसने सुनी की अनसुनी कर दी। इधर वृद्ध संस्मरण सुना रहा था - और उधर मन अपनी ही उधेड़बुन में लगा था। सुख भोगने का आदी शरीर जब तकलीफ में होता है तो ऐसे में मन की कौन सुनता है। पर मन तो मन है। मन के कोनों में तीखी चोंचे उभर आयी और चंहु ओर से वे तन पर गिद्ध प्रहार करने लगी।
इधर श्रुति के मन में अन्तद्र्वंद मचा हुआ था और उधर वृद्ध अपनी दरबारी नौकरी के संस्मरण सुनाने में तल्लीन था। मानो उसे मन चाही मुराद मिल गई हो। तभी मन ने कुतर्क किया, ‘अरे, बूढ़े से बतियाता ही कौन है? और फिर तुम जैसी पढ़ीलिखी, मॉडर्न.....इसका इतना मान दे रही हो। वह इसकी इज्जत अफजाई नहीं तो और क्या है? फिर आज के युग में तसल्ली से सुनने वाला श्रोता इसे मिलेगा ही कहां?’ मन ने व्यंग्य का तीर खींचा। बूढ़ांे से बात करना, उनका अतीत सुनना अब इतना धैर्य व दिलचस्पी किसे है? कई नये आकर्षणों से जमाना भरा पड़ा है। आजादी की सुकून भरी स्वतंत्रता युक्त सांस लेते कौन भला इस पुराने गुलामी के इतिहास को सुनना पसंद करेगा?’
मन ने फिर कचौटा, ‘अगर बैठने की विवशता नहीं होती तो क्या तुम इस तरह यह सब सहन करती?’ मन के इस प्रश्न के आगे वह निरूत्तर हो उठी। उसने पहलू बदला और अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया। चूंकि उसके लिये बैठना महत्वपूर्ण था और इसके लिये वृद्ध का लगातार बातों में उलझे रहना नितांत आवश्यक। एक पल वह रूका नहीं कि फिर पीछे खिसक आयेगा और वह मुश्किल में..........
उधर मुंह किये ही उसने उसे फिर कुरेदा, ‘‘अच्छा! ये बताये आपने ड्राइवरी सीखी कहां से?’’ लोग कौतूहल से अब श्रुति को देख रहे थे। वे अपने मन में अब तक यह भ्रम पाल चुके थे कि वह किसी अखबार से रिश्ता रखती हैं। उसका वृद्ध से साक्षात्कार लेने का ढ़ंग दूसरों की नजरों में उसे महत्वपूर्ण बना रहा था। तभी भावुक हुआ एक युवा लड़का उठ खड़ा हुआ, श्रुति के लिये-
‘‘आप यहां बैठिये मेडम।’’ वह बिना अचकचाए, सहजता से उसकी खाली हुई सीट पर काबिज हो गई।
इधर वृद्ध अपना साक्षात्कार बड़ी संजीदगी से दिये जा रहा था जिसे बीच में ही अद्र्धविराम देते हुए उक्त युवक ने श्रुति से प्रश्न किया- ‘‘मेम आप किस अखबार या प्रेस से.....?’’ श्रुति मुस्कुरा दी. क्या बोले? पर चुप भी तो नहीं रहा जा सकता था। ऐसे में एक उपाय उसके जेहन में कौंधा - उसे भी प्रश्न में उलझाने का।
‘‘हां, एक कार्यक्रम की कवरेज करने.......’’आधा सच और आधा झूठ बोलते हुए श्रुति ने उससे भी प्रश्नांे की शुरूआत कर डाली।
‘‘अच्छा इन्टरव्यू लेती हूं मैं?’’ बदले में वह युवक मुस्कुरा दिया। ‘‘क्या करते हो तुम?’’ युवक उसे संजीदगी से बताने लगा- अभी उसने एम.ए. किया है इतिहास में। जॉब ढूंढ़ रहा है। थोड़ा बहुत कम्प्यूटर भी जानता है। छ: माह का डिप्लोमा कर रखा है उसने। घर में अब उसका कमाना बहुत जरूरी हो गया है। अगर श्रुति कोई मदद कर सके तो वह कुछ भी काम कर सकता है।
‘‘अब कपासन कितना दूर है?’’ बात गम्भीर मोड़ लेने लगी थी। अब श्रुति ने बात का रूख बदला।
‘‘बस अब आने ही वाला है बेटी। कुछ देर का और सफर है।’’ जवाब चांद खां ने दिया। श्रुति ने अपना मुख उधर घुमा लिया। इस पर अपनी जिन्दगी का सफरनामा फिर जारी कर दिया-
‘‘एक बार की बात है बेटी जब एक अंग्रेज अफसर दरबार के यहां मेहमान बनकर आया था और मैं गाड़ी चला रहा था। तब हम मुंह
अंधेरे ही शिकार के लिये निकल पडे़ थे। ये अंग्रेज भी....हुआ क्या? कहते हुए उसके बूढ़े मुंह से हंसी गुदगुदा उठी। साथ ही थूक के कई बड़े बगुले हवा में उछल पड़े।
छि: ! श्रुति घिन से खिड़की से बाहर देखने लगी। अब वह आराम से बैठी हुई थी। पूरी जगह में पसर कर। इस आराम के मिलने के बाद बेख्याली जो हावी हुई तो बाहर के भागते प्रक्रति के नजारे उसे मोहक दिखने लगे।
उसकी दृष्टि सूर्य पर केन्द्रित हो गई। वह अस्ताचल की ओर जा रहा था। निरंतर एकटक देखते रहने से वह हरा नजर आने लगा था। बस आसमां में थोड़ी सी जगह के लिये निरंतर घूर्णन करता हुआ।
इधर चांद खा अपने में तल्लीन अब भी अपनी बात जारी रखे हुआ था। उसे लग रहा था जैसे श्रुति अब भी उसकी बात सुन रही हैं।
श्रुति का मुकाम करीब आने लगा था। उधर वह युवा लड़का उसका कोई सम्पर्क सूत्र पाने के लिये अधीर हुआ बोला-
‘‘मेम आपका फोन नंबर....पता....वगैरह...’’और वह जेब में पेन खोजने लगा। तभी एक झटका सा लगा। बस मोड़ घूम रही थी। खड़ी सवारिया संभलने की कवायद करने लगी। अंत में एक धक्का और पीछे देती हुई बस अपने गतंव्य पर जाकर रूक गई। युवक संभलते ही शीघ्रता से बोला- ‘‘शायद पेन कहीं गिर गया है।’’
श्रुति ने उतरते हुए कहा- ‘‘हां.... हां ..... मैं तुम्हें अपना कार्ड भेज दूंगी।’’

Saturday, July 31, 2010

बेटी की सगाई पर



बेटी की सगाई पर
पगलाया मन
बर्फ की चादर हटा
खिल आये यादों के सुमन
सुधारस पगी
मन की फांकों
से टपकने लगा
शहतूती रस
अमृत घोलती
वाणी का मिठास
बोलने लगा था यूं
कहो-
दोगी जीवनभर साथ
कशोर वय को
कुंआरे मन को
सगाई की रस्म में
अगूंठी की परिधि से टांकना
या था हाईवे से
पगडण्डी का ये इशारा
अठ्ठाईस बरस पीछे
छूटा था जो समंदर
आज फिर
नई गहराई को नाप रहा
‘जीवनसाथी’ शब्दार्थ की
किश्ती को ‘ताप’ रहा
जीवनभर का साथ
संकल्पों से भरा
यह अनूठा विश्वास
कहो- दोगे जीवनभर साथ ?

Monday, July 26, 2010

माटी का रंग 3



कहानी का अंतिम भाग:

दोनो स्त्रियों को इस तरह रोते बिलखते देख हाहाकार मच गया।
कुछ ही देर बाद सिकन्दर और विक्रम कच्छे पहने भीगे हुए नंगे बदन सामने खड़े थे। दोनो ने अपने अपने बच्चों को छाती से चिपटा लिया और बेहताश चूमते हुए दीवानों की तरह रोती जा रही थी।
‘‘मेरे लाल!....’’
‘‘मेरे नूर!....’’ दोनो माताएं डसूके भरने लगी।
‘‘ये दोनो आपके बच्चे है....? बड़े साहसी बच्चे हैं। इतने बच्चों में केवल ये ही तैरना जानते थे। इन्होंने ही अपनी जान पर खेलकर डूबते बच्चों को बचाया है।’’
गुलनारा और शारदा को शिक्षक की बात पर एकाएक विश्वास नहीं हुआ।
‘‘इन्होंने डूबते बच्चों को बचाया है?’’ दोनों के मुंह से एक साथ निकला।
‘‘हां, केवल तैरना ही नहीं बल्कि यूं कहो दोनो सिद्ध गोताखोर हैं। बाहर से मदद मिले जितने तक तो ये अपनी जान पर खेल गये।’’
दोनो एकटक उन्हें निहारने लगी।
‘‘मम्मी, गुलनारा मौसी ने ही तो सांस रोक पानी में डुबकी लगाना सिखाया था हमें।’’
‘‘और मम्मी शारदा खाला ने ही तो डूबने वालों को बचाना सिखाया था हमें। विपरीत धारा में तैरना हम आप दोनों से ही तो बचपन में सीखे थे।’’
‘‘बचपन की सीख तुम्हे याद है?’’ वे आश्चर्य से बोली।
‘‘हां क्यूं नहीं भला। आप दोनों शायद भूल गई है पर हम नहीं भूले।’’ दोनों एक साथ चिहुंक उठे।
अब वे दोनों एक दूसरे से गिले शिकवे शिकायत करने लगी -
‘‘तू क्यों नहीं बोलती थी मुझ से....? तुझे क्या हुआ था?’’
‘‘मैं नहीं बोली तो क्या हुआ? तू भी तो नहीं बोली थी। झगड़ा तो हिन्दू और मुसलमान के बीच हुआ था। हमारे बीच तो नहीं।’’
‘‘तेरे और मेरे बीच एक ही माटी की गंध थी तो ये बैर कहां से आ बसा?’’
‘‘हम दोनों एक ही माटी की है जिसका रंग हमारे बच्चों में भी उतर आया। फिर बता हम क्यों इत्ते साल जुदा जुदा रही? दोनों आंसुओ से तरबतर चेहरा लिए एक दूसरे से प्रश्न करती हुई पूछती रही थी पर दोनों ही निरूत्तर थी। दोनों के पास तो क्या वहां खड़ी भीड़ के इतने लोगो के पास भी क्या, किसी के पास इस यक्ष प्रश्न का उत्तर नहीं था।

Saturday, July 17, 2010

माटी का रंग 2


‘‘लां कहां है इमली?’’ चिहुंक कर बोली थी गुलनारा
साड़ी के पल्ले में बंधी इमली निकाल कर शारदा ने आधी इमली गुलनारा को दी व आधी मुंह में रख ली। ‘‘जब भी ‘जी’ मचले तो मैं यहीं मुंह में रख लेती हूं।’’
उंई मां! कहती हुई गुलनारा ने एक आंख बंद कर ली। ‘‘बहुत खट्टी है।’’
‘‘पगली कहीं की! इमली खट्टी नहीं तो क्या मीठी होगी।’’
‘‘नमक साथ लाती तो अच्छी लगती।’’
‘‘कल ले आऊंगी।’’
‘‘चल वादा कर हम दोनों यहां मां जायी बहनों की तरह रहेंगी।’’
‘‘वादा लेती हूं, अपने सुख दुख साझी होगे।’’
हुआ भी कुछ वैसा ही। मुस्तफा की जीप में दोनो बारी बारी से अस्पताल पहुंची थी। रमेश के स्टाफ मेम्बर होने का लाभ दोनो को मिला। दोनो के बेटे हुए - सिकन्दर और विक्रमादित्य। बच्चे बड़े हुए। स्कूल जाने लगे। इसके साथ ही समय बहुत बदलाव लाया। गांव छोटे कस्बे में तब्दील हो गया। बिजली आ गई। पानी की टंकी बन गई। टंकी बन जाने से घरों में नल आ गये। नल आ गये तो गुसलखाने बन गये। अब कोई नदी पर नहाने व कपड़े धोने क्यों जाता भला? घर में ही बहुत सारा पानी था। अन्य गांवों की भांति इस क्षेत्र में भी संचार क्रांति हुई। देश विदेश से जुड़ी खबरे यहां भी पहुंचने लगी। घटना कहीं भी घटती, दरवाजे के भिन्न नाम समर्थकों पर अपना पूरा असर दिखाती। नफरत की दीवारे ऊंची खिंचने लगी थी। ऐसा लगने लगा था जैसे एक ही गांव के दो विभाजन हो गये हो। इंसान, इंसान को फूटी आंख नहीं सुहा रहा था। ऐसे में 6 दिसंबर को भारत में एक घटना घटी। जिसने पूरे देश को हिला दिया था और उसके बाद -
एक दिन कस्बे में दंगा हो गया। हिन्दू और मुस्लमान के बीच फैले जहर ने इस कस्बे को भी अपनी चपेट में ले लिया। कुछ दुकाने जला दी गई। सामान लूट लिया गया। कई घायल हुए। किसी का सिर फूटा, किसी का हाथ टूटा तो किसी का पांव। छुरेबाजी व लाठीभाटा जंग दोनो ओर से हुई। बन्दूकों की नाल ने छर्रे भी उगले। एक छर्रा एक जने के सिर पर लगा और उसकी घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई। सरकारी फाइलों में इस गांव को संवेदनशील क्षेत्र आंका गया। गांव में पहली बार कफ्र्यू लगा। सांय सांय करते गांव में पुलिस बल बढ़ा दिया गया। पुलिस गश्त के जूते अंधकार को चीरने लगे।
इतना ही नहीं हुआ बल्कि गुलनारा और शारदा की दोस्ती को भी गzहण लग गया। क्योंकि मुस्तफा की रोजी रोटी का एकमात्र जरिया उसकी जीप दंगों की भेंट चढ़ गई थी। दंगाइयों ने उस पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी थी। अब वो बेरोजगार घूम रहा था। शारदा का पति रमेश हमेशा के लिए लंगड़ा हो गया था। उसकी टांग में छर्रा लगा था। छर्रा सीधा टांग की हड्डी में जा घुसा था। हजारों रूपये इलाज में फूंकने के बाद भी वो लंगड़ा कर चलता था। शारदा और गुलनारा के बीच अबोला हो गया था। इस अबोले का कारण यहीं दंगा था। गुलनारा तमाम हिन्दुओं को दोषी मानती थी और शारदा तमाम मुस्लिम सम्प्रदाय को। बरस गुजर गये पर उनके मनों में पैदा हुआ ये मैल कम नहीं हुआ।
एक दिन स्कूल में खेल प्रतियोगिता हुई। जीते हुए छात्रों को आगे जिला स्तर पर खेलने के लिए स्कूल मिनीबस का इंतजाम हुआ। उस दिन सिकन्दर और विक्रम को भी जाना था। बस बच्चों के इंतजार में खड़ी थी। गुलनारा अपने सिकंदर को और शारदा अपने विक्रम को छोड़ने आयी। दोनों की नजरे चार हुई पर वे मुस्कुरायी भी नहीं। अनजान बनी एक दूसरे को देखा और बात खत्म। जैसे जानती ही नहीं हो। बच्चों से भरी बस रवाना हुई। दोनो ने हाथ हिला हिलाकर बच्चो को अलविदा किया और दोनो ने अपनी अपनी राह पकड़ ली। दोनो की राह जुदा जुदा थी। एक पूरब की ओर तो दूसरी की पश्चिम की ओर।
अभी बस को निकले आधा घंटा भी नहीं गुजरा था कि बदहवास गुलनारा ने अपनी छत से खड़े होकर जोर जोर से शारदा को पुकारना शुरू किया।
‘‘शारदा कहां है तू.....या अल्लाह हम लुट गई.....’’
शारदा दौड़ी दौड़ी छत पर पहुंची। देखा तो गुलनारा अपने होशो हवास में नहीं थी। उसने नजरों ही नजरों में पूछा ‘क्या हुआ?’
दोनो हाथ से छाती पीटती हुई वह फिर बिलख उठी और बड़े ही कातर स्वर में उसका रूदन जारी था - ‘‘ओ मेरे लाल......हमारी गोद उजड़ गई शारदा......हाय! सिकन्दर....’’
‘‘क्या बक रही है तू कुछ होश में है?’’शारदा ने गुलनारा को लताड़ा।
‘‘कुछ सुना तूने....’’ और वो फिर बुक्का फाड़ कर रोने लगी।
‘‘बता भी क्या हुआ है?’’
तब उसने एक ही सांस में पूरा हादसा बयान कर दिया। उनके बच्चों से भरी बस पलटी खा गई और सड़क के किनारे की झील में गिर गई। बच्चे पानी में डूब गये। इतना सुनना था कि शारदा भी जल बिन मीन की भांति तड़प उठी।
‘‘हाय राम! क्या कह रही है तू.......’’और वो भी वहीं जमीन पर बैठ गई और जोर-जोर से हाथ पांव पटक-पटककर रोने लगी। दोनो तरफ भीड़ जमा होने लगी थी। रमेश भी घर पर नहीं था और मुस्तफा भी कहीं बाहर गया हुआ था।
‘‘चल दोनो चलते है।’’ दोनो एक दूसरे को पुकारा और नंगे पैर दौड़ी। रिक्शे में बैठ कर वे एक साथ घटना स्थल पर पहुंची।
वहां लोगों की भीड़ जमा थी। चारों तरफ आफरा-ताफरी मची हुई थी। दोनो हाथ पकड़े हुए भीड़ को चीरती हुई आगे बढ़ी। वहां बच्चों का सामान पड़ा हुआ था।
‘‘ये मेरे सिकंदर के जूते हैं।’’ जूतों को सीने से चिपटाये गुलनारा फूट पड़ी।
‘‘ये कपड़े मेरे विक्रम के है.....’’शारदा कपड़ों को वक्ष से चिपकाये पछाड़ खाने लगी।


क्रमश : अगली पोस्ट में

Wednesday, July 14, 2010

माटी का रंग

‘छपाक!’ की आवाज हुई और कई पानी की बूंदे इधर-उधर, चारों ओर उछल गई। इसके साथ ही वह घूमी और गुस्से से दांत पीसती हुए चीखी - ‘‘कौन है ये बेशरम......?’’
दूसरे ही पल उसकी नजरे पानी के छींटे उड़ाने वाली से मिली और वो स्तब्ध रह गई। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। फिर उसके मुंह से फूटा - ‘‘अरी शारदा तू........यहां............?’’
‘‘म्हें भी यही पूछूं हूं, तू यहां कैसे?.........गुलनारा ही नाम है न तेरा।’’ वह इत्मीनान करती हुई पूछने लगी। उसने ‘हां’ में गर्दन हिलायी। दोनों मुस्कुरा उठी।
पहचान में भी एक अपनापन होता है और ये अपनापन उस समय और भी बढ़ जाता है जब एक ही शहर के दो व्यक्ति कहीं अन्यत्र मिलते हैं आने शहर में रहते हुए चाहे वे आपस में कभी न बोले हो पर अन्य जगह की बात ही कुछ ओर है। वहां अपने ही शहर के व्यक्ति को देख कर विश्वास से भरा जो अपनेपन का भाव पैदा होता है उसकी आत्मीयता निराली होती है। जाति, वर्ण, वर्ग, रंग सब भेदभाव भूलकर वे अपने बन जाते हैं। यहां भी यही दृष्टिगोचर हो रहा था। गुलनारा और शारदा एक दूसरे का हाथ पकड़कर वहीं नदी किनारे बने कच्चे घाट पर बैठ गई जैसे कभी गहरी मित्रता रही हो।
बरसात के दिन थे और सरणी नदी पूरे उफान पर थी। चारों तरफ फैली हरीतिमा ने वातावरण को खुशगवार बना दिया था। वहीं घाट के पत्थर पे कपड़े धोती हुई आपस में बतियाने लगी -
‘‘तेरी शादी कब हुई?’’ शारदा ने पूछा।
‘‘पिछले बरस ही और तेरी.....?’’
‘‘पूरे आठ महीने और दस दिन हुए है। तेरा वो क्या करै रे?’’
‘‘ड्राईवर है, जीप चलावै है और तेरा वो....?’’
‘‘अभी कम्पाऊंडरी में पढ़े है.......ऐं गुलनारा, तुझे बच्चा हुआ?’’
नहीं कहकर गुलनारा हंस पड़ी। ‘‘तेरे कुछ है...?’’
उसने ‘ना’ में गर्दन हिलाई और दोनो हंस पड़ी।
‘‘तू भी नीली बट्टी से कपड़े धोवै है?’’
‘‘हां, मेरे उसको यहीं पसंद है।’’ कहते हुए उसने पेंट को पछाड़ना शुरू किया। फलस्वरूप साबुन के झाग मिले पानी के छींटे उड़ने लगे।
‘‘ऐं.......ऐं.....देख छींटे मत उड़ा। ठीक से कपड़े धो। कहीं छींटा लगे, यह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। ये तो तू मेरे शहर की है जो तुझे कुछ नहीं कह रही हूं। अगर तेरी जगह कोई ओर होती तो निगोड़ी की चुटिया पकड़ यहीं पछाड़ देती....।’’
‘‘ऐं.....ऐं.....किसे धमकावै है तू। मुझे कोई ऐसी वैसी डरपोक, कच्ची खिलाड़ी मत समझना। धोबी की बेटी हूं। बरसों से पुरखो ने नैं-नैं घाट पे कपड़े धोये, पछाड़े और निचोड़े हैं। ये तो तू है मेरे पीहर से जो लिहाज कर रही हूं। वरना ससुरी की एक टांग पकड़कर ऐसा घुमाती कि चक्करघिन्नी बनी नजर आती.....’’और हीं-हीं कर हंसने लगी।
‘‘तू धोबी की बेटी है तो मेरी रगों में भी खालिस पठान का खून बहता है। मेरा कब्बड्डी खेलना याद है कि नहीं तुझे? था कोई मेरा जोड़? हमेश कक्षा को जिताया था मैंनें........।’’
‘‘चुप कर। हम ‘अ’ अन्दर और तू ‘ब’ बन्दर थी।’’ कहकर शारदा फिर हंसने लगी। शारदा को हंसता देख गुलनारा को भी हंसी आ गई। ‘‘आगे-आगे बन्दर पीछे-पीछे रामचन्दर’’ दोनों एक साथ बोली। शारदा ने गुलनारा की ओर पानी उछाला तो गुलनारा कहां पीछे रहने वाली थी। उसने भी पानी में जमकर हाथ चलाये और बौछारे शुरू कर दी। फिर तो मानो वे उन्हीं स्कूली दिनों में लौट आयी थी। दोनों एक दूसरे पर पानी उछालती हुई वर्तमान को पीछे धकेल बचपन में लौट आयी। हाथ पकड़कर पानी में ‘डुबकी’ खाने लगी। तैरने लगी कभी सीधी तो कभी उल्टी होकर, पानी में किलौलें करने लगी।
जब वे पानी से बाहर निकली तो एक दूसरे के सिरों पे गीले कपड़ों से भरे तगारे रखने में मदद करने लगी और फिर साथ-साथ चल पड़ी। शारदा का मकान पहले आ गया। गुलनारा ने भी उसकी घर के बाहर बनी चबूतरी पर अपना सिर का बोझ उतार विश्राम लिया।
‘‘आ अंदर आ।’’ शारदा मनुहार करती हुई कहने लगी।
‘‘उं हूं! आज नहीं। तू इतनी कड़वी जुबान की क्यों हैं?’’
‘‘तेरी जुबान में कौन सी गुड़ की डली है?’’
फिर दोनो एक साथ खिलखिला कर हंस पड़ी।
यह सही था कि शारदा और गुलनारा दोनो ही सरकारी स्कूल में, एक ही कक्षा में पढ़ती थी। पर दोनो के ‘सेक्शन’ हमेशा अलग रहे थे। एक अ में थी तो दूसरी ब में। आठवीं तक दोनो साथ-साथ पढ़ी पर शायद ही उनमें कभी बातचीत हुई हो किन्तु यहां आकर उनमें एक अलग सा ही अपनापन पैदा हो गया। जिसका कारण था दोनो का एक ही शहर का होना। ससुराल का गांव चाहे छोटा था किन्तु यहां वो अपनापन किसी के साथ नहीं जुड़ पाया था जो शारदा को गुलनारा में और गुलनारा को शारदा में मिला था। उनकी प्रगाढ़ता समय के साथ बढ़ने लगी।
यह भी संयोग की बात थी कि दोनो के मकान के पिछवाड़े की छत मिलती थी। जब वे काम निपट जाती तो एक दूसरे को छत पर ककंरी डाल चलने का इशारा कर देती थी। वे साथ-साथ कपड़े धोने व नहाने आती। यहां नदी किनारे जो स्वतंत्रता उन्हें मिलती थी वह पिछवाड़े के पड़ौसी होने के बावजूद भी नहीं थी। पहले जी भर के वे चंगा-बित्तू खेलती फिर कपड़े धोती और नहाती थी।
जहां दोनों कपड़े धोती व नहाती थी वो त्रिवेणी संगम का किनारा था। बेड़ावल के जंगलों से जो बूढ़ी नदी बहकर आती थी। यहीं आकर लोड़ी नदी से मिल जाती थी। यहां आकर नदी का पाट कुछ चौड़ा हो जाता था और उसके बहाव की रफ़्तार भी धीमी हो जाती थी। दोनो नदियों का पानी जब मिलकर आगे बढ़ता था तो वे सरणी नदी कहलाती थी। इसी सरणी के किनारे किनारे आबादी बसी हुई थी। एक ओर मुस्लिम बहुल आबादी थी तो दूसरी ओर हिन्दु बहुल। दोनों आबादी को विभाजित करता बीच में सीना ताने खड़ा था - खंडित, जर्जर एक प्राचीन दरवाजा। इस दरवाजे के जर्जर कंगूरे देख सहज ही अनुमान लगया जा सकता था कि ये कभी बेहद सुन्दर रहा होगा। प्राचीन वास्तु शिल्प के साक्षी इस दरवाजे की प्राचीर के एक भाग में मजार थी और दूसरे भाग के छोटे आलिये में हनुमान मूर्ति। उपेक्षित पड़े इस मजार और मूर्ति को कोई नहीं पूछता था।
समय बदला तो बहुत कुछ बदला। ‘इस दरवाजे का जीर्णोद्धार हो’ इस पर पूरा गांव एकमत था। बस उनमें केवल उसके नाम को लेकर मतभेद था। मुसलमान अपनी पसंद का नाम देना चाहते थे जबकि हिन्दू अपनी पसंद का। दोनो समुदाय में इस बात को लेकर जब तब उलझन लगी रहती थी। कुछ समझदार लोग ये भी समझाते थे कि नाम में क्या रखा है, ये तो पुरखों की धरोहर है इस का नाम इस गांव के नाम पर या नदी के नाम पर रख दो। पर कुछ स्वार्थी लोग शान्ति रहे ऐसा कहां चाहते थे। अवसर आने पर भड़काते रहते थे।
इधर हिन्दू सर्मथकों ने दरवाजा पुनर्उद्धार की एक समिति बना ली। रातों रात गांव के उस सिरे पर भी मिटिंग हुई और मुस्लिम समर्थकों की कमेटी गठित हो गई। दोनो पक्ष कार्यवाही करने लगे। सरकार ने मौका मुआयना करने एक दल भेजना तय किया।
इसके बाद रातों रात मजार पर हरी चादर चढ़ गई। लाल गुलाब और मोगरे के फूल सज गये। जलती हुई अगरबत्ती की धूप वातावरण में फैलने लगी। इसके दो रोज बाद ही हनुमान भक्तों को इस टूटे खण्डहर वीरान पड़े उपेक्षित हनुमान लल्ला की याद हो आयी। अब यहां भी पूजा, धूपबत्ती, दीपक, सिन्दूर-मालीपन्ना, फूलमाला चढ़ने लगी। धीरे-धीरे दोनो ओर भक्तों की संख्या बढ़ने लगी। मंगलवार रामबोले हनुमान के यहां भीड़ जुटती थी तो शुक्रवार सुल्तान हाजी पीर की मजार पर। हरी लाल ध्वजाएं हवा में लहराने लगी तो इसके साथ ही भीड़ भी बढ़ने लगी। अब कुछ फूल वाली मालिने भी अपने टोकरे लिए यहां बैठने लगी। कभी कभार मूंगफली वाले, चाट पकौड़ी के थैले वाले थी यहां आने लगे। पान के केबिन का ढ़ांचा भी खड़ा हो गया है और तो और अब तो यहां उर्स भी भरने लगा। हनुमान जयन्ती मनने लगी। अन्नकूट पर भोग भी लगने लगा।
दरवाजे के उस पार और इस पार का तनाव दिनों दिन पैर पसारता जा रहा था। इन सब से बेखबर त्रिवेणी संगम पर गुलनारा और शारदा की दोस्ती परवान चढ़ती जा रही थी। उनके चंगा-बित्तू खेलने के दिन अब लद चुके थे। अब तो उनकी गोद जीते जागते खिलौनो से भरने वाली थी।
‘‘दो दिन से तू आज आयी है?’’
‘‘क्या करूं जी मचलता है। कुछ अच्छा नहीं लगता।’’
‘‘इमली खायेगी?’’
क्रमश : अगली पोस्ट में

Friday, May 28, 2010

जिन्दगी यहां


हर कदम से ताल मिला ले
ऐसी भी आसान नहीं है जिन्दगी यहां
पल पल मरकर भी
जीते है लोग
ऐसी भी लाचार नहीं है जिन्दगी यहां
नफे नुक्सान का हिसाब न मांगे
ऐसी भी बेजुबां नहीं है जिन्दगी यहां
अरे हंसने वालो
सिसक सिसक कर दम तोड़ती
है जिन्दगी यहां
अपनी राते काली कर
महफिल रोशन करती है जिन्दगी यहां
मां बहन बेटी बीबी नहीं
सिर्फ औरत बनकर
बिस्तर की सलवटे
बनती है जिन्दगी यहां

Saturday, May 8, 2010

Mother's Day

Posted by Picasa

कहां खो गये

जागे थे भाग कभी
बजे ढ़ोल, बंटे बताशे भी
लोरी और पालने के स्वर भी वहीं
फिर आज न जाने वे नन्दलाल कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

नहला धुलाकर
साफ-सुथरे कपड़े पहना
लगा दिये थे तूने काजल के टीके
फिर आज न जाने वो झूलेलाल कहां खो गये ?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

कई दौरो में
ऐसा भी इक दौर आया
तब मां मैंने तुझे खूब नचाया था
फिर आज न जाने सारे चुम्बन कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

पुरवाई चली जोरसे
या बिजली ने ली अंगड़ाई
दुबके सिमटे ये उत्पाती पतंगे
फिर आज न जाने किस छोर में कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।


टिफन और तरकारी
के ताने बाने बुना करती थी
भोर सवेरे में
फिर आज न जाने वो सितारे कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

सुनो विशाखा की मां
आओ तो दिलावर की अम्मा
सम्बोधन के तार
फिर आज न जाने ढ़ीले कहां से हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

पल्लू में लिपटे
पल्लू छूटे तो दुख सताये
तुझे बिन बताये
फिर आज न जाने वे छैने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

डांटकर तो कभी
पुचकार कर तूने सिखाये थे
चाहत के सबक
फिर आज न जाने वे सबब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

झरबेरी हो चाहे
खट्टी-मीठी, तेरी नयनों का मधु
बरसा था दिनरैन
फिर आज न जाने तेरे दीवाने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।


तूने जनी संताने
गूंजे भी थे तेरे घरोंदे
खामोश सदा के लिए
फिर आज न जाने ये वीराने क्यों हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

आंचल को फैलाये
तूने तो ढ़क दिये थे
सबको गिन गिनकर
फिर आज न जाने सभी शावक कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

ना कोस किस्मत को
ना दे कर्मो की दुहाई
जमाने की द्रुत गति में
फिर आज न जाने हम सब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

Thursday, April 29, 2010

विश्वास


मैं ‘सुसाईड’ कर रही हूं। मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। कमरे के सभी खिड़की दरवाजे भीतर से बंद कर दिए है और टी. वी. चालू करके उसकी आवाज तेज कर दी है ताकि बाहर मेरे मम्मी पापा को भी किसी तरह की भनक ना लगे कि मैं क्या करने जा रही हूं। मैंने पंखे से साड़ी बांधकर फांसी का झूला बना लिया है और अब इस पर लटकने वाली हूं। लटकने से पहले सोचा आपसे बात कर लूं ताकि अपने आप को निर्दोष साबित कर सकूं। इसमें मेरा कोई दोष नहीं .......
आपके पास किसी का फोन आये और ये कहे तो? इतना सुनते ही आपके होश उड़ जाते। मेरे साथ भी यही हुआ। घबरा कर मैंने उससे कहा- ‘‘रूको, रूको · · तुम कौन हो?’’
‘‘आपने मुझे पहचाना नही? मैं सुखबीर हूं। उस उस दिन बस में आपसे मिली थी। पाली से जोधपुर के सफर के दौरान और वहीं मैंने आपके फोन नम्बर लिए थे। मुझे पता था कभी न कभी आपके फोन नम्बर मेरे काम आयेंगे। और आज जब मैं मरने जा रही हूं तो केवल आपको ही बताना चाहूंगी कि मैं बिल्कुल निर्दोष हूं। उन्होंने बेवजह मुझ पर शक किया और झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्होंने......’’
‘‘अरे! सुखबीर बात क्या हुई ?’’ उसकी बात मुझे बीच में काटनी पड़ी।
‘‘कुछ नहीं मेडम, अब मुझसे सहन नहीं होता। मेरी शक्ति चुक चुकी है। अब एक पल भी मैं जीना नहीं चाहती। मेरे बच्चे का कुछ पता नहीं और मेरा सामान......(सिसकी उभरती है उसकी) वे मेरा सारा सामान पैक करके यहां पीहर छोड़ गये है।’’ यह कहकर वह फूट फूटकर रोने लगी।
बड़ी असंमजस थी क्या कहूं? मैंने कहा -‘‘सुनो सुखबीर तुम सबसे पहले अपना फोन बंद करो। मैं तुम्हें फोन लगाती हूं.................. मैं फोन लगा रही हूं। कहते हुए मैंने फोन काट दिया।
मैंने दीर्घ श्वास खींची। देखा, मेरे सिर से पसीना चुह रहा है और दिमाग सुन्न। दिल जोर-जोर से
धड़क रहा था। याद आया वह पल जब मैं पाली से जोधपुर जा रही थी। मेरे पास पानी से भरी बोतल थी। मेरे साथ वाली सीट पर बैठी युवती की गोद में दो-ढ़ाई बर्ष का बच्चा था। वह बार-बार अपनी मां को तंग कर रहा था। मैंने ध्यान दिया बच्चे की पानी की बोतल खाली हो चुकी थी और शायद वह मेरी बोतल से पानी चाहता था। इसके लिए वह बार-बार अपनी मां को कोहनी मार रहा था।
‘‘क्या चाहिए?’’ बात को समझते हुए मैंने बच्चे से पूछा।
मेरे कहने पर वह कुछ बोला तो नही बल्कि रूठता हुआ मां को देखने लगा।
‘‘पानी चाहिए?’’ मेरे दोबारा पूछने पर उसने गर्दन हिला दी।‘‘यह लो’’ उसकी स्वीकोरक्ति पाते ही मैं अपनी बोतल का ढ़क्कन खोलने लगी। मैं उसे पानी देने को तैयार थी तभी उसकी मां ने कहा-‘‘मेडम, आप थोड़ा ही पानी देना। जब से बस में बैठा है यह पानी ही पी रहा है। पूरी बोतल पी गया है इतने से रास्ते में।’’ उसने थोड़ा पानी लिया और पूछने लगी - आप कहां जा रही है?
-जोधपुर
-वहीं रहती है?
-नहीं अस्पताल का काम है।
-अस्पताल का?
-हां, मेरी समधिन का फोन आया था। उनकी बेटी की प्रसूति होने वाली है।
-तो आप चिकित्सक है?
-नहीं, मेरे पास रहने से उन्हें तसल्ली रहेगी। मुझ पर बहुत विश्वास है उन्हें। विश्वास ही बड़ी पूंजी है। कहते है विश्वास के सहारे आदमी जीता है विश्वास के बिना आदमी मर जाता है।
-बात तो आपकी 100 प्रतिशत सही है।
-विश्वास की इस अहमियत पर मेरी मां अक्सर एक किस्सा सुनाया करती थी। सफर काटने की गरज से मैंने बातचीत का सूत्र आगे बढ़ाया। वह कहती थी, बात उस समय की है जब छप्पन का अकाल पड़ा था। लोगों के घरों में खाने को एक दाना नहीं था। भूखे मरते लोग भूसा खा रहे थे। भूख से बेबस लोग नमक-आटे के बदले अपने बच्चो को बेचने लगे थे। ऐसे दुष्काल से निजात पाने के लिये अब पलायन ही एक मात्र रास्ता था। काफिले के काफिले गांव छोड़कर जाने लगे। ऐसे ही एक दम्पति का बुरा हाल था। चार दिन से बच्चो ने कुछ नहीं खाया था वे लगातार रोटी मांग रहे थे और रोटी थी नही। भोजन के अभाव में उनको बिलबिला कर मरते देखना उनकी बर्दाश्त के बाहर था। इधर सारा गांव खाली हो चुका था। आखिरी काफिला था। लोगों ने उन्हे अंतिम बार साथ चलने के लिए पूछा तब विवश हो उन्हे निर्णय लेना पड़ा। वे जाने लगे तो बच्चों ने उनके तार-तार हुए कपड़े पकड़ लिए। पूछने लगे आप सब कहां जा रहे है? क्या आप रोटी लेने जा रहे है? एक बच्चे ने पूछा तो बेबस माता पिता को बहाना मिल गया और मां ने आंसू रोकते हुए अपने बच्चो से कहा- हां, हम रोटी लेने जा रहे है।
विदा लेते पिता ने कहा- तब तक तुम यहां खेलते रहना। हम जल्दी ही रोटी लेकर लौट आयेंगे।
छ: माह गुजर गये। वर्षा हुई तो समय सुधरा। सुकाल आया तो लागों के काफिले पुन: अपने गांव की ओर लौटने लगे। वह दम्पति भी पहुंचे। दुखी मन से उन्हांेने अपने घर का दरवाजा ठेलना चाहा। जानते थे अब उनका सामना बच्चो से नहीं उनके कंकाल से होगा। वह दरवाजा ठेलते इससे पूर्व ही हंसते-खेलते बच्चो ने माता पिता की आवाज पहचान दरवाजा खोल दिया। बच्चो को सही सलामत पा दम्पति के हर्ष ठिकाना नहीं रहा। अभी वह स्थिति से उबरे भी न थे कि बच्चो पूछा - आप रोटी लाये?
उन्होंने मना कर दिया- हम रोटी तो नहीं लाये। हमें क्या मालूम था कि तुम जीवित....
अभी उनकी बात मुंह में थी कि ‘ना’ सुनते चारो बच्चे वहीं जमीन पर गिर गये। माता पिता ने उन्हें संभाला तो उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
कहने का तात्पर्य है कि छ: महीने तक बच्चे भूखे प्यासे होकर भी इस विश्वास के सहारे जीवित थे कि हमारे मां-बाप आयेगे और रोटी लायेंगे। किन्तु जैसे ही उनका विश्वास टूटा वे वहीं खत्म हो गये। तब से यह बात प्रचलित हुई कि आदमी विश्वास के सहारे जीता है और विश्वास के टूटे मरता है।
आपकी बात बहुत सही है आंटी।’’ उसने भाव विभोर होकर बड़े अपनत्व के साथ उसने मुझे कहा। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही है। मेरा नाम सुखबीर है और यहां पाली में मेरा पीहर है। जोधपुर में मेरी ससुराल है। मेरे पति मेरी जेठानी के कहे पर चलते है। जेठानी मेरे बारे में उल्टी सीधी बाते करके उन्हे मेरे खिलाफ भड़काती है और ये है कि आंख मूंद कर अपनी भाभी की बात को सही मानते है।
-तुम्हारी सास कुछ नहीं कहती?
-जेठानी के आगे सास की भी कुछ नहीं नहीं चलती। बड़ी तेज है वह। सब उससे डरते है। उसकी नजर हमेशा मेरे पति की कमाई पर रहती है। शादी के पहले तो वह सारा पैसा उसको दे देते थे तो चलता था पर अब हमें भी अपनी गृहस्थी बसानी है कि नहीं? इतना कहकर वह रूक गई और मेरी ओर देखा। मेरा समर्थन पाकर वह आगे कहने लगी-‘‘जी आज एक बच्चा है कल को बड़ा होगा। अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए पैसा भी तो चाहिये। आजकल स्कूल वाले डोनेशन मांगते है तब जाकर एडमिशन हो पाता है अच्छे स्कूल में। मेरी बहन को भी पचास हजार देने पड़े थे बबली के एडमीशन के समय । जी क्या क्या बात कहे? आजकल मंहगाई देखो न सुरसा की तरह बढ़ती ही जा रही है। सब दे देंगे तो कहां से लायेंगे पैसा? मांगेगे तो वह तो ठेंगा ही बताने वाली है जी।
मैंने उसे ब्रेक देते हुए पूछा- ‘‘तुम्हारे पति करते क्या है?’’
-जी मेडमजी, सब्जी मार्केट में रेडीमेड कपड़ो की दुकान है। रब की दया से गल्ला भी अच्छा आ जाता है। रोज के पांच-छ: हजार तो घर ले ही आते है। इसी बात को लेकर तो वह कुढ़ती है।
-तुम अलग क्यों नहीं हो जाती? मेरे इस सुझाव पर वह व्यग्रता से झल्ला उठी- ‘‘रे बाबा! अलग की बात मैं मुंह से निकाल भी नहीं सकती। मेरे पति मुझ पर नहीं भाभी पर एतबार करते है। खाना भी उसीसे मांगते है और गल्ला भी उसे ही सौंपते है। मेरी तो हर बात में उन्हें कमी ही नजर आती है। हर बात में कहते है - सुख्खी भाभी से सीखा कर जरा।
‘‘फिर तुम्हें बुरा लगता होगा। गुस्सा आ जाता होगा। और मुंह फुलाकर बात करना बंद कर देती होगी। तब वह तुम्हें मनाते है या नहीं?’’ मैंने उसे हल्का सा छेड़ा।
‘‘नहीं आंटी, जब तक मुझे रूला न ले उन्हें शान्ति नहीं होती। तंग आ गई हूं इस मैं रोज की किच किच से।’’ बातों का सिलसिला जो चला तो वह गंतव्य आने पर ही थमा। मेरे उतरने से पहले ही उसने वायदा लिया था कि मैं उसके फोन का जवाब जरूर दूंगी।
‘‘ठीक है, मैं दूंगी जवाब।’’
.................और आज ये अप्रत्याक्षित रूप से यह फोन.......मैं बड़ी विचित्र स्थिति में अपने आप को पा रही थी। कैसे और क्या किया जाय? वो भी केवल फोन पर। वह कहीं कुछ कर न बैठे इस दबाव के चलते दूसरे ही पल मेरी अंगुलिया उसके फोन नम्बर पर घूमने लगी। एक घंटी के जाते ही सुखबीर ने फोन उठा लिया था।
‘‘हलो आंटी, जल्दी बोलिये।’’
‘‘मरने के लिए इतनी तत्परता? मैंने कड़ाई से पूछा - ‘‘सुखबीर क्या हुआ मुझे सबकुछ विस्तार से बताओ।’’
वह बोली- ‘‘मेरी कोई गलती नही और फिर रोने लगी।’’
-तुम्हारा बेटा कहां है?
-मुझे नहीं मालूम।
-तुम्हारे पति कहां है?
-पता नहीं।
-तुम्हें बिना बताये वह कहीं चले गये है?
-हां।
-जब वह गये तुम कहां थी?
-मैं जयपुर गई हुई थी।
-कौन था तुम्हारे साथ?
-मेरे दीदी जियाजी।
-जाने से पहले पति से पूछा था?
-हां, पर उन्होंने मना कर दिया था।
-फिर तुम क्यों गई?
-दीदी ले गई थी। दीदी के मकान की रजिस्ट्री होने वाली थी। दीदी चाहती थी कि मैं उनके साथ जाऊं।
-लगता है तुम्हारे चले जाने से तुम्हारे पति नाराज हो गये।
वह कुछ नहीं बोली सुबकती रही।
-फिर किया हुआ? जब तुम लौटी तो पति ने झगड़ा किया?
-नहीं · वह सिसक उठी। मेरे लौटने से पहले ही वह मेरा सामान पैक करके मेरे पीहर छोड़ गये। मेरे बेटे और पति को मैंने लौटने के बाद देखा तक नहीं।
-ओह! सुखबीर गलती तो तुमसे हुई है।
-मैंने और गलती? नहीं जी....
-हां सुखबीर, अपने यहां शादी के बाद पत्नी इस तरह पति की इजाजत के बिना चली जाय तो वह बर्दाश्त नहीं करते।
-मैं किसी ओर के साथ तो गई नहीं थी। अपनी दीदी के साथ ही तो गई थी। मेरी इच्छा थी कि मैं भी दीदी का मकान देखूं। ये तो कहीं ले जाते नहीं खुद ही अकेले चले जाते है और वो भी मुझे बगैर बताये तब?
-वो तो ठीक है सुखबीर यह तुम समझ रही हो। किन्तु तुम्हारे पति ने तो इस तरह से सोचा नहीं न। और वह तुमसे नाराज हो गये।
-ठीक है आंटी वो मुझसे ना बोले पर मेरा बेटा? जाने किस हाल में होगा वह.....
-जहां भी होगा सुरक्षित ही होगा। तुम अपनी चिन्ता करो ।
-आप कह रही है तो मुझे भी अब लग रहा है कि इस तरह बिना बताये मुझे भी नहीं जाना चाहिये था। पर इसका मतलब यह तो नही कि वह मुझ पर शक करे और घर से ही निकाल दे। अब चार दिन बाद दीपावली का त्यौहार है। मुझे यहां आस पड़ौस वाले देखेंगे तो क्या समझेंगे। मेरे मम्मी पापा उन्हें क्या जवाब देगे? आपको पता है इस डर के मारे मैं बाहर तक नहीं निकली हूं। बंटी से भी नहीं मिली। कहीं लोग ये ना पूछ ले कि त्यौहार पर तुम इधर कैसे?
-सुखबर प्लीज, तुम लागो कि चिन्ता छोड़ो। एक दो दिन में तुम्हारे पति का गुस्सा उतर जायेगा और वह तुम्हें लेने आ जायेंगे।
-सच! आंटी ऐसा होगा? उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा? फिर तो मैं भी सॉरी बोल दूंगी।
-आज तुम्हे भी तो महसूस हो रहा कि तुमसे कहीं भूल हुई है।
-आं आंटी। उसकी स्वीकारोक्ति के बाद मैंने पूछा- मगर गलती तो तुम अब करने जा रही हो। क्या मरने से इसका समाधान हो जायेगा? और तुम आत्महत्या करके मर गई तो जो शक तुम पर किया गया है उस दोष से कैसे मुक्त हो सकोगी?
वह मौन रही। कुछ पल बाद मैंने कहा- ‘‘अपने को निर्दोष तुम तभी साबित कर सकती हो जब जीवित रहोगी। वर्ना तुम अपने साथ यह झूठा कलंक लेकर जाओगी।’’
-ओह! यह तो मैंने सोचा नहीं था। अब क्या करूं आंटी?
-तुम नार्मल हो जाओ। एक दो दिन इंतजार करो या तो वह आयेंगे या तुम्हारे पास उसका फोन आयेगा। उन्होंने यह सब गुस्से में किया है और तुम भी यह सब गुस्से में ही कर रही हो। गुस्सा करना अच्छी बात नहीं। पति पत्नी में रूठना मनाना तो चलता रहता है।
-देखती हूं।
इतना ही कहा था उसने और फोन कट गया। इसके बाद उसका कोई फोन नहीं आया। मेरे मन में बराबर उथल पुथल लगी रही कि सुखबीर का पति आया या नहीं? उसे बच्चा मिला या नही? कहीं झगड़ा और बढ़ तो नहीं गया। अनेक बुरी बाते मन में घूम रही थी। फिर भी मन में यह विश्वास अपनी जड़े जमाये हुए था कि शुभ शुभ सोचो। अच्छा ही हुआ होगा।
दीपावली धूमधाम से आयी और अपनी रौनक बिखेर कर चली गई।
मैं थोड़ी फुर्सत में बैठी अपने मोबाईल पर आये एस.एम.एस. पढ़+ रही थी। एक हिन्दी में आये एस.एम.एस. पर मेरी नजर पड़ी- ‘दीपावली की शुभकामनाएं’ और नीचे नाम सुखबीर का देख मैं चौंक उठी। क्षणभर में यह सोचकर राहत मिली कि वह जीवित है यानि उसने आत्महत्या नहीं की। दूसरे ही पल मैंने उसका नम्बर डायल कर दिया। उधर से सुखबीर का चहकता हुआ स्वर सुनाई दिया -
‘‘थैंक्यू आंटी। आपके आर्शीवाद से हमारी दीपावली
हुत अच्छी मनी। अब मैं अपने घर आ गई हूं और बहुत खुश हूं।’’
-सही कह रही हो सुखबीर? कहते हुए मुझे अपना स्वर आद्र लगा। ‘‘और वो लड़ाई?’’
-नहीं आंटी हमने अब नहीं लड़ने की कसम खा ली है। उन्होंने मुझसे और मैंने उनसे क्षमा मांग ली है। वो मुझ पर विश्वास करेंगे और मैं उन पर......................