Sunhare Pal

Wednesday, May 11, 2011

गीत


हे परोपकारी भगवन
तू रीते घट भर दे
सूखे ताल तलैया भर दे

पथिको को छैया दे
हे परोपकारी ईश्वर....
सावन को हरियाली दे दे

भादो को रिमझीम दे

पर्वतों को खोये जंगल दे

उजड़ो को बसेरे दे

हे परोपकारी भगवन...

पंछी को अमराईया दे दे

गैया के थन भर दे

रातदिन हेण्डपम्प की

खट पट कम कर दे

हे परोपकारी ईश्वर...

भैया को चबेना को दे दे
तू मैया को घर दे
तिनका तिनका लौटा दे

तू सब पीड़ा हर ले
हे परापकारी भगवन....

Sunday, April 3, 2011



लुक छिप लुक छिप खेली


मेरे संग ओ मेरी साथिन


ओ मेरी सहेली


अब तुम बड़ी हो गई हो


काव्य मधुरिमा


और उषा की चहेती हो गई हो


सलौने शब्दों में गूंथी


मनको की माला सी हो गई हो


कुहके अम्बुए की डाल


मेरे लिए तुम अब पहेली हो गई हो


खिले सुमन सी


अब तुम बासन्ती पल हो गई हो


विचरे रीते मेघ


रूई के फाहे सी धवल हो गई हो


पवन हिंडोले संग


डोलती माझी की नैया हो गई हो


अब तुम बड़ी हो गई हो


विमला भंडारी

Thursday, December 9, 2010

घर, धर्मशाला हो गए

सुबह जब
निन्नी ने आंखें खोली
नौकरी के पाश में बंधी
मां चढ़ चुकी थी किसी द्रुतगामिनी में
पापा की गोद
डस चुकी है उनकी पदौन्नती
अब वह नहीं रहते यहां
शनिवार इतवार के है वे मेहमां
दादी, फूफी सभी
तो मुसाफिर हैं यहां
टेबिल पर सजे
बस्ता, टिफिन और वॉटर बोतल की तरह
रैन बसेरा लेकर
चल पड़ते है सुबह
तभी टेम्पो का भोंपू
चौकस करता है निन्नी को
बॉय-बॉय करती है निन्नी
बेजान दीवारों को
उसके बाद
दिनभर ऊंघता है घर
शाम फिर
मां आती है / रसोई जाग जाती है
निन्नी आती है / आंगन चहक उठता है
भैया आता है / टी.वी. मुस्कुराता है
हर शनिवार इतवार
मुसाफिरखाना बना घर
फिर घर हो जाता है
जो दो दिन बाद
सन्नाटे में खो जाता है
मां चली जाती है
पापा चले जाते है
दादी-फूफी-भैया
सभी चले जाते है
फिर निन्नी को भी
जाना होता है

Tuesday, October 12, 2010

थोड़ी सी जगह



थोड़ी सी जगह
ठीक पौने बारह बस का समय था और वह बज चुकी थी। बस, बसस्टॉप छोड़ चुकी थी और श्रुति बस अड्डे के बाहर ही बस रूकवा कर अंदर चढ़ गई।
नॉन स्टॉप बस में ठसाठस सवारियां भरी हुई थी। कहीं तिल धरने को जगह नहीं थी। ‘उफ! कपासन तक का लम्बा सफर क्या खड़े खड़े तय करना पड़ेगा ?’ यह ख्याल आते ही श्रुति को झुरझुरी फूट आयी। किसी तरह थोड़ा इधर उधर खिसक कर बस की दोनों सीढ़ी ही चढ़ पायी।
‘‘अरे भैया प्लीज यह सामान ऊपर बर्थ पर रख दो.......आप जरा सा पांव हटाइये ये बैग सीट के नीचे आ जायेगा......हां हां ठीक है.....कोई बात नहीं।’’ अपना सामान व्यवस्थित करवा कर श्रुति ने राहत की सांस ली। ‘समय से पहुंचने की मजबूरी नहीं होती तो क्या मैं इस भीड़ में घुसती?’ मन में उठी कोफ्त पर मजबूरी ने अपनी विवशता जमाई। उसने एक पांव पर वजन डालते हुए दूसरे पांव को थोड़ा रिलेक्स किया। रिलेक्स होने के बाद उसकी निगाहें उस भीड़ भरी बस में बैठने की जगह तलाशने लगी। शायद इस उम्मीद में कि कोई उठकर कहें- ‘आइये आप बैठ जाइये।’ हर चेहरा हर निगाह उसे बेगाना लग रहे था। बैठी सवारियां भीड़ की ओर से बेफिक्र हुई अपने में तल्लीन थी। कोई कागज में लिपटे व्यंजन का आनंद ले रहा था। तो कोई आपस में बतिया रहा था। तो कोई आंखे बंद किये ऊंघने में तल्लीन। काश! वह भी बैठे हुए लोगों की श्रेणी में होती। आंख मूंदती और बेफिक्री का सफर करती।
थककर उसने दूसरे पांव पर वजन डाल पहले को रिलेक्स किया। ‘बड़ी भाग्यशाली हो तुम। चाहे कितनी भी भीड़ हो तुम्हें जगह मिल ही जाती है।’ पति द्वारा की गई उक्त टिप्पणी उसे याद हो आयी। ‘हूं!’ उसने दीर्घ नि:श्वास छोड़ते हुए फिर जगह तलाशनी शुरू कर दी। किन्तु आज पति महोदय की ये टिप्पणी सार्थक होती नजर नहीं आ रही थी। तभी श्रुति की नजर दो की सीट पर बैठे दुर्बल देह वाले वृद्ध स्त्री पुरूष पर गिरी। ‘क्या इनसे जगह मिल सकती है?.....शायद। यदि थोड़ा सा खिसक जाय तो......बस थोड़ासा’ मन में पति की टिप्पणी फिर गूंज उठी। वह उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करने लगी। साफ लग रहा था कि वह श्रुति के किसी अनुनय विनय को नहीं मानने वाले। इनसे जगह मिलनी मुश्किल है। अब...? तभी वृद्धा से श्रुति की निगाहें मिली। मन में एक उपाय कौंधा।
‘‘आप कहां से आ रही है?’’ ऐसे अवसर पर स्वर के मिठास के क्या कहने। निराला ही होता है, सो श्रुति भी सफल हुई। ‘‘चावण्ड से’’ संक्षिप्त ही सही। वृद्धा का प्रत्युत्तर पा श्रुति का मन इस भाव से तरंगति हो उठा कि ये अपने ही गांव की है।
‘‘अच्छा, आप वहां कहां रहती है?’’ श्रुति ने आश्चर्य प्रकट किया। मधुरता बकरार रखते हुए उसने वार्तालाप का सूत्र आगे बढ़ाया- ‘‘क्या, मुझे जानती है आप?’’
उसने इन्कार में गर्दन हिलाते हुए कहा- ‘‘नहीं, मेरा वहां पीहर है और बारह बरस की थी जब ही मेरा ब्याह हो गया था।’’ ओह! निराशा से फिर श्रुति का मन बुझ गया। वृद्ध की खीज भरी कसमसाहट से प्रकट हो रहा था कि वृद्धा के साथ हुई वार्तालाप को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। श्रुति के मन ने तेवर बदला। ‘मुझे वृद्ध से बात करनी चाहिये।’
‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’
‘‘कपासन’’ उसने लापरवाही भरी घोर उपेक्षा से कहा। इसके बाद संवाद क्रम टूट गया। थोड़ी चुप्पी के बाद श्रुति ने दूसरे पांव को विश्राम देते हुए पहले पर फिर शरीर का वजन लाद दिया।
हिम्मत बटोर श्रुति ने वृद्ध से थोड़ा खिसकने का अनुरोध -‘‘अगर आपको तकलीफ न हो तो जरासा खिसक जाय। थोड़ी सी मेरे लिये भी जगह निकल आयेगी।’’ उसकी आवाज बड़ी मुलायम थी। उसका असर भी हुआ। वृद्ध थोड़ा आगे पीछे हुआ। पर जगह बहुत ही कम निकाली। हार कर श्रुति ने भी वहीं बैठने का फैसला कर लिया। बहुत मुश्किल से अपना आधा वजन मुड़े घुटनों व एड़ी पर डाल वह आड़ी बैठ पायी।
‘‘क्या आप चावण्ड से आ रहे हैं?’’
वृद्ध निरंतर उसकी उपेक्षा बरते हुए था। शायद उसे, उसके इसी आगzह का डर था। उसके प्रश्न पर प्रश्न पूछने पर वह शुष्कता से बोला- ‘‘हां, वहां मेरी ससुराल है।’’
‘‘अच्छा तो आप हमारे गांव के दामाद है।’’ ढ़िठाई से श्रुति ने कुछ अदा से मुस्कुरा कर मस्का मारा- ‘‘किनके यहां है आपकी ससुराल?’’
‘‘अनवर खां के यहां।’’
‘‘अच्छा-अच्छा वहीं न जो मिस्त्री हैं......जिसका एक लड़का दुर्घटना में....उसने यूं ही अंधेरे में तीर फेंका। परन्तु निशाना सही लगा।
‘‘हां वहीं बदनसीब अनवर खां।’’ बूढ़े की आंखें नम हो आई। इधर वृद्धा भी कुछ हिली।
‘‘अच्छा तो आप ये बताये आप करते क्या हैं?’’ उसने बातचीत का रूख पलटा।
‘‘मैं रोडवेज में ड्राईवर रहा बेटी.....ये देखो मेरा पास।’’ उसने स्नेहयुक्त स्वर में कहा और अपना पास निकाल कर श्रुति को बताया। ‘‘इस नौकरी से पहले मैं दरबार के यहां ड्राईवर रहा।’’ और वृद्धा ने वृद्ध को इशारा किया। दोनों कसमसाए तो श्रुति के लिये ठीक जगह निकल आयी। वह थोड़ा ठीक होते बोली- ‘‘ओह! खूब।’’
उसकी सराहना पाकर वृद्ध का व्यवहार शिष्ट व स्नेहिल हो आया- ‘‘आराम से बैठो बेटी।’’
‘‘पूरी उम्र ड्राईवर की सीट पर मजे से बैठने के बाद अब इस तरह भीड़ में धक्के खाते हुए आपको कैसा लगता है? अपने कुछ संस्मरण सुनाइये न!’’ वाणी में मनुहार भरकर बड़ी अदब से उसने आ़ग्रह किया। तो वृद्ध के झुरियों भरे चेहरे पर पूनम की लुनाई फूट आयी। एकाएक वह महत्वपूर्ण हो उठा था, खुद अपनी ही नजरों में। वह इतिहास के पृष्ठों को पलटते हुए पढ़ने लगा। वृद्ध की और श्रुति की बातों से लोगों में भी दिलचस्पी जाग उठी थी। सहयात्री भी जिज्ञासा से सुनने में तल्लीन हो गये। श्रुति अपने मकसद में सफल हो चुकी थी। बूढ़ा चांद खां अर्थात~ वृद्ध अब तक काफी सिमट चुका था और वृद्धा भी सिकुड़ गई थी। श्रुति बेहतर बैठी हुई थी।
वृद्ध उसके शिष्ट अंदाज और सम्मान से सम्मोहित हो चुका था। वृद्ध कह रहा था- ‘‘बेटी, मैंने दोनों जमाने देखें है। ये भी और वो भी। दोनों का नमक खाया है, गलत नहीं कहूंगा......’’ उसके पोपले मुंह से निरंतर उफनता थूंक......टच्च!....सीं.....’’उसके छींटे लगातार श्रुति तक पहुंच रहे थे और वह लगातार थूक के सूक्ष्म कणों को रूमाल से पौंछ रही थी।
इस स्थिति में श्रुति के मन के एक कोने ने उसे धिक्कारा पर उसने सुनी की अनसुनी कर दी। इधर वृद्ध संस्मरण सुना रहा था - और उधर मन अपनी ही उधेड़बुन में लगा था। सुख भोगने का आदी शरीर जब तकलीफ में होता है तो ऐसे में मन की कौन सुनता है। पर मन तो मन है। मन के कोनों में तीखी चोंचे उभर आयी और चंहु ओर से वे तन पर गिद्ध प्रहार करने लगी।
इधर श्रुति के मन में अन्तद्र्वंद मचा हुआ था और उधर वृद्ध अपनी दरबारी नौकरी के संस्मरण सुनाने में तल्लीन था। मानो उसे मन चाही मुराद मिल गई हो। तभी मन ने कुतर्क किया, ‘अरे, बूढ़े से बतियाता ही कौन है? और फिर तुम जैसी पढ़ीलिखी, मॉडर्न.....इसका इतना मान दे रही हो। वह इसकी इज्जत अफजाई नहीं तो और क्या है? फिर आज के युग में तसल्ली से सुनने वाला श्रोता इसे मिलेगा ही कहां?’ मन ने व्यंग्य का तीर खींचा। बूढ़ांे से बात करना, उनका अतीत सुनना अब इतना धैर्य व दिलचस्पी किसे है? कई नये आकर्षणों से जमाना भरा पड़ा है। आजादी की सुकून भरी स्वतंत्रता युक्त सांस लेते कौन भला इस पुराने गुलामी के इतिहास को सुनना पसंद करेगा?’
मन ने फिर कचौटा, ‘अगर बैठने की विवशता नहीं होती तो क्या तुम इस तरह यह सब सहन करती?’ मन के इस प्रश्न के आगे वह निरूत्तर हो उठी। उसने पहलू बदला और अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया। चूंकि उसके लिये बैठना महत्वपूर्ण था और इसके लिये वृद्ध का लगातार बातों में उलझे रहना नितांत आवश्यक। एक पल वह रूका नहीं कि फिर पीछे खिसक आयेगा और वह मुश्किल में..........
उधर मुंह किये ही उसने उसे फिर कुरेदा, ‘‘अच्छा! ये बताये आपने ड्राइवरी सीखी कहां से?’’ लोग कौतूहल से अब श्रुति को देख रहे थे। वे अपने मन में अब तक यह भ्रम पाल चुके थे कि वह किसी अखबार से रिश्ता रखती हैं। उसका वृद्ध से साक्षात्कार लेने का ढ़ंग दूसरों की नजरों में उसे महत्वपूर्ण बना रहा था। तभी भावुक हुआ एक युवा लड़का उठ खड़ा हुआ, श्रुति के लिये-
‘‘आप यहां बैठिये मेडम।’’ वह बिना अचकचाए, सहजता से उसकी खाली हुई सीट पर काबिज हो गई।
इधर वृद्ध अपना साक्षात्कार बड़ी संजीदगी से दिये जा रहा था जिसे बीच में ही अद्र्धविराम देते हुए उक्त युवक ने श्रुति से प्रश्न किया- ‘‘मेम आप किस अखबार या प्रेस से.....?’’ श्रुति मुस्कुरा दी. क्या बोले? पर चुप भी तो नहीं रहा जा सकता था। ऐसे में एक उपाय उसके जेहन में कौंधा - उसे भी प्रश्न में उलझाने का।
‘‘हां, एक कार्यक्रम की कवरेज करने.......’’आधा सच और आधा झूठ बोलते हुए श्रुति ने उससे भी प्रश्नांे की शुरूआत कर डाली।
‘‘अच्छा इन्टरव्यू लेती हूं मैं?’’ बदले में वह युवक मुस्कुरा दिया। ‘‘क्या करते हो तुम?’’ युवक उसे संजीदगी से बताने लगा- अभी उसने एम.ए. किया है इतिहास में। जॉब ढूंढ़ रहा है। थोड़ा बहुत कम्प्यूटर भी जानता है। छ: माह का डिप्लोमा कर रखा है उसने। घर में अब उसका कमाना बहुत जरूरी हो गया है। अगर श्रुति कोई मदद कर सके तो वह कुछ भी काम कर सकता है।
‘‘अब कपासन कितना दूर है?’’ बात गम्भीर मोड़ लेने लगी थी। अब श्रुति ने बात का रूख बदला।
‘‘बस अब आने ही वाला है बेटी। कुछ देर का और सफर है।’’ जवाब चांद खां ने दिया। श्रुति ने अपना मुख उधर घुमा लिया। इस पर अपनी जिन्दगी का सफरनामा फिर जारी कर दिया-
‘‘एक बार की बात है बेटी जब एक अंग्रेज अफसर दरबार के यहां मेहमान बनकर आया था और मैं गाड़ी चला रहा था। तब हम मुंह
अंधेरे ही शिकार के लिये निकल पडे़ थे। ये अंग्रेज भी....हुआ क्या? कहते हुए उसके बूढ़े मुंह से हंसी गुदगुदा उठी। साथ ही थूक के कई बड़े बगुले हवा में उछल पड़े।
छि: ! श्रुति घिन से खिड़की से बाहर देखने लगी। अब वह आराम से बैठी हुई थी। पूरी जगह में पसर कर। इस आराम के मिलने के बाद बेख्याली जो हावी हुई तो बाहर के भागते प्रक्रति के नजारे उसे मोहक दिखने लगे।
उसकी दृष्टि सूर्य पर केन्द्रित हो गई। वह अस्ताचल की ओर जा रहा था। निरंतर एकटक देखते रहने से वह हरा नजर आने लगा था। बस आसमां में थोड़ी सी जगह के लिये निरंतर घूर्णन करता हुआ।
इधर चांद खा अपने में तल्लीन अब भी अपनी बात जारी रखे हुआ था। उसे लग रहा था जैसे श्रुति अब भी उसकी बात सुन रही हैं।
श्रुति का मुकाम करीब आने लगा था। उधर वह युवा लड़का उसका कोई सम्पर्क सूत्र पाने के लिये अधीर हुआ बोला-
‘‘मेम आपका फोन नंबर....पता....वगैरह...’’और वह जेब में पेन खोजने लगा। तभी एक झटका सा लगा। बस मोड़ घूम रही थी। खड़ी सवारिया संभलने की कवायद करने लगी। अंत में एक धक्का और पीछे देती हुई बस अपने गतंव्य पर जाकर रूक गई। युवक संभलते ही शीघ्रता से बोला- ‘‘शायद पेन कहीं गिर गया है।’’
श्रुति ने उतरते हुए कहा- ‘‘हां.... हां ..... मैं तुम्हें अपना कार्ड भेज दूंगी।’’

Saturday, July 31, 2010

बेटी की सगाई पर



बेटी की सगाई पर
पगलाया मन
बर्फ की चादर हटा
खिल आये यादों के सुमन
सुधारस पगी
मन की फांकों
से टपकने लगा
शहतूती रस
अमृत घोलती
वाणी का मिठास
बोलने लगा था यूं
कहो-
दोगी जीवनभर साथ
कशोर वय को
कुंआरे मन को
सगाई की रस्म में
अगूंठी की परिधि से टांकना
या था हाईवे से
पगडण्डी का ये इशारा
अठ्ठाईस बरस पीछे
छूटा था जो समंदर
आज फिर
नई गहराई को नाप रहा
‘जीवनसाथी’ शब्दार्थ की
किश्ती को ‘ताप’ रहा
जीवनभर का साथ
संकल्पों से भरा
यह अनूठा विश्वास
कहो- दोगे जीवनभर साथ ?

Monday, July 26, 2010

माटी का रंग 3



कहानी का अंतिम भाग:

दोनो स्त्रियों को इस तरह रोते बिलखते देख हाहाकार मच गया।
कुछ ही देर बाद सिकन्दर और विक्रम कच्छे पहने भीगे हुए नंगे बदन सामने खड़े थे। दोनो ने अपने अपने बच्चों को छाती से चिपटा लिया और बेहताश चूमते हुए दीवानों की तरह रोती जा रही थी।
‘‘मेरे लाल!....’’
‘‘मेरे नूर!....’’ दोनो माताएं डसूके भरने लगी।
‘‘ये दोनो आपके बच्चे है....? बड़े साहसी बच्चे हैं। इतने बच्चों में केवल ये ही तैरना जानते थे। इन्होंने ही अपनी जान पर खेलकर डूबते बच्चों को बचाया है।’’
गुलनारा और शारदा को शिक्षक की बात पर एकाएक विश्वास नहीं हुआ।
‘‘इन्होंने डूबते बच्चों को बचाया है?’’ दोनों के मुंह से एक साथ निकला।
‘‘हां, केवल तैरना ही नहीं बल्कि यूं कहो दोनो सिद्ध गोताखोर हैं। बाहर से मदद मिले जितने तक तो ये अपनी जान पर खेल गये।’’
दोनो एकटक उन्हें निहारने लगी।
‘‘मम्मी, गुलनारा मौसी ने ही तो सांस रोक पानी में डुबकी लगाना सिखाया था हमें।’’
‘‘और मम्मी शारदा खाला ने ही तो डूबने वालों को बचाना सिखाया था हमें। विपरीत धारा में तैरना हम आप दोनों से ही तो बचपन में सीखे थे।’’
‘‘बचपन की सीख तुम्हे याद है?’’ वे आश्चर्य से बोली।
‘‘हां क्यूं नहीं भला। आप दोनों शायद भूल गई है पर हम नहीं भूले।’’ दोनों एक साथ चिहुंक उठे।
अब वे दोनों एक दूसरे से गिले शिकवे शिकायत करने लगी -
‘‘तू क्यों नहीं बोलती थी मुझ से....? तुझे क्या हुआ था?’’
‘‘मैं नहीं बोली तो क्या हुआ? तू भी तो नहीं बोली थी। झगड़ा तो हिन्दू और मुसलमान के बीच हुआ था। हमारे बीच तो नहीं।’’
‘‘तेरे और मेरे बीच एक ही माटी की गंध थी तो ये बैर कहां से आ बसा?’’
‘‘हम दोनों एक ही माटी की है जिसका रंग हमारे बच्चों में भी उतर आया। फिर बता हम क्यों इत्ते साल जुदा जुदा रही? दोनों आंसुओ से तरबतर चेहरा लिए एक दूसरे से प्रश्न करती हुई पूछती रही थी पर दोनों ही निरूत्तर थी। दोनों के पास तो क्या वहां खड़ी भीड़ के इतने लोगो के पास भी क्या, किसी के पास इस यक्ष प्रश्न का उत्तर नहीं था।

Saturday, July 17, 2010

माटी का रंग 2


‘‘लां कहां है इमली?’’ चिहुंक कर बोली थी गुलनारा
साड़ी के पल्ले में बंधी इमली निकाल कर शारदा ने आधी इमली गुलनारा को दी व आधी मुंह में रख ली। ‘‘जब भी ‘जी’ मचले तो मैं यहीं मुंह में रख लेती हूं।’’
उंई मां! कहती हुई गुलनारा ने एक आंख बंद कर ली। ‘‘बहुत खट्टी है।’’
‘‘पगली कहीं की! इमली खट्टी नहीं तो क्या मीठी होगी।’’
‘‘नमक साथ लाती तो अच्छी लगती।’’
‘‘कल ले आऊंगी।’’
‘‘चल वादा कर हम दोनों यहां मां जायी बहनों की तरह रहेंगी।’’
‘‘वादा लेती हूं, अपने सुख दुख साझी होगे।’’
हुआ भी कुछ वैसा ही। मुस्तफा की जीप में दोनो बारी बारी से अस्पताल पहुंची थी। रमेश के स्टाफ मेम्बर होने का लाभ दोनो को मिला। दोनो के बेटे हुए - सिकन्दर और विक्रमादित्य। बच्चे बड़े हुए। स्कूल जाने लगे। इसके साथ ही समय बहुत बदलाव लाया। गांव छोटे कस्बे में तब्दील हो गया। बिजली आ गई। पानी की टंकी बन गई। टंकी बन जाने से घरों में नल आ गये। नल आ गये तो गुसलखाने बन गये। अब कोई नदी पर नहाने व कपड़े धोने क्यों जाता भला? घर में ही बहुत सारा पानी था। अन्य गांवों की भांति इस क्षेत्र में भी संचार क्रांति हुई। देश विदेश से जुड़ी खबरे यहां भी पहुंचने लगी। घटना कहीं भी घटती, दरवाजे के भिन्न नाम समर्थकों पर अपना पूरा असर दिखाती। नफरत की दीवारे ऊंची खिंचने लगी थी। ऐसा लगने लगा था जैसे एक ही गांव के दो विभाजन हो गये हो। इंसान, इंसान को फूटी आंख नहीं सुहा रहा था। ऐसे में 6 दिसंबर को भारत में एक घटना घटी। जिसने पूरे देश को हिला दिया था और उसके बाद -
एक दिन कस्बे में दंगा हो गया। हिन्दू और मुस्लमान के बीच फैले जहर ने इस कस्बे को भी अपनी चपेट में ले लिया। कुछ दुकाने जला दी गई। सामान लूट लिया गया। कई घायल हुए। किसी का सिर फूटा, किसी का हाथ टूटा तो किसी का पांव। छुरेबाजी व लाठीभाटा जंग दोनो ओर से हुई। बन्दूकों की नाल ने छर्रे भी उगले। एक छर्रा एक जने के सिर पर लगा और उसकी घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई। सरकारी फाइलों में इस गांव को संवेदनशील क्षेत्र आंका गया। गांव में पहली बार कफ्र्यू लगा। सांय सांय करते गांव में पुलिस बल बढ़ा दिया गया। पुलिस गश्त के जूते अंधकार को चीरने लगे।
इतना ही नहीं हुआ बल्कि गुलनारा और शारदा की दोस्ती को भी गzहण लग गया। क्योंकि मुस्तफा की रोजी रोटी का एकमात्र जरिया उसकी जीप दंगों की भेंट चढ़ गई थी। दंगाइयों ने उस पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी थी। अब वो बेरोजगार घूम रहा था। शारदा का पति रमेश हमेशा के लिए लंगड़ा हो गया था। उसकी टांग में छर्रा लगा था। छर्रा सीधा टांग की हड्डी में जा घुसा था। हजारों रूपये इलाज में फूंकने के बाद भी वो लंगड़ा कर चलता था। शारदा और गुलनारा के बीच अबोला हो गया था। इस अबोले का कारण यहीं दंगा था। गुलनारा तमाम हिन्दुओं को दोषी मानती थी और शारदा तमाम मुस्लिम सम्प्रदाय को। बरस गुजर गये पर उनके मनों में पैदा हुआ ये मैल कम नहीं हुआ।
एक दिन स्कूल में खेल प्रतियोगिता हुई। जीते हुए छात्रों को आगे जिला स्तर पर खेलने के लिए स्कूल मिनीबस का इंतजाम हुआ। उस दिन सिकन्दर और विक्रम को भी जाना था। बस बच्चों के इंतजार में खड़ी थी। गुलनारा अपने सिकंदर को और शारदा अपने विक्रम को छोड़ने आयी। दोनों की नजरे चार हुई पर वे मुस्कुरायी भी नहीं। अनजान बनी एक दूसरे को देखा और बात खत्म। जैसे जानती ही नहीं हो। बच्चों से भरी बस रवाना हुई। दोनो ने हाथ हिला हिलाकर बच्चो को अलविदा किया और दोनो ने अपनी अपनी राह पकड़ ली। दोनो की राह जुदा जुदा थी। एक पूरब की ओर तो दूसरी की पश्चिम की ओर।
अभी बस को निकले आधा घंटा भी नहीं गुजरा था कि बदहवास गुलनारा ने अपनी छत से खड़े होकर जोर जोर से शारदा को पुकारना शुरू किया।
‘‘शारदा कहां है तू.....या अल्लाह हम लुट गई.....’’
शारदा दौड़ी दौड़ी छत पर पहुंची। देखा तो गुलनारा अपने होशो हवास में नहीं थी। उसने नजरों ही नजरों में पूछा ‘क्या हुआ?’
दोनो हाथ से छाती पीटती हुई वह फिर बिलख उठी और बड़े ही कातर स्वर में उसका रूदन जारी था - ‘‘ओ मेरे लाल......हमारी गोद उजड़ गई शारदा......हाय! सिकन्दर....’’
‘‘क्या बक रही है तू कुछ होश में है?’’शारदा ने गुलनारा को लताड़ा।
‘‘कुछ सुना तूने....’’ और वो फिर बुक्का फाड़ कर रोने लगी।
‘‘बता भी क्या हुआ है?’’
तब उसने एक ही सांस में पूरा हादसा बयान कर दिया। उनके बच्चों से भरी बस पलटी खा गई और सड़क के किनारे की झील में गिर गई। बच्चे पानी में डूब गये। इतना सुनना था कि शारदा भी जल बिन मीन की भांति तड़प उठी।
‘‘हाय राम! क्या कह रही है तू.......’’और वो भी वहीं जमीन पर बैठ गई और जोर-जोर से हाथ पांव पटक-पटककर रोने लगी। दोनो तरफ भीड़ जमा होने लगी थी। रमेश भी घर पर नहीं था और मुस्तफा भी कहीं बाहर गया हुआ था।
‘‘चल दोनो चलते है।’’ दोनो एक दूसरे को पुकारा और नंगे पैर दौड़ी। रिक्शे में बैठ कर वे एक साथ घटना स्थल पर पहुंची।
वहां लोगों की भीड़ जमा थी। चारों तरफ आफरा-ताफरी मची हुई थी। दोनो हाथ पकड़े हुए भीड़ को चीरती हुई आगे बढ़ी। वहां बच्चों का सामान पड़ा हुआ था।
‘‘ये मेरे सिकंदर के जूते हैं।’’ जूतों को सीने से चिपटाये गुलनारा फूट पड़ी।
‘‘ये कपड़े मेरे विक्रम के है.....’’शारदा कपड़ों को वक्ष से चिपकाये पछाड़ खाने लगी।


क्रमश : अगली पोस्ट में