
भुआ को जब काम पर रखा था तब ही बहुत लोगों ने अगाह कर दिया था - इसे काम पर तो रखा है पर इसकी आदत ठीक नहीं....हाथगली है.....साबुन की तो विशेष चोर है......इसे घर में डाला तो है पर सावचेत रहना......इसके पास और कहीं काम नहीं हैं.....इसे कोई नहीं रखता.....
जब वह नई-नई आयी थी उसे लेकर हमसब बहुत खुश थे। बरसो के संचित पुण्य के समान वह हमें सेवाभाव लिए मिली थी। यह पहली ही कोई काम वाली थी जिसकी हर कोई प्रशंसा कर रहा था। सुबह से लेकर दिन ढ़ले तक लगी रहती भुआ। फिल्मों में रामू नामक नौकर की तरह घर में कामों को इतनी मुस्तैदी से करती मानो घर की सदस्या ही हो। उसके मुंह पर किसी काम के लिए मनाही तो मानो थी ही नहीं। हर काम के लिए हर समय तैयार भुआ शान्तिभाव से निरंतर काम में जुटी रहती। फलस्वरूप वह घर में सम्मान पाने लगी और उसका नामकरण हुआ ‘भुआ’। सम्मान के साथ घर में भोजन-पानी-नाश्ता सबकुछ उसे मिलने लगा। हमारी निर्भरता उस पर इतनी बढ़ गई कि वह एक घंटा भी देरी से आती तो हम सब उसके लिए व्यगz हो उठते। उस दिन जब वह पहली बार देर से आयी थी तो -
- क्या बात है आज भुआ नहीं आई? रोज तो साढ़े नौ-दस बजे तक आ जाती है। आज तो ग्यारह बज रही है।
बाऊजी ने आकर प्राथमिकी दर्ज करायी- ‘‘मेरे बाथरूम से साबुन की बट्टी चली गई। कल ही तो मैंने नई निकाली थी।’’ ताजुब्ब तो जरूर हुआ पहली बार हुए इस खुलासे पर। सबने अंदाजा लगा लिया था कि कहां गई होगी? पर कोई कुछ नहीं बोला। साबुन से अधिक सभी की बैचेनी इस बात से थी कि अगर भुआ नहीं आई तो क्या होगा? किसी को स्कूल तो किसी को मिटिंग में तो किसी को पार्लर जाना था। मोहरी पर झूठे बर्तनों का ढ़ेर, बाथरूम में गंदे कपड़ों का अम्बार लिए पूरा घर सफाई के लिए ताकता मुंह बांये अस्त-व्यस्त पड़ा था।
तभी फाटक की कुंडी बजी। देखा भुआ प्रविष्ट हो रही है। सबकी जान में जान आयी।
- साढ़े ग्यारह बज रही है, भुआ इतनी देर से क्यों आयी?
- आज मेरे अग्यारस है। मंदिर में भजन हो रहे थे जरा बैठ गई।
सचमुच श्वेत वस्त्रों में लिपटी उस अधेड़ काया के माथे पर चंदन का टीका सुशोभित होता हुआ सौम्यता के साथ उसके साध्वीभाव की गवाही दे रहा था। आकर उसने बड़ी तन्मयता से काम संभाल लिया। किसी ने उसे कुछ नहीं पूछा।
अब सभी उसकी इस बात से परिचित हो गये थे कि हर महीने की अमावस्या, पूर्णिमा और ग्यारस जैसे विशेष दिनों पर वह मंदिर में भजन करने बैठ जाती है तो आने में देर तो हो ही जायेगी। वैसे भी उसकी दौड़ कभी घड़ी से रही ही नहीं। बस आहिस्ता आहिस्ता काम को अंजाम देने में जुटी रहती। कभी कहते भुआ यह काम पहले कर लो वो बाद में करना वह तुरंत आदेश की पालना करने लग जाती।
उफ! इससे पहले जितनी भी काम वाली आयी थी कैसी जुबान दराज और तूफान मेल थी। काम किया या नहीं वो जा, वो जा और जब तक काम पर नजर पड़ती वह रफूचक्कर। महीने में चार-पांच लांघा। जब समय मिले मुंह उठाकर चले आना। बिना कहे छुट्टी मार जाना। एक से बढ़कर एक मुसीबत थी। भुआ जैसी तो कोई आयी ही नहीं। मंदिर में जरा भजन में बैठ गई तो ठीक ही है। उपवास है उसके। एक तो बिचारी विधवा और ऊपर से जवान बेटे की मौत। इस दुख से तो उसे हरि स्मरण ही पार लगायेगा।
जब मन में ऐसे शुभ विचार चलते तो बाऊजी ने भी कहना छोड़ दिया कि भुआ कब उनके पूजाघर से अगरबत्ती, माचिस या केसर डिब्बी ले गई। भुआ को किसी ने कुछ नहीं कहा। चोरी और वह भी साबुन, अगरबत्ती जैसी छोटी-मोटी चीजों की। इतने बड़े घर के जखीरे में इन छोटी-मोटी चीजों की क्या बिसात? सब्र की जा सकती है। अगर भुआ काम छोड़ देगी तो घर में मुसीबत हो जायेगी। इतने बड़े घर का काम कौन करेगा? सभी ने सचेत व सर्तक रहने की एक दूसरे को हिदायत दी और अपने अपने काम पर लग गये।
इस बीच घर के लोगों ने उसे चीजे चुरा कर खाते पकड़ा था। कभी लड्डू तो कभी पापड़ी मौका मिलते ही भुआ बिना पूछे लेकर खाने लगी। एक दिन तो भुआ पकड़ी गई। एक पोलिथीन की थैली में विम पाऊडर भरते हुए मैंने खुद पकड़ लिया-
‘‘यह क्या भुआ?’’
‘‘कुछ नहीं भाभीसा.......एक क्षण के लिए वह अचकचा गई पर दूसरे ही क्षण उसे बहाना सूझ गया ‘‘बेसिन साफ कर रही हूं’’ और वह फटाफट साफ बेसिन की ओर बढ़ गई। उसके इस तरह बेवकूफ बनाने के नाटक रचने पर मन तो ऐसा उफना कि इसे अभी हाथ पकड़ कर बाहर करे।
उसकी चोरी पकड़ी जाने पर हिदायत भरे स्वर घर में फिर उभरे।
- ध्यान रखा करो।
- कहां-कहां ध्यान रखे इतने बड़े घर में?
- ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। ये चोर है तो कोई दूसरी देखो।
- तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे काम वाली सड़क पर पड़ी हो। ढ़ूंढ़ने निकले और मिल गई।
- क्या, सब घरों में काम करने नहीं आती क्या कोई?
- इतने बड़े घर में कोई काम करने को राजी हो तब ना.....
फिर चुप्पी लग गई। दीपावली की सफाई सिर पर थी। यह चली जायेगी तो कहां से ढूंढ़ेगे नई? यह तो कम से कम जमी जमायी है। कोई बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसका सबकुछ देखाभाला हैं। दीपावली निकलने दो फिर सोचा जायेगा। पर अब तो हद हो गई पटाखों की चोरी....आने दो उसको।
वह सप्ताहभर से विशेष अवकाश पर है। ग्यारस का उद्यापन दे रही है। ‘क्या फायदा ऐसी भक्तिभाव का? चोर कहीं की।’ भुआ को लांछना देते हुए सबने लताड़ा। इस बार तो उसका हिसाब चुक्ता कर ही देंगे। दो साल हो गये उसे काम करते-करते। पता नहीं कितनी चीजों को चुरा चुकी है अब तक, जो अभी तक हमारी निगाह में नहीं आयी है। घर के सभी सदस्य एक जुट हो गये थे कि वह आये उससे पहले सभी कामों को निपटा लिया गया। बबलू, चिंकी, सोनू से लेकर सभी बड़ों ने अपने-अपने कपड़े धोकर सुखा चुके थे। झूठी प्लेटे भी साफ हो चुकी थी। पूरा घर दुzत गति से साफ हो रहा था।
दमकते घर में फोन की घंटी बजी।
- छोटे की शादी की तारीख पक्की करने की बात कह रहे थे समधीजी। एक महीने बाद ही शुभ लग्न आ रहे है।
भुआ को निकालने का विचार फिर निरस्त हो गया। छोटे की शादी में भुआ ने दत्त-चित्त होकर काम किया। खूब खाया और खुले मन से दिये गये उपहार बटोरे। कुछ छोटी-बड़ी चीजे चुरायी होंगी तब भी किसी ने ख्याल नहीं किया।
पर एक दिन तो हद हो गई। नई दुल्हन का पर्स खोल लिया और पकड़ी गई। उसे खूब लताड़ा गया। पक्की उम्र का हवाला दिया गया। उसे सख्त हिदायत थी कि वह जाये तब बताकर जाया करे। जब तक दूसरी का बन्दोवस्त न हो जाय उसे रखने की विवशता अब भी घेरे हुई थी फलस्वरूप भुआ पर पूरी सर्तकता से ख्याल रखा जाने लगा।
नई की तलाश जारी थी। कई जगह इस बारे में बात चलाई गई। अभी तक कहीं से पलटकर संतोषजनक जवाब नहीं आया। उस दिन आजाद मोहल्ले से गुजर रही थी। तभी एक परिचित आवाज कानो से टकराई। मुड़कर देखा भुआ खड़ी थी।
- पधारो भाभीसा.
- तुम यहां रहती हो भुआ?
तभी ही मन में विचार कौंधा भुआ के घर के अंदर जाया जाय। मैं उसके घर के अंदर प्रविष्ट हो गई। साफ सुथरा पक्का दो मंजिला मकान। छोटे पुत्र की विडियो शूटिंग की दुकान, दो-तीन किरायेदार, उसकी समृद्ध स्थिति पर ताजुब्ब हुआ। दालान और बरामदे से गुजरती हुई मैनें उसकी रसोई में झांका। एक परिचित चीज से नजर टकरायी- ‘संडासी’ यह तो हमारे घर की है। गुमी हुई संडासी की याद हो आयी। आगे बढ़कर मैंने उसे उठा ली और उलटने पलटने लगी।
- यह तो बिल्कुल हमारे घर जैसी है।
- छोटा बेटा अहमदाबाद से लाया था।
‘झूठी और चोर’ बुदबुदाते हुए मैंने संडासी रख दी और तेजी से बाहर चल दी।
मैं बहुत श्रुब्ध थी - ‘क्यों सह रहे है हम भुआ को? ऐसी क्या विवशता है? क्या यह हमारी परवशता नहीं?
- छोड़ो सुधी, जाने दो। क्यों परेशान हो? कई लोग आदत से मजबूर होते है।
- आदत?
सभी गुस्से में थे। एक बार फिर भुआ का निकाला जाना तय हुआ। सब एकमत होकर कमर कस चुके थे- बस! किसी तरह यह महीना पूरा हो जाय। अभी 31 तारीख आने में 4 दिन शेष थे। परन्तु छोटी नन्द के परिवार सहित छुट्टियों में आने की सूचना ने भुआ के जाने पर फिर स्थगन आदेश जड़ दिया।