Sunhare Pal

Thursday, April 29, 2010

विश्वास


मैं ‘सुसाईड’ कर रही हूं। मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। कमरे के सभी खिड़की दरवाजे भीतर से बंद कर दिए है और टी. वी. चालू करके उसकी आवाज तेज कर दी है ताकि बाहर मेरे मम्मी पापा को भी किसी तरह की भनक ना लगे कि मैं क्या करने जा रही हूं। मैंने पंखे से साड़ी बांधकर फांसी का झूला बना लिया है और अब इस पर लटकने वाली हूं। लटकने से पहले सोचा आपसे बात कर लूं ताकि अपने आप को निर्दोष साबित कर सकूं। इसमें मेरा कोई दोष नहीं .......
आपके पास किसी का फोन आये और ये कहे तो? इतना सुनते ही आपके होश उड़ जाते। मेरे साथ भी यही हुआ। घबरा कर मैंने उससे कहा- ‘‘रूको, रूको · · तुम कौन हो?’’
‘‘आपने मुझे पहचाना नही? मैं सुखबीर हूं। उस उस दिन बस में आपसे मिली थी। पाली से जोधपुर के सफर के दौरान और वहीं मैंने आपके फोन नम्बर लिए थे। मुझे पता था कभी न कभी आपके फोन नम्बर मेरे काम आयेंगे। और आज जब मैं मरने जा रही हूं तो केवल आपको ही बताना चाहूंगी कि मैं बिल्कुल निर्दोष हूं। उन्होंने बेवजह मुझ पर शक किया और झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्होंने......’’
‘‘अरे! सुखबीर बात क्या हुई ?’’ उसकी बात मुझे बीच में काटनी पड़ी।
‘‘कुछ नहीं मेडम, अब मुझसे सहन नहीं होता। मेरी शक्ति चुक चुकी है। अब एक पल भी मैं जीना नहीं चाहती। मेरे बच्चे का कुछ पता नहीं और मेरा सामान......(सिसकी उभरती है उसकी) वे मेरा सारा सामान पैक करके यहां पीहर छोड़ गये है।’’ यह कहकर वह फूट फूटकर रोने लगी।
बड़ी असंमजस थी क्या कहूं? मैंने कहा -‘‘सुनो सुखबीर तुम सबसे पहले अपना फोन बंद करो। मैं तुम्हें फोन लगाती हूं.................. मैं फोन लगा रही हूं। कहते हुए मैंने फोन काट दिया।
मैंने दीर्घ श्वास खींची। देखा, मेरे सिर से पसीना चुह रहा है और दिमाग सुन्न। दिल जोर-जोर से
धड़क रहा था। याद आया वह पल जब मैं पाली से जोधपुर जा रही थी। मेरे पास पानी से भरी बोतल थी। मेरे साथ वाली सीट पर बैठी युवती की गोद में दो-ढ़ाई बर्ष का बच्चा था। वह बार-बार अपनी मां को तंग कर रहा था। मैंने ध्यान दिया बच्चे की पानी की बोतल खाली हो चुकी थी और शायद वह मेरी बोतल से पानी चाहता था। इसके लिए वह बार-बार अपनी मां को कोहनी मार रहा था।
‘‘क्या चाहिए?’’ बात को समझते हुए मैंने बच्चे से पूछा।
मेरे कहने पर वह कुछ बोला तो नही बल्कि रूठता हुआ मां को देखने लगा।
‘‘पानी चाहिए?’’ मेरे दोबारा पूछने पर उसने गर्दन हिला दी।‘‘यह लो’’ उसकी स्वीकोरक्ति पाते ही मैं अपनी बोतल का ढ़क्कन खोलने लगी। मैं उसे पानी देने को तैयार थी तभी उसकी मां ने कहा-‘‘मेडम, आप थोड़ा ही पानी देना। जब से बस में बैठा है यह पानी ही पी रहा है। पूरी बोतल पी गया है इतने से रास्ते में।’’ उसने थोड़ा पानी लिया और पूछने लगी - आप कहां जा रही है?
-जोधपुर
-वहीं रहती है?
-नहीं अस्पताल का काम है।
-अस्पताल का?
-हां, मेरी समधिन का फोन आया था। उनकी बेटी की प्रसूति होने वाली है।
-तो आप चिकित्सक है?
-नहीं, मेरे पास रहने से उन्हें तसल्ली रहेगी। मुझ पर बहुत विश्वास है उन्हें। विश्वास ही बड़ी पूंजी है। कहते है विश्वास के सहारे आदमी जीता है विश्वास के बिना आदमी मर जाता है।
-बात तो आपकी 100 प्रतिशत सही है।
-विश्वास की इस अहमियत पर मेरी मां अक्सर एक किस्सा सुनाया करती थी। सफर काटने की गरज से मैंने बातचीत का सूत्र आगे बढ़ाया। वह कहती थी, बात उस समय की है जब छप्पन का अकाल पड़ा था। लोगों के घरों में खाने को एक दाना नहीं था। भूखे मरते लोग भूसा खा रहे थे। भूख से बेबस लोग नमक-आटे के बदले अपने बच्चो को बेचने लगे थे। ऐसे दुष्काल से निजात पाने के लिये अब पलायन ही एक मात्र रास्ता था। काफिले के काफिले गांव छोड़कर जाने लगे। ऐसे ही एक दम्पति का बुरा हाल था। चार दिन से बच्चो ने कुछ नहीं खाया था वे लगातार रोटी मांग रहे थे और रोटी थी नही। भोजन के अभाव में उनको बिलबिला कर मरते देखना उनकी बर्दाश्त के बाहर था। इधर सारा गांव खाली हो चुका था। आखिरी काफिला था। लोगों ने उन्हे अंतिम बार साथ चलने के लिए पूछा तब विवश हो उन्हे निर्णय लेना पड़ा। वे जाने लगे तो बच्चों ने उनके तार-तार हुए कपड़े पकड़ लिए। पूछने लगे आप सब कहां जा रहे है? क्या आप रोटी लेने जा रहे है? एक बच्चे ने पूछा तो बेबस माता पिता को बहाना मिल गया और मां ने आंसू रोकते हुए अपने बच्चो से कहा- हां, हम रोटी लेने जा रहे है।
विदा लेते पिता ने कहा- तब तक तुम यहां खेलते रहना। हम जल्दी ही रोटी लेकर लौट आयेंगे।
छ: माह गुजर गये। वर्षा हुई तो समय सुधरा। सुकाल आया तो लागों के काफिले पुन: अपने गांव की ओर लौटने लगे। वह दम्पति भी पहुंचे। दुखी मन से उन्हांेने अपने घर का दरवाजा ठेलना चाहा। जानते थे अब उनका सामना बच्चो से नहीं उनके कंकाल से होगा। वह दरवाजा ठेलते इससे पूर्व ही हंसते-खेलते बच्चो ने माता पिता की आवाज पहचान दरवाजा खोल दिया। बच्चो को सही सलामत पा दम्पति के हर्ष ठिकाना नहीं रहा। अभी वह स्थिति से उबरे भी न थे कि बच्चो पूछा - आप रोटी लाये?
उन्होंने मना कर दिया- हम रोटी तो नहीं लाये। हमें क्या मालूम था कि तुम जीवित....
अभी उनकी बात मुंह में थी कि ‘ना’ सुनते चारो बच्चे वहीं जमीन पर गिर गये। माता पिता ने उन्हें संभाला तो उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
कहने का तात्पर्य है कि छ: महीने तक बच्चे भूखे प्यासे होकर भी इस विश्वास के सहारे जीवित थे कि हमारे मां-बाप आयेगे और रोटी लायेंगे। किन्तु जैसे ही उनका विश्वास टूटा वे वहीं खत्म हो गये। तब से यह बात प्रचलित हुई कि आदमी विश्वास के सहारे जीता है और विश्वास के टूटे मरता है।
आपकी बात बहुत सही है आंटी।’’ उसने भाव विभोर होकर बड़े अपनत्व के साथ उसने मुझे कहा। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही है। मेरा नाम सुखबीर है और यहां पाली में मेरा पीहर है। जोधपुर में मेरी ससुराल है। मेरे पति मेरी जेठानी के कहे पर चलते है। जेठानी मेरे बारे में उल्टी सीधी बाते करके उन्हे मेरे खिलाफ भड़काती है और ये है कि आंख मूंद कर अपनी भाभी की बात को सही मानते है।
-तुम्हारी सास कुछ नहीं कहती?
-जेठानी के आगे सास की भी कुछ नहीं नहीं चलती। बड़ी तेज है वह। सब उससे डरते है। उसकी नजर हमेशा मेरे पति की कमाई पर रहती है। शादी के पहले तो वह सारा पैसा उसको दे देते थे तो चलता था पर अब हमें भी अपनी गृहस्थी बसानी है कि नहीं? इतना कहकर वह रूक गई और मेरी ओर देखा। मेरा समर्थन पाकर वह आगे कहने लगी-‘‘जी आज एक बच्चा है कल को बड़ा होगा। अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए पैसा भी तो चाहिये। आजकल स्कूल वाले डोनेशन मांगते है तब जाकर एडमिशन हो पाता है अच्छे स्कूल में। मेरी बहन को भी पचास हजार देने पड़े थे बबली के एडमीशन के समय । जी क्या क्या बात कहे? आजकल मंहगाई देखो न सुरसा की तरह बढ़ती ही जा रही है। सब दे देंगे तो कहां से लायेंगे पैसा? मांगेगे तो वह तो ठेंगा ही बताने वाली है जी।
मैंने उसे ब्रेक देते हुए पूछा- ‘‘तुम्हारे पति करते क्या है?’’
-जी मेडमजी, सब्जी मार्केट में रेडीमेड कपड़ो की दुकान है। रब की दया से गल्ला भी अच्छा आ जाता है। रोज के पांच-छ: हजार तो घर ले ही आते है। इसी बात को लेकर तो वह कुढ़ती है।
-तुम अलग क्यों नहीं हो जाती? मेरे इस सुझाव पर वह व्यग्रता से झल्ला उठी- ‘‘रे बाबा! अलग की बात मैं मुंह से निकाल भी नहीं सकती। मेरे पति मुझ पर नहीं भाभी पर एतबार करते है। खाना भी उसीसे मांगते है और गल्ला भी उसे ही सौंपते है। मेरी तो हर बात में उन्हें कमी ही नजर आती है। हर बात में कहते है - सुख्खी भाभी से सीखा कर जरा।
‘‘फिर तुम्हें बुरा लगता होगा। गुस्सा आ जाता होगा। और मुंह फुलाकर बात करना बंद कर देती होगी। तब वह तुम्हें मनाते है या नहीं?’’ मैंने उसे हल्का सा छेड़ा।
‘‘नहीं आंटी, जब तक मुझे रूला न ले उन्हें शान्ति नहीं होती। तंग आ गई हूं इस मैं रोज की किच किच से।’’ बातों का सिलसिला जो चला तो वह गंतव्य आने पर ही थमा। मेरे उतरने से पहले ही उसने वायदा लिया था कि मैं उसके फोन का जवाब जरूर दूंगी।
‘‘ठीक है, मैं दूंगी जवाब।’’
.................और आज ये अप्रत्याक्षित रूप से यह फोन.......मैं बड़ी विचित्र स्थिति में अपने आप को पा रही थी। कैसे और क्या किया जाय? वो भी केवल फोन पर। वह कहीं कुछ कर न बैठे इस दबाव के चलते दूसरे ही पल मेरी अंगुलिया उसके फोन नम्बर पर घूमने लगी। एक घंटी के जाते ही सुखबीर ने फोन उठा लिया था।
‘‘हलो आंटी, जल्दी बोलिये।’’
‘‘मरने के लिए इतनी तत्परता? मैंने कड़ाई से पूछा - ‘‘सुखबीर क्या हुआ मुझे सबकुछ विस्तार से बताओ।’’
वह बोली- ‘‘मेरी कोई गलती नही और फिर रोने लगी।’’
-तुम्हारा बेटा कहां है?
-मुझे नहीं मालूम।
-तुम्हारे पति कहां है?
-पता नहीं।
-तुम्हें बिना बताये वह कहीं चले गये है?
-हां।
-जब वह गये तुम कहां थी?
-मैं जयपुर गई हुई थी।
-कौन था तुम्हारे साथ?
-मेरे दीदी जियाजी।
-जाने से पहले पति से पूछा था?
-हां, पर उन्होंने मना कर दिया था।
-फिर तुम क्यों गई?
-दीदी ले गई थी। दीदी के मकान की रजिस्ट्री होने वाली थी। दीदी चाहती थी कि मैं उनके साथ जाऊं।
-लगता है तुम्हारे चले जाने से तुम्हारे पति नाराज हो गये।
वह कुछ नहीं बोली सुबकती रही।
-फिर किया हुआ? जब तुम लौटी तो पति ने झगड़ा किया?
-नहीं · वह सिसक उठी। मेरे लौटने से पहले ही वह मेरा सामान पैक करके मेरे पीहर छोड़ गये। मेरे बेटे और पति को मैंने लौटने के बाद देखा तक नहीं।
-ओह! सुखबीर गलती तो तुमसे हुई है।
-मैंने और गलती? नहीं जी....
-हां सुखबीर, अपने यहां शादी के बाद पत्नी इस तरह पति की इजाजत के बिना चली जाय तो वह बर्दाश्त नहीं करते।
-मैं किसी ओर के साथ तो गई नहीं थी। अपनी दीदी के साथ ही तो गई थी। मेरी इच्छा थी कि मैं भी दीदी का मकान देखूं। ये तो कहीं ले जाते नहीं खुद ही अकेले चले जाते है और वो भी मुझे बगैर बताये तब?
-वो तो ठीक है सुखबीर यह तुम समझ रही हो। किन्तु तुम्हारे पति ने तो इस तरह से सोचा नहीं न। और वह तुमसे नाराज हो गये।
-ठीक है आंटी वो मुझसे ना बोले पर मेरा बेटा? जाने किस हाल में होगा वह.....
-जहां भी होगा सुरक्षित ही होगा। तुम अपनी चिन्ता करो ।
-आप कह रही है तो मुझे भी अब लग रहा है कि इस तरह बिना बताये मुझे भी नहीं जाना चाहिये था। पर इसका मतलब यह तो नही कि वह मुझ पर शक करे और घर से ही निकाल दे। अब चार दिन बाद दीपावली का त्यौहार है। मुझे यहां आस पड़ौस वाले देखेंगे तो क्या समझेंगे। मेरे मम्मी पापा उन्हें क्या जवाब देगे? आपको पता है इस डर के मारे मैं बाहर तक नहीं निकली हूं। बंटी से भी नहीं मिली। कहीं लोग ये ना पूछ ले कि त्यौहार पर तुम इधर कैसे?
-सुखबर प्लीज, तुम लागो कि चिन्ता छोड़ो। एक दो दिन में तुम्हारे पति का गुस्सा उतर जायेगा और वह तुम्हें लेने आ जायेंगे।
-सच! आंटी ऐसा होगा? उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा? फिर तो मैं भी सॉरी बोल दूंगी।
-आज तुम्हे भी तो महसूस हो रहा कि तुमसे कहीं भूल हुई है।
-आं आंटी। उसकी स्वीकारोक्ति के बाद मैंने पूछा- मगर गलती तो तुम अब करने जा रही हो। क्या मरने से इसका समाधान हो जायेगा? और तुम आत्महत्या करके मर गई तो जो शक तुम पर किया गया है उस दोष से कैसे मुक्त हो सकोगी?
वह मौन रही। कुछ पल बाद मैंने कहा- ‘‘अपने को निर्दोष तुम तभी साबित कर सकती हो जब जीवित रहोगी। वर्ना तुम अपने साथ यह झूठा कलंक लेकर जाओगी।’’
-ओह! यह तो मैंने सोचा नहीं था। अब क्या करूं आंटी?
-तुम नार्मल हो जाओ। एक दो दिन इंतजार करो या तो वह आयेंगे या तुम्हारे पास उसका फोन आयेगा। उन्होंने यह सब गुस्से में किया है और तुम भी यह सब गुस्से में ही कर रही हो। गुस्सा करना अच्छी बात नहीं। पति पत्नी में रूठना मनाना तो चलता रहता है।
-देखती हूं।
इतना ही कहा था उसने और फोन कट गया। इसके बाद उसका कोई फोन नहीं आया। मेरे मन में बराबर उथल पुथल लगी रही कि सुखबीर का पति आया या नहीं? उसे बच्चा मिला या नही? कहीं झगड़ा और बढ़ तो नहीं गया। अनेक बुरी बाते मन में घूम रही थी। फिर भी मन में यह विश्वास अपनी जड़े जमाये हुए था कि शुभ शुभ सोचो। अच्छा ही हुआ होगा।
दीपावली धूमधाम से आयी और अपनी रौनक बिखेर कर चली गई।
मैं थोड़ी फुर्सत में बैठी अपने मोबाईल पर आये एस.एम.एस. पढ़+ रही थी। एक हिन्दी में आये एस.एम.एस. पर मेरी नजर पड़ी- ‘दीपावली की शुभकामनाएं’ और नीचे नाम सुखबीर का देख मैं चौंक उठी। क्षणभर में यह सोचकर राहत मिली कि वह जीवित है यानि उसने आत्महत्या नहीं की। दूसरे ही पल मैंने उसका नम्बर डायल कर दिया। उधर से सुखबीर का चहकता हुआ स्वर सुनाई दिया -
‘‘थैंक्यू आंटी। आपके आर्शीवाद से हमारी दीपावली
हुत अच्छी मनी। अब मैं अपने घर आ गई हूं और बहुत खुश हूं।’’
-सही कह रही हो सुखबीर? कहते हुए मुझे अपना स्वर आद्र लगा। ‘‘और वो लड़ाई?’’
-नहीं आंटी हमने अब नहीं लड़ने की कसम खा ली है। उन्होंने मुझसे और मैंने उनसे क्षमा मांग ली है। वो मुझ पर विश्वास करेंगे और मैं उन पर......................

5 comments:

honesty project democracy said...

अच्छी वैचारिक ,उम्दा विश्लेष्णात्मक मानवीय रिश्तों के महत्व को दर्शाती हुई आपके इस अच्छी संदेशात्मक और प्रेरक रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद / आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

sangeeta swarup said...

अच्छी विचारोतेजक कहानी....पर इतनी छोटी सी बात पर आत्महत्या जैसा कदम उठाना?????

फिर भी भारत में ऐसा संभव है.

बात मेरे मन की said...

विमला जी इस कहानी “विश्वास” की शुरुआती पांच लाइनें पढकर मैं सिहर गया था.कनाट प्लेस से लौटकर जैसे ही कम्पूटर ऑन किया और अपना जी-मेल एकाउंट चेक किया पहला ही मेल था Vimla tagged you in the note "Kahani". जब तक पूरी कहानी नहीं पढ़ ली मन बैचैन रहा. शायद यह दिल्ली की गर्मी का असर है कि मैं देर से इस बात को समझ सका कि यह एक बेहतरीन किस्म का कथानक है. एक बार फिर उम्दा कहानी के लिए साधुवाद.

दिनेश कुमार माली said...

विमलाजी की यह कहानी पढ़ते ही विख्यात लेखक चेतन भगत के बहुचर्चित उपन्यास " थ्री बिग मिस्टेक ऑफ़ माय लाइफ " की याद ताजा हो गई .
इस कहानी में ठीक इसी तरह सुखबीर अपनी एक छोटी सी गलती पर आत्महत्या करने की सोच लेती है तथा लेखिका को फ़ोन करके अपनी समस्या बताती है, जिस तरह उस उपन्यास का मुख्य पात्र चेतन भगत को अपने आत्महत्या करने के प्रयास को ईमेल के द्वारा इतला कर देता है और वह सिंगापुर से अहमदाबाद आकर उसे अस्पतालों में खोजने लगता है.
विमलाजी बहुत ही संवेदनशील लेखिका है. यह कहानी न केवल उनके व्यापक सामाजिक संबंधों को दर्शाती है बल्कि उनके उदार मन की सुकोमल भावनाओं के साथ साथ एक अच्छे पथ-प्रदर्शक के मार्ग-दर्शन के बारे में भी जानकारी प्रदान करती है. इस कहानी का कथानक बहुत ही गंभीर नारीवादी दृष्टिकोण को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है. बहुत-बहुत बधाई विमलाजी ! अन्य कहानियों के इन्तजार में .

Manila said...
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