Sunhare Pal

Saturday, May 8, 2010

कहां खो गये

जागे थे भाग कभी
बजे ढ़ोल, बंटे बताशे भी
लोरी और पालने के स्वर भी वहीं
फिर आज न जाने वे नन्दलाल कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

नहला धुलाकर
साफ-सुथरे कपड़े पहना
लगा दिये थे तूने काजल के टीके
फिर आज न जाने वो झूलेलाल कहां खो गये ?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

कई दौरो में
ऐसा भी इक दौर आया
तब मां मैंने तुझे खूब नचाया था
फिर आज न जाने सारे चुम्बन कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

पुरवाई चली जोरसे
या बिजली ने ली अंगड़ाई
दुबके सिमटे ये उत्पाती पतंगे
फिर आज न जाने किस छोर में कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।


टिफन और तरकारी
के ताने बाने बुना करती थी
भोर सवेरे में
फिर आज न जाने वो सितारे कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

सुनो विशाखा की मां
आओ तो दिलावर की अम्मा
सम्बोधन के तार
फिर आज न जाने ढ़ीले कहां से हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

पल्लू में लिपटे
पल्लू छूटे तो दुख सताये
तुझे बिन बताये
फिर आज न जाने वे छैने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

डांटकर तो कभी
पुचकार कर तूने सिखाये थे
चाहत के सबक
फिर आज न जाने वे सबब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

झरबेरी हो चाहे
खट्टी-मीठी, तेरी नयनों का मधु
बरसा था दिनरैन
फिर आज न जाने तेरे दीवाने कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।


तूने जनी संताने
गूंजे भी थे तेरे घरोंदे
खामोश सदा के लिए
फिर आज न जाने ये वीराने क्यों हो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

आंचल को फैलाये
तूने तो ढ़क दिये थे
सबको गिन गिनकर
फिर आज न जाने सभी शावक कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

ना कोस किस्मत को
ना दे कर्मो की दुहाई
जमाने की द्रुत गति में
फिर आज न जाने हम सब कहां खो गये?
मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।

1 comment:

Swati said...

Very well said...In this hectic lifestyle we are forgetting ourself and the precious gift of God thats our mother...no one can take her place in our life, but when we come to across to parenthood then only we can realise that how precious Mother is....

Appriciable thoughts in beautiful words....